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“ टॉयलेट- एक प्रेम कथा ” मूवी रिव्यू – अनकही कहानी कहने का एक शानदार प्रयास

August 12, 2017


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  • कलाकार - अक्षय कुमार, भूमि पेडनेकर, दिव्येन्दु शर्मा, अनुपम खेर, सुधीर पांण्डेय, शुभा खोते, राजेश शर्मा, सना खान
  • निर्देशन और संपादन - श्री नारायण सिंह
  • निर्माता – अरूणा भाटिया, शीतल भाटिया, प्रेरणा अरोड़ा, अर्जुन एन. कपूर, हितेश ठक्कर
  • लिखित – सिद्धार्थ सिंह, गरिमा वहल
  • छायांकन – अंशुमान महाले
  • बैकग्राउंड स्कोर – सुरेन्द्र सोधी
  • प्रोडक्श्न हाउस – वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स, क्रियराज एंटरटेनमेंट, नीरज पाण्डेय, प्लान सी स्टूडियो, केप ऑफ गुड फिल्म्स एलएलपी
  • अवधि – 2 घंटे 35 मिनट
  • सेंसर रेटिंग – अ/व
  • शैली – व्यंग्य, सामाजिक मुद्दे

लोग कहते हैं कि कला हमेशा समाज का आइना होती है। हम इस बात को लेकर बहुत हैरान हैं कि बॉलीवुड ने भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को प्रदर्शित करने के लिए इतना लंबा समय क्यों लगा दिया, जो भारत के लिए एक बड़ी समस्या बन रही है, भारत के ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वच्छता और शौचलयों का अभाव है। हाल ही में पाए गए आँकड़ों से पता चलता है कि भारत में 490 मिलियन से अधिक लोग खुले में शौच करते हैं। फिल्म टॉयलेट- एक प्रेम कथा के निर्माताओं के अनुसार यह केवल एक रूढ़िवादी मूल्यांकन है। फिल्म निर्माताओं (जो लगातार महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर रोशनी डालते रहे हैं) ने इस मद्दे पर बात करने में इतना ज्यादा समय क्यों लगा दिया? शायद शर्मिंदगी इसका कारण नहीं हो सकती, क्या एक विकासशील देश के लिए खुले में शौच करने के खुलासे की तुलना में कुछ और अधिक शर्मनाक हो सकता है? शायद वाणिज्यिक लाभ। किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि शौचालयों के बारे में कोई फिल्म बनेगी और बॉक्स ऑफिस पर उसकी सफलता भी होगी। और शायद ऐसा न भी हो। लेकिन टॉयलेट- एक प्रेम कथा को सफलता से दूर नहीं किया जा सकता।

एक सरल और जटिल कहानी

टॉयलेट- एक प्रेम कथा की कहानी एक तरह से सरल भी है और काफी जटिल भी है। मध्यम आयु का केशव (अक्षय कुमार) गाँव में साइकिल (विक्रेता) का काम करता है, जो एक पढ़ी-लिखी जवान और हसीन लड़की जया (भूमि पेडनेकर) के प्यार में पड़ जाता है। इन दोनों की शादी हो जाती है लेकिन जया ससुराल में शौचालय न होने के कारण खुले में शौच जाने को लेकर काफी परेशान है। वह ससुराल को छोड़ देती है और शौचालय बनने तक वापस आने से इन्कार कर देती है। शुरूआत में तो केशव घर में शौचालय बनवाने के लिए राजी नहीं होता है, लेकिन उसके अंदर प्यार जाग उठता है और वह अपनी शादी को बचाने के लिए शौचालय बनवाने का प्रयास करता है। गाँव वाले घर में “अपवित्र” शौचालय बनवाने के उपाय का घोर विरोध करते है और केशव जल्द ही अपने पिता (सुधीर पाण्डेय), समाज और भ्रष्ट अधिकारियों का विरोधी हो जाता है।

काफी सरल लगता है, सही कहा न? यहाँ पर फिल्म टॉयलेट- एक प्रेम कथा को करीब से देखने की जरूरत है इसमें आपको कई पहलू देखने को मिलेंगे।

हम पिता की सत्ता की बात करते हैं और वह भी ऊँची आवाज में। एक महिला का दमन करने के लिए अत्याचार की जरूरत नहीं होती है। महिला का दमन करने के लिए सबसे आसान कार्यों में से एक यह है कि उसकी गोपनीयता को नकार दिया जाए, यह किसी महिला को उत्पीड़ित करने का सबसे खराब तरीका हो सकता है। इन दोनों को समझना आसान नहीं है कि क्यों एक महिला मुख्य धारा में नहीं आती और अपनी शादी बचाने के लिए इस माँग को त्याग सकती है, उसका अपने ससुराल के लिए यह मोह और लगन हमारे हिस्से में एक भारी विफलता के रूप में आता है।

केशव को परिवर्तन का एक संदर्भ बानने के लिए, जो महिलाओं के अधिकारों का अनुसरण करता है, निर्देशक को फिल्म टॉयलेट- एक प्रेम कथा में लव स्टोरी को जोड़ना पड़ा। फिल्म टॉयलेट- एक प्रेम कथा का कथानक उन दर्शकों को बोर करता है जो एक मजबूत सामाजिक आलोचना या शायद मनोरंजक हास्यों को देखने की चाहत रखते हैं, लेकिन यह कथानक का एक जरूरी हिस्सा है।

