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राफेल डील: विवाद क्या है?

November 20, 2018


राफेल डील: राजनीतिक जंग

समाचार पत्रों और मीडिया चैनलों पर छाया रहा राफेल डील मामला – भारत के सबसे बड़े विवादों में से एक है। कांग्रेस, प्रधानमंत्री मोदी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने की कोई कसर नहीं छोड़ रही और इसने दावा करते हुए कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी ने उद्योगपति अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस लिमिटेड को अनुचित प्रकार से डेसॉल्ट का ऑफसेट पार्टनर बनाया है। अनिश्चित विवरण से अनजान? राजनीतिक लड़ाई और उसके बारे में संपूर्ण जानकारी लेने के लिए इस लेख को पढ़ें।

राफेल डील क्या है?  

‘राफेल डील’ वह समझौता है जिसमें भारत के रक्षा मंत्रालय ने फ्रांस में स्थित डेसॉल्ट एविएशन से 36 राफले लड़ाकू जेट विमान खरीदे हैं। इसके लिए सितंबर 2016 में, भारत और फ्रांस ने एक अंतर सरकारी समझौते (आईजीए) पर हस्ताक्षर किए थे।

राफेल डील से संबधित शुरुआत

अगस्त 2007 में, कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने 126 मध्यम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्रॉफ्ट की मांग की थी, क्योंकि भारतीय वायु सेना को अच्छी सामर्थ्य वाले लड़ाकू जेट विमानों की गंभीर कमी का सामना करना पड़ रहा था। उस समय, 18 जेट विमानों को रेडी-टू-फ्लाई स्थिति में खरीदा जाना था, जबकि शेष को बनाए जाने के लिए भारत की हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के अधीन किया गया था। इसके साथ जनवरी 2012 तक राफेल को खरीदने की बात की गयी थी। हालांकि, बजट की बाधाओं के कारण कांग्रेस ने इस समझौते को अधूरा ही छोड़ दिया। इसके बाद मोदी सरकार के आगमन पर, प्रधानमंत्री मोदी 2015 में इसके बारे में पुनः-बातचीत करने के लिए फ्रांस गए थे।

अकस्मात आरोपण….

रक्षा खरीद नीति के साथ हो-हल्ला शुरू हुआ, क्योंकि डेसॉल्ट को ऑफ़सेट पार्टनर की आवश्यकता थी, इसीके तहत रिलायंस डिफेंस को चुना गया था। सरकारी स्वामित्व वाली हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को अनुबंधों में कहीं पर भी नामित नहीं किया गया था। हस्ताक्षर होने के अगले दिन ही, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने समझौते के बारे में जानकारी लेना शुरु कर दिया और सरकार से इसके बारे में सूचना देने के लिए कहा। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी ने एचएएल की क्षमताओं को नजरअंदाज करके अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली रिलायंस को अनुचित प्रकार से चुना था।

राफेल डील में ‘गोपनीयता की शर्त’ के मौजूद होने वाले दावे सम्पूर्ण रुप से व्यर्थ प्रतीत होते हैं। इस शर्त में इस राफले डील में शामिल दोनो ही सरकारों को इसके बारे में ब्यौरा देने से रोंका गया था, क्योंकि इससे राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव पड़ने की आशंका थी। साथ ही, यह पहले से ही ज्ञात था कि पिछले यूपीए शासन में किए गए सौदे में एचएएल को हटा दिया गया था क्योंकि दोनों कंपनियां उत्पादन की शर्तों को पूरा करने में असमर्थ थीं। इसके साथ ही फ्रांसीसी सरकार ने एक बयान जारी किया था जिसमें उल्लेख किया गया है कि फ्रांसीसी कंपनियों को राफेल डील के लिए भारतीय फर्मों का चयन करने की पूर्ण स्वतंत्रता है। इसके अलावा डेसॉल्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि अनिल अंबानी उसकी उनकी पसंद थे और वे किसी भी राजनीतिक दल के शब्दों से प्रभावित नहीं थे। दोषों से उभरने के बाद, अंबानी ने भी कांग्रेस पर मानहानि का मुकदमा करने की धमकी दी है। भारत के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी कांग्रेस के अध्यक्ष- राहुल गांधी पर राफले डील का विवरण मांगकर भारत की सुरक्षा समझौता पर प्रभाव डालने का आरोप लगाया है।

तथ्य को विवाद में जोड़ते हुए, कांग्रेस ने सुझाव दिया है कि यह राफेल डील 58,000 करोड़ रुपये की ही है और इसमें करदाताओं के पैसे का दुरुपयोग किया गया है तथा जिस समय यूपीए इस समझौते पर कार्य कर रही थी उस समय से अब जेट विमानों का मूल्य भी बढ़ गया है। हालांकि, सरकारी अधिकारी लगातार आरोपों से इनकार कर रहे हैं और उन्होंने जबाव देते हुए कहा है कि केवल यही सच नहीं है कि पहले विमानों की कीमत सस्ती थी, बल्कि विमानों में बेहतर हथियार और बेहतर सैन्य सहायता को एकीकृत किया गया है। यह निष्कर्ष बहुत अच्छी तरह से निकाला जा सकता है कि कांग्रेस राफेल डील में किए गए कार्यों पर गर्व करने के बजाय, डेसॉल्ट विमानन में लाभार्थी होने वाली उनकी पिछली कमी के लिए लगातार विवाद उत्पन्न करने की कोशिश कर रही है।

राफेल डील के बारे में आपकी क्या राय है? क्या लड़ाकू जेट विमानों के बारे में गंभीर जानकारी, जैसा कि विपक्ष के द्वारा पूछा गया है, को जनता के सामने प्रकट किया जाना चाहिए? नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में कमेंट कर हमसे अपनी राय साझा कीजिए।

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कांग्रेस ने आरोप लगाया कि नरेंद्र मोदी ने राफले सौदे में सरकारी स्वामित्व वाली हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) की क्षमताओं को नजरअंदाज करके अनिल अंबानी की नेतृत्व वाली रिलायंस को अनुचित प्रकार से चुना था। अधिक जानकारी के लिए लेख पढ़ें।