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भारत में सेक्स एजुकेशन के लिए अपनाएं एक नया दृष्टिकोण

February 21, 2018
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भारत में सेक्स एजुकेशन

भारत में बढ़ते किशोरों के लिए, यौन शिक्षा हमेशा से एक विवादास्पद विषय रहा है। यहाँ पर दो प्रकार के लोग रहे हैं- एक इसके समर्थन में दूसरा इसके विरोध में। समय आ गया है कि हम अपने किशोरों के लिए सेक्स शिक्षा की आवश्यकता और महत्व को समझें, जो एक सामान्य, स्वस्थ और जागरूक व्यक्ति को विकसित करने में औपचारिक शिक्षा के रूप में आवश्यक है।

सेक्स शिक्षा क्यों?

बच्चों को शारीरिक और भावनात्मक रूप से शिक्षित करने के लिए एक सही माहौल को उपलब्ध कराने में समाज की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जिसमें जीवन के विभिन्न शैक्षणिक पहलुओं को सीखने, एक-दूसरे के प्रति अपने दायित्वों को समझने, अपने परिवार और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों की पहचानने तथा अपनी इन सभी भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को अच्छी तरह से निभाने और उनका सम्पूर्ण रूप से विस्तार करने वाले उद्देश्य शामिल होते हैं।

जब एक लड़का या लड़की अपनी युवावस्था (किशोरावस्था) में प्रवेश कर रहा होता है तो उसको अपने शारीरिक परिवर्तनों और भावनात्मक परिवर्तनों के सभी पहलुओं के बारे में जानने की आवश्यकता होती है। यह जानकारी और जागरूकता उस युवा व्यक्ति के लिए बहुत जरूरी होती है, जो किशोरावस्था से गुजरने के बाद होने वाले परिवर्तनों के बारे में जान सके।

यह जानकारी और जागरुकता की निराशाजनक कमी के कारण ही ऐसा होता है कि बच्चे इसके परिणाम और उपाय को जाने बिना गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं जो कि यौन शोषण के कारण भावनात्मक और शारीरिक रूप से इसका शिकार हो जाते हैं और कभी-कभी शारीरिक रूप से अपने जीवन को बहुत बड़े संकट में डाल लेते हैं।

इसलिए समाज का यह कर्तव्य है कि वह युवावस्था के समस्त किशोर और किशोरियों को सेक्स शिक्षा से सम्बंधित सभी जानकारियां प्रदान करें, ताकि वह भी अनेक परिस्थियों से उत्पन्न समस्याओं के कारण और उससे संबंधित निवारण के लिए सुधारात्मक उपायों का प्रयोग कर सकें।

इस समस्या के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या माता-पिता या स्कूल या सहकर्मी समूह (प्रिय ग्रुप) या फिर अन्य पक्ष, जहाँ इस शिक्षा से सम्बंधित बहस विवादास्पद हो जाती है? सेक्स शिक्षा से सम्बंधित सामग्री का वितरण और इसकी शिक्षा पद्धति को लेकर आज भी दुनिया भर में बहस की जाती है तथा हमारे बच्चे इस दो-तरफा बहस से भ्रमित और बहुत अनजान होते हैं। क्या हमारा समाज इसे स्वीकार कर सकता है?

समस्या

भारत अनेक संस्कृतियों, धर्मों, भाषाओं, भोजन और जीवन शैली का एक विशिष्ट संगम है, जहाँ एक विशाल भूगोल में फैली विशाल विविधता अपने स्वयं की चुनौतियों का सामना करती हैं। उपलब्ध विषय के संदर्भ में मुख्य रूप से यह पहचानना आवश्यक होता है कि कोई भी आकार सभी दृष्टिकोणों से उचित नही हो सकता है। विषय की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रत्येक राज्य या क्षेत्र को उसकी मूल्य प्रणालियों और संस्कृतियों के लिए विशेष रूप से संभालना होगा।