देश के ज्यादातर अन्य परिवारों की तरह, जया का परिवार उसको ससुराल वापस जाने और तालमेल बिठाने के लिए बाध्य नहीं करता है। इसके बजाय उसके परिवार ने उसकी माँग की सराहना की, शायद यही उसकी सबसे बड़ी जीत है।

लगातार सात दशकों से हम देश में सार्वजनिक शौचालयों और स्वच्छता की कमी के लिए सरकार, नागरिक अधिकारियों, भ्रष्ट राजनेताओं और हर व्यक्ति के रूप में जिम्मेदार हैं। हालांकि इसके दोषी हम ही हैं। हमने कभी यह माँग नहीं की कि मूल अधिकार क्या होना चाहिए था, हम संस्कृति के नाम पर शर्मिंदा करने वाली प्रथाओँ को तोड़ने में असफल रहे, वर्षों से हम सरकार द्वारा प्रदान किये गए संसाधनों का उपयोग करने मे असफल रहे, हमनें अपने स्वास्थ्य और स्वच्छता को पिछड़ेपन से समझौता करने की अनुमति दे दी है।

अच्छा क्या है, बुरा क्या है?

समाचार पत्रों का कहना है कि फिल्म टॉयलेट- एक प्रेम कथा अक्षय कुमार के हस्ताक्षर करने से पहले कई नायकों (हीरोस) को ऑफर की गई थी। कोई भी इस भूमिका को न्याय के साथ नहीं कर सकता था इससे फिल्म के हास्य और गंभीरता में और बढ़ोतरी हुई। हालांकि, टॉयलेट- एक प्रेम कथा पूरी तरह से अक्षय कुमार की नहीं है। इस फिल्म में भूमि पेडनेकर की भूमिका भी काफी अहम है। अभी तक उनका सरल स्वभाव, हल्का दिल, रोमांटिक मूड और एक समझदार लड़की के रूप में उनका चरित्र काफी शानदार है। अक्षय कुमार के साथ उनकी केमिस्ट्री बहुत अच्छी है। भूमि द्वारा किया गया प्रदर्शन बहुत ही वास्तविक लगता है, एक हीरोइन के रूप में हम उनको स्क्रीन पर फिर से देखने की चाहत रखते हैं। वह एक जीरो साइज हीरोइन नहीं हैं, सिल्वर स्क्रीन पर एक महान नायिका होना उनके बोलने के तरीके (उच्चारण) या डांस के कौशल पर या सुंदर दिखने के लिए मेकअप पर निर्भर करता है। भूमि का एक्सप्रेशन (अभिव्यक्ति) और दमदार प्रदर्शन हमको अपनी ओर खींचने, हमारे प्यार और चाहत को पाने के लिए काफी है। फिल्म टॉयलेट- एक प्रेम कथा के सहायक कलाकारों के शानदार नामों में सुधीर पाण्डेय, अनुपम खेर, शुभा खोटे और दिव्येंदु शर्मा ने फिल्म को पूर्णतया न्याय के साथ किया है। फिल्म का ज्यादातर हिस्सा साधारण है, फिल्म को हँसी का स्पर्श भी दिया गया है।

फिल्म का संगीत बहुत ही सुरीला और ताजा है। सोनू निगम और पलक मुच्छल द्वारा गाया गया और मानस शिखर द्वारा कंपोज किया गया गीत “गोरी तू लट्ठ मार” एक ऐसा गीत है जिसे आप लंबे समय तक याद रखेंगे।

टॉयलेट- एक प्रेम कथा आपको काफी आकर्षित करती है खासकर फर्स्ट हॉफ में। अगर हम फिल्म के संदर्भ को समझते हैं तो रोमांस असली मुद्दे के प्रभाव को कम कर देता है। किसी की सबसे बड़ी शिकायत यह हो सकती है कि क्लाइमेक्स दूर से ही प्रकट होने लगता है। हम केशव के संघर्ष को बड़े स्तर पर होने और इसमें कई मिलियन लोगों के शामिल होने का इंतजार कर रहे हैं। दुर्भाग्यवश, “हमनें क्रान्ति की एक चिंगारी के रूप में एक व्यक्ति को देखना शुरू किया था”, उसका कथानक सपाट होकर नीचे गिर जाता है और सिर्फ अपनी निजी सफलता के साथ खत्म हो जाता है। फिल्म को मिलने वाले ध्यान और बढ़ावे के कारण इससे निश्चित रूप से निराशा होती है। श्री नारायण सिंह एक अच्छे निर्देशक जरूर हैं लेकिन एक अच्छे संपादक नहीं हैं।

हमारा फैसला

टिकट बुक करवायें और फिल्म को देखने जायें। फिल्म टॉयलेट- एक प्रेम कथा वाकई में देखने लायक एक फिल्म है। अक्षय कुमार और भूमि पेडनेकर के बहुत प्यारे अभिनय तथा कथाकार के सरासर साहस के लिए इस फिल्म को देखना चाहिए। अगर कुछ ज्यादा नहीं तो बड़ी संख्या में देश की महिलाओं की दुर्दशा को देखने के लिए ही सही।