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डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोरः भारतीय रेल का रूपांतरण

September 20, 2018
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डेडिकेटेड फ्रेट कोरिडोर, भारतीय रेलवे के साथ अपने निर्यात बाजार में एक क्रांतिकारी बदलाव लाने का दावा करती है। आपको जानने की आवश्यकता है।

क्या है डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर?

भारतीय रेल – लोगों के आवागमन के साथ-साथ माल की ढुलाई में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ‘मेक इन इंडिया‘ द्वारा जारी 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रेल के माध्यम से करीब 3 मिलियन टन माल ढुलाई दैनिक आधार पर होती है। रेल “सड़क से” सस्ता माध्यम है, जो पर्यावरण के भी अनुकूल है। कहने का तात्पर्य यह है कि यह माल ढुलाई के लिए बेहद लोकप्रिय साधन है।

संक्षेप में, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर रेल पथ हैं, जो केवल माल ढुलाई के लिए निर्धारित किए जाते हैं। भारत में डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर स्थापित किए जा रहे हैं, ताकि अपने निर्दिष्ट बंदरगाहों के लिए उद्योगों के बीच माल की आपूर्ति आसानी से की जा सके। ये रेल लाइनें चार बड़े परिवहन मार्गों – दिल्ली, मुंम्बई, चेन्नई और कोलकाता में तैयार की गईं हैं, जिसे एक साथ जुड़े होने के कारण ‘स्वर्णिम चतुर्भुज’ कहा जाता है।

डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का महत्व और आवश्यकता

मंत्रालय द्वारा जारी रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय रेलवे ने वित्तीय वर्ष 2017-18 में एक नया रिकॉर्ड बनाया। रेलवे ने इन वर्षों में 1,160 मिलियन टन माल ढुलाई की, जो अभी तक की उच्च संख्या थी। इसने पिछले कुछ वर्षों में माल परिवहन में एक सतत विकास दर्ज किया है। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है कि रेल माल ढुलाई के परिवहन के लिए एक सस्ता तथा अधिक सुविधाजनक विकल्प प्रदान करता है। हालांकि, यहां कड़ी दो-तरफा है। रेल ने माल ढुलाई के माध्यम से मंत्रालय को काफी हद तक लाभान्वित किया है। जुलाई 2017 तक, दस उत्पाद, जो मुख्य रूप से मंत्रालय की कमाई का स्त्रोत थे, में से दो तिहाई माल ढुलाई से संबंधित थे। इसके परिणामस्वरूप, ये डेडिकेटेड कॉरिडोर एक बड़ी सफलता के रूप में कार्य करेंगे।

क्रमशः दिल्ली-हावड़ा और दिल्ली-मुंबई को जोड़ने वाले पूर्वी और पश्चिमी कॉरिडोर इन क्षेत्रों में यात्रा के दौरान लगने वाले समय को कम कर देंगे, दोनों भारत में सबसे ज्यादा भीड़-भाड़ वाले मार्ग हैं। कॉरिडोर न केवल परिवहन के समय की बचत करेगा बल्कि मौद्रिक लागत को भी कम करेगा।

एक बार प्रचालन के तहत, फ्रेट कॉरिडोर से रेल पथ की माल ढुलाई क्षमता लगभग 1,100 मिलियन टन बढ़ने की उम्मीद है, जो 2300 मिलियन टन तक पहुंच जाएगी।

1.5 कि.मी. की लंबाई, 3660 मि.मी. चौड़ाई, 7.1 मीटर की ऊँचाई वाली यह मालगाड़ी ट्रेनें दुनिया की पहली और एकमात्र ऐसी ट्रेनें होने का दावा करेंगी। इसके अलावा, माल ढुलाई में लगने वाले कम समय और कीमत को देखते हुए, निर्यात बाजार में एक प्रतिस्पर्धा प्राप्त करने के लिए डीएफसी को देश की सहायता करने वाला कहा जाता है।

अब तक की यात्रा

2005 में शुरुआती वार्ता के बाद, कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत पंजीकृत डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉर्पोरेशन की स्थापना वर्ष 2006 में की गई थी। पूर्वी और पश्चिमी कॉरिडोर ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012) के तहत शुरू किए गए थे। शेष 4 डीएफसी के लिए निधिकरण, जनवरी 2018- यानी पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण, पूर्वी तट और दक्षिण-पश्चिम समर्पित फ्रेट कॉरिडोर में अनुमोदित किया गया था।

अधिकारियों ने शुरुआत में कहा था कि परियोजना 2016-17 तक सिमट जाएगी और 2020 तक पूरी हो जाएगी, हालांकि, इसमें लगातार देरी हो रही है। भूमि अधिग्रहण पर  विवाद और विरोध प्रदर्शन के साथ पर्यावरण मंजूरी और धीमी गति, इस देरी का प्रमुख कारण रहा है।

इन सब के बावजूद, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, रेल विभाग में क्रांतिकारी बदलाव की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि ‘स्वर्णिम चतुर्भुज’ के लिए एक  बंधनकारी शक्ति के रूप में डीएफसी कैसी भूमिका निभाता है।

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डेडिकेटेड फ्रेट कोरिडोर, भारतीय रेल के साथ अपने निर्यात बाजार में एक क्रांतिकारी बदलाव लाने का दावा करती है। आपको जानने की आवश्यकता है।