समाजिक दृष्टिकोण से, एक क्षेत्र के सामाजिक स्वीकार्य मानदंड दूसरे क्षेत्र के लिए वर्जित भी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, दक्षिणी भारत के कुछ राज्यों में लोग अपने करीबी रिश्तेदारों की लड़कियों के साथ शादी कर लेते हैं जो उनके लिए स्वीकार्य भी है, जबकि उत्तर और मध्य भारतीय राज्यों के कुछ हिस्सों में  एक ही ‘गोत्र’ (आमतौर पर एक ही परिवार के भीतर) के विवाह को अस्वीकार्य माना जाता है। तो आप सेक्स शिक्षा के राष्ट्रीय स्तर का स्वीकार्य पाठ्यक्रम कैसे तैयार करते हैं?

सामग्री
सेक्स शिक्षा, सिर्फ सेक्स और जन्म नियंत्रण के संबंध के बारे में ही नहीं होती है जैसा कि कई लोग विश्वास करते हैं। वास्तव में यह सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा होती है, जो किशोरवस्था में प्रवेश करते समय किशोरों को बेहतर जीवन शैली के लिए दी जाती है (सही उम्र पर इस शिक्षा की शुरुआत करने के लिए आज भी विभिन्न समाजों में बहस की जाती है)। इसमें शारीरिक परिवर्तन से जुड़े संभावित भ्रम को भी उल्लेखित किया गया है जो कि किशोरवस्था के शुरुआती दौर में विशेष रूप से दिखाई देने लगते हैं और इसकी जानकारी के अभाव में एक भ्रम का परिणाम नकारात्मक हो सकता है।

सेक्स एक पारस्परिक गतिविधि है जिसमें दो लोगों के बीच शारीरिक और भावनात्मक संपर्क दोनों ही शामिल हैं। यदि ये दोनों जागरूकता और स्वीकृति के समान स्तर पर नहीं हैं तो शारीरिक और भावनात्मक संघर्ष परिणामस्वरूप हानिकारक भी हो सकते हैं, इसलिए सेक्स शिक्षा के दोनों पहलुओं को जानना अत्यन्त आवश्यक है। आमतौर पर विपरीत लिंग के शारीरिक और व्यवहारिक पहलुओं की जागरूकता और समझ की कमी, उनके बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न कर देती है जिन्हें उल्लेखित करने की आवश्यकता है।

बलात्कार के मामलों में एक नाबालिग अपराधी, किशोर और प्री-किशोर गर्भावस्था, व्यभिचार आदि सभी अभिव्यक्तियाँ समाजिक, सेक्स व नैतिक शिक्षा की कमी के कारण होती हैं और हम वयस्क के रूप में मौके पर बाहर होने के लिए सामूहिक रूप से इसके जिम्मेदार हैं।

