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भारत में स्वास्थ्य सेवा: निजी बनाम सरकारी स्वास्थ्य सेवा

December 18, 2017
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भारत में स्वास्थ्य सेवा

भारत, 132 करोड़ से अधिक की आबादी के साथ विश्व के सबसे बड़े देश चीन को पछाड़ने की तैयारी में है। हमारी आबादी हमारी सबसे बड़ी ताकत और हमारी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। अगर आप इस कथन से स्पष्ट नहीं है, तो इस पर विचार करें। भारत की आधी से अधिक आबादी 25 वर्ष से कम है और लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा 35 वर्ष से कम उम्र की आबादी का है। अगले 3 वर्षों में 2020 तक, भारतीय लोगों की औसत उम्र 29 साल होगी, जबकि एक चीनी की औसत आयु 37 साल तथा जापानी लोगों की औसत आयु लगभग 48 वर्ष होगी। युवा भारत उद्योग और अर्थव्यवस्था के लिए तो अच्छा है, लेकिन भारत में मध्यम आयु वर्ग के लोग स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक बड़ी समस्या बने हुए हैं।

जागरूकता का अभाव

अहमदाबाद के एक प्रसिद्ध सार्वजनिक अस्पताल में 18 महीने पहले सिर्फ 24 घंटे के भीतर 18 नवजात शिशुओं की मौत हो गई थी। गोरखपुर के एक सरकारी अस्पताल में अगस्त 2017 में 160 से अधिक बच्चों की मौत हो गई थी, जबकि नासिक के सरकारी अस्पताल में 55 बच्चों की मौत हो गई थी। देश के सरकारी अस्पतालों और मेडिकल सेंटरों में दिन प्रतिदिन ऐसी घटनाएं और चिकित्सा उपेक्षा के मामले सामने आते रहते हैं। देश भर के चिकित्सा सेवा केंद्र, अस्पतालों तथा निजी नर्सिंग होमों की मध्यवर्गीय लोगों तक पहुँच ज्यादा बेहतर नहीं है।

कुछ दिनों पहले राजधानी के करीबी क्षेत्र से प्राप्त खबरों में कहा गया था कि इस क्षेत्र के एक प्रमुख अस्पतालों में से एक अस्पताल ने एक डेंगू पीड़ित 7 साल के बच्चे के इलाज के लिए एक परिवार को 18 लाख रुपये का बिल थमा दिया था और यह बिल केवल एक दो सप्ताह का था। इसके बाद में एक छोटी लड़की की इसी बीमारी के चलते मृत्यु हो गई थी और पीड़ित माता-पिता ने इसका सोशल मीडिया पर आक्रोश जाहिर किया था। यह एक अलग मामला नहीं है। इस बात का आक्रोश मीडिया और सोशल मीडिया दोनों में आम हो गया, लेकिन इन मामलों में जागरूकता और कार्रवाई की आवश्यकता है।

स्वास्थ्य सेवाओं पर सार्वजनिक खर्च

भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली मुख्य रूप से एक आपदा है क्योंकि चिकित्सा संस्थानों के द्वारा प्राप्त कम धन के कारण इनकी स्थिति खराब है। वास्तव में, नए औद्योगिक देशों में और यहाँ तक कि ब्रिक्स देशों में भी, स्वास्थ्य देखभाल पर भारत का प्रति व्यक्ति खर्च बहुत ही निराशाजनक है। भारत में वार्षिक प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य सेवा पर खर्च करीब 75 डॉलर है। जबकि चीन की प्रति व्यक्ति वार्षिक 420 डॉलर तथा दक्षिण अफ्रीका की 570 डॉलर, रुस की 949 डॉलर और ब्राजील की 947 डॉलर है तथा ब्रिटेन में प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य खर्च 4003 अमेरिकी डॉलर है, जापान में 4150 डालर तथा अमेरिका में 9451 डालर है।

यदि यह आँकड़े देश की स्वास्थ्य सेवा की निराश और दुःखी स्थिति को प्रकट करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, तो आइये देखते हैं कि सरकार इनसे निपटने के लिए क्या करती है। ऐसी संभावना है कि भारत में सार्वजनिक चिकित्सा केन्द्रों पर उपचार करवाने में एक मरीज को जितना खर्च करना पड़ता है उससे 800 गुना अधिक निजी अस्पतालों और चिकित्सा केन्द्रों में खर्च करना पड़ता है। इसके बावजूद, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लोग निजी चिकित्सकों और चिकित्सा सेवाओं को ज्यादा पसंद करते हैं। निजी चिकित्सा केन्द्र अपनी व्यय का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा अपनी सेवाओं पर ही लगा देते हैं, जबकि सरकार ने लगभग अपने स्वास्थ्य देखभाल और सेवाओं के खर्च को स्थिर कर रखा है। एक राष्ट्र के रूप में, हम सामाजिक सुरक्षा और राज्य द्वारा प्रायोजित चिकित्सा सहायता से बहुत दूर हैं, लेकिन बढ़ते शुल्कों के कारण अधिकांश भारतीय गुणवत्ता पूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं से काफी दूर हैं।

निजीकरण

अगस्त 2017 में, नीति आयोग ने टियर I और टियर II शहरों में चिकित्सा सुविधाओं और अस्पतालों का निजीकरण करने का निर्णय लिया था। यह निर्णय अस्पतालों को सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के अंतर्गत कवर नहीं किए गए उपचारों के लिए रोगियों से इसकी वसूली करने की अनुमति देगा। 2013-14 के अनुसार, सरकारी अस्पतालों पर लगभग 8,193 करोड़ रुपये के खर्च के साथ-साथ निजी अस्पतालों पर लगभग 64,628 करोड़ रुपये कुल खर्च का अनुमान लगाया गया था। इसकी वजह से आम आदमी अधिक पीड़ित है। हृदय रोग, कैंसर, फेफड़े के रोगों और जीवन शैली से संबंधित बीमारियों से, मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए उपचार और दवा लेना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

यह सही समय है कि भारत सरकार चिकित्सा और स्वास्थ्य देखभाल के खर्चों पर अपना ध्यान दें। अमेरिका में देश के लोगों की राहत के लिए ओबामा केयर की शुरूआत ने अमेरिका के लोगों के लिए बहुत आराम प्रदान किया था। यहाँ तक कि ट्रम्प प्रशासन ओबामा केयर को निरस्त करने के लिए तैयार है, लेकिन देश के लोग नए प्रस्तावित नियमों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। भारत को भी ऐसे ही कुछ गंभीर स्वास्थ्य देखभाल प्रावधानों की आवश्यकता है, जो भारत के लोगों को अनुचित चिकित्सा तथा इसके खर्चों से राहत दे सके। यहाँ तक कि भारत अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सा पर्यटन के रूप में खुद को उन्नत कर रहा है,देश के नागरिकों को चिकित्सा सुविधाओं तक पहुँच की कमी से पीड़ित नहीं होना चाहिए।