इन क्षेत्रों के लिए सेक्स शिक्षा की अवधारणाओं का विकास किया जाना चाहिए

  • शारीरिक और मनोवैज्ञानिक अंतर की जानकारी के साथ-साथ सेक्स की जानकारी देना। लड़के और लड़कियां शारीरिक रूप से कैसे भिन्न होती हैं और वे अलग-अलग उम्रों में अलग-अलग तरह व्यवहार क्यों करते हैं।
  • किशोरावस्था में शारीरिक परिवर्तनों के साथ-साथ मानसिक परिवर्तन भी समान रूप से होते हैं और ये परिवर्तन दोनों लिंगों में होते हैं, लड़कों और लड़कियों को इन समस्त परिवर्तनों से अवगत कराना चाहिए और लड़कियों को माहवारी के बारे में पूरी जानकारी देनी चाहिए तथा दोनों लिंगों में जो भी समान रूप से बदलाव होते हैं उन बदलावों को किशोरों द्वारा समझा जाना चाहिए, इसके साथ ही साथ लड़के किशोरवस्था में जिन स्थितियोंसे गुजरते हैं उनकी पूरी जानकारी देनी चाहिए, दोनों ही आमतौर पर सेक्स और भावनात्मक परिवर्तन के बारे में पूरी तरह से अनजान होते हैं और यह एक बड़ी समस्या होती कि उनके साथ कैसे निपटा जाए।
  • भौतिक परिवर्तन के विभिन्न लक्षणों को पहचानना और असामान्य होने पर इसकी कमी को जानना चाहिए व असामान्यता के जो भी मामले हो उनकी पूरी जानकारी डॉक्टर से लेनी चाहिए और इस विषय पर चर्चा करनी चाहिए।
  • संभोग, गर्भाधान व जन्म प्रक्रिया के हर पहलुओं को दोनों लिंगों को समझाया जाना चाहिए। इनके संबंध में बहुत सारे मिथक मौजूद हैं। जन्म नियंत्रण, गर्भावस्था और समापन जैसे विकल्पों से संबंधित शिक्षा दोनों लिंगों को प्रदान की जानी चाहिए।

उपरोक्त सामग्री को सार्वभौमिक होना चाहिए और सभी के लिए उपलब्ध होनी चाहिए।

नैतिक और सामाजिक शिक्षा:

यह शिक्षा का आलोचनात्मक परन्तु एक संवेदनशील पहलू है, जिसकी अवधारणाओं में अपने संविधान और कानून के दायरे में रहकर क्षेत्रीय, सांस्कृतिक और धार्मिक भावनाओं का ध्यान रखना पड़ता है।

सबसे बड़ी चुनौती: वितरण

टेलीविजन, इंटरनेट और सोशल मीडिया द्वारा प्रदान की गई जानकारी से पहले किशोर, सेक्स के अधिकांश मुद्दों पर सहकर्मी प्रतिक्रिया और सस्ते प्रकाशनों पर भरोसा करते थे। माता-पिता सामाजिक रुकावटों के कारण इस आवश्यक कार्य के खिलाफ थे और सामान्य रूप से समाज में शिक्षकों के पास सेक्स शिक्षा सिखाने के लिए जनादेश नहीं था जिससे किशोरों को अपने सहकर्मियों की आधूरी जानकारियों और सलाहों पर भरोसा करना पड़ता है।

आज, इस समस्या को प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया के सहयोग से कम कर दिया गया है, खासकर उपर्युक्त विचारों को सार्थक बनाने में इसे अब जानकारी के सभी क्षेत्रों में प्रयोग किया जा सकता है। पूछे गये प्रश्नों को एक जानकार संस्था से संबंधित पत्र, चित्र, 3-डी ग्राफिक्स और वीडियो द्वारा हल किया जा सकता है और लोग इसका उपयोग करते रहेंगे।

नैतिक और सामाजिक शिक्षा से संबंधित अन्य जानकारियों को ऑनलाइन व ऑफलाइन रूप में सेक्स शिक्षा से संबंधित विचारों को प्रसारित करके प्रयोग किया जा सकता है। इसको स्थानीय संवेदनाओं को ध्यान में रखते हुए बनाया जाना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रौद्योगिकी को प्राकृतिक और मानवीकृत रूप से विकसित किया गया है जिससे शिक्षण सामग्री को अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न लोगों तक सरलतापूर्वक उपलब्ध कराया जा सकता है। यह हमारे इतिहास का सबसे अच्छा वक्त है जब हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि इसकी सहायता से अगली पीढ़ी को बेहतर जानकारी मिल सके और इस समय हमारे द्वारा दी गई समस्त जानकारियाँ एक बेहतर विकल्प बनाने में सक्षम हो सकें।

इसके साथ ही साथ समाज के सभी हितधारक एक दूसरे के साथ मिलकर इस महत्वपूर्ण मुद्दे को हल करने के लिए सर्वोत्तम प्रौद्योगिकी का उपयोग करें, जो वर्तमान समय के लिए आवश्यक है।