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भारत के विभिन्न क्षेत्रों में दिवाली समारोह

November 2, 2018
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भारत के विभिन्न क्षेत्रों में दिवाली समारोह

दिवाली एक प्राचीन त्यौहार है जिसे देश के विभिन्न भागों में बहुत उत्साह और आनन्द के साथ मनाया जाता है। त्यौहार से जुड़े कई धार्मिक महत्वों के साथ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में दिवाली के इस धार्मिक त्यौहार को कई तरीकों से मनाया जाता है।

भारत के अधिकांश हिस्सों में, दिवाली को पाँच दिनों तक मनाया जाता है।

  • पहला दिन, धनतेरस: इस दिन भगवान यम की पूजा की जाती है और धातु की वस्तुओं की खरीददारी की जाती है।
  • दूसरा दिन, छोटी दीवालीः रूप चतुर्दशी, नरक चतुर्दशी के नाम से भी जानी जाती है।
  • तीसरा दिन, दिवाली: देवी लक्ष्मी और भगवान गणेश का पूजन किया जाता है।
  • चौथा दिन: इस दिन गोवर्धन पूजा की जाती है।
  • पाँचवां दिन: भइया दूज या भाई टीका के रूप में भी जाना जाता है। यह दिन भाइयों और बहनों को समर्पित है। इस दिन बहनें अपने भाइयों के लिए दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं।

भारत के विभिन्न क्षेत्रों की दिवाली

इस त्यौहार को पूरे देश में विभिन्न तरीकों से महान भव्यता और उत्साह के साथ मनाया जाता है। जैसा कि नीचे बताया गया है:

उत्तर भारत

उत्तरी भारत में, दिवाली का धार्मिक महत्व भगवान राम और उनकी पत्नी सीता तथा भाई लक्ष्मण के 14 वर्ष वनवास के बाद अयोध्या वापस आने के साथ जुड़ा हुआ है। यह त्यौहार कार्तिक महीने की अमावस्या को मनाया जाता है जिस रात में काफी अँधेरा होता है। लेकिन भगवान राम के अयोध्या वापस आने पर अयोध्या निवासियों ने दिये जलाकर और आतिशबाजी करके पूरे राज्य को प्रकाश से भर दिया और इस अवसर को बहुत आनन्द के साथ मनाया। भगवान राम की अयोध्या वापसी बुराई पर अच्छाई की जीत के महत्व से जुड़ी हुई थी। यह परंपरा उत्तर प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, बिहार और अन्य पड़ोसी क्षेत्रों में अभी तक जारी है।

उत्तर भारत में दिवाली कैसे मनाई जाती है?

उत्तर भारत में, दिवाली के उत्सव की शुरूआत दशहरे के साथ शुरू हो जाती है, जिसमें रामायण की कहानी को नाटकीय रुप से दर्शाया जाता है। यह नाटक कई रातों तक चलता है परन्तु इसका अंत बुराई पर अच्छाई की जीत के साथ होता है।

हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और पंजाब के लोग दिवाली की रात में जुआ खेलते हैं क्योंकि वहां दिवाली में जुआ खेलना शुभ माना जाता है। पंजाब में, सिक्ख इस प्रकार से दिवाली नहीं मनाते हैं बल्कि अपने घरों और गुरूद्वारों को मोमबत्तियों और दियों से प्रकाशित करके इस त्यौहार में हिस्सा लेते हैं। दिल्ली, यूपी और अन्य आसपास के इलाकों में घरों को मोमबत्तियों, दीपको, बंधनवार्स (मुख्य द्वार पर की गई सजावट) और रंगोली से सजाया जाता है तथा रात में देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। कुछ घरों में, दूध के गिलास में चांदी के सिक्के को डाला जाता है और पूजा के बाद पूरे घर में सिक्के से गिलास के दूध का झिड़काव किया जाता है। इस त्यौहार में खरीददारी, साफ-सफाई, रंगाई-पुताई, घर की सजावट, जुआ, उपहारों और मिठाइयों का आदान-प्रदान होता है।

पूर्वी भारत में दिवाली कैसे मनाई जाती है?

पूर्वी भारत के लोग उसी प्रकार से दिवाली मनाते हैं जैसे उत्तर भारत में मनाई जाती है। जिसमें पटाखों की आवाज, मोमबत्तियां और दीपको के प्रकाश शामिल हैं। वास्तव में, कुछ लोग अपने घरों में मोमबत्तियों और दीपको से प्रकाश करके दरवाजे खुले रखते हैं जिससे देवी लक्ष्मी प्रवेश कर सकें। क्योंकि देवी लक्ष्मी अंधेरे घर में प्रवेश नहीं करती हैं।

पश्चिम बंगाल और असम

पश्चिम बंगाल में, दुर्गा पूजा के छह दिन बाद लक्ष्मी पूजा की जाती है। इन क्षेत्रों में दिवाली को काली पूजा के रूप में मनाया जाता है। दिवाली की रात में काली देवी की पूजा होती है। यहाँ विभिन्न क्षेत्रों के मंदिरों में काली देवी की पूजा होती है, इनके अलावा सभी रस्में एक समान होती हैं। रंगोली का चित्रण भी उत्सव का एक अहम हिस्सा है। दिवाली की रात को पूर्वजों और दीपों की रात माना जाता है जिसमें दियों को ऊँचे खंम्बे पर जलाया जाता है जिससे उनकी आत्माएं स्वर्ग पहुँच सकें। ग्रामीण बंगाल में आज भी इस अनुष्ठान का पालन होता है।

ओडिशा

ओडिशा में दिवाली का त्यौहार पश्चिम बंगाल की तरह पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने  के लिए मनाया जाता है। “बदाबदुआ हो अंधारा ए असा अलुआ ई जाओ बाईसी पाहाचा ई गदागादौ थाओ” इसका अर्थ यह है कि हे हमारे पूर्वजों, संतों और देवताओं, आप महालय की अंधेरी रात में आए और अब यह आपके लिए स्वर्ग प्रस्थान करने का समय है, इसलिए हम प्रकाश दिखा रहे हैं, आप जगन्नाथ के निवास में शांति प्राप्त कर सकते हैं।”

पश्चिमी भारत

गुजरात

पश्चिमी भारत अधिकतर उद्योग और व्यापार से जुड़ा हुआ है। दिवाली से कुछ दिन पहले, पश्चिमी भारत के बाजारों में दिवाली के सामान की दुकानो पर भीड़ लगी रहती है। गुजरात में, सभी लोग दिवाली से पहले की रात को अपने घरों के सामने रंगोली बनाते हैं। पश्चिमी भारत के सभी राज्यों में रंगोली, दिवाली का एक अभिन्न अंग है। दिवाली में देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए चरणों के निशान भी बनाए जाते हैं और घरों को चमकीले प्रकाशों से प्रज्जवलित किया जाता है। गुजरात में दिवाली नये साल के रुप में भी मनाई जाती है।

इस दिन कोई नया उद्योग, संपत्ति की खरीद, कार्यालय खोलना, दुकान खोलना और विशेष अवसर जैसे विवाह संपन्न होना शुभ माना जाता है। गुजरात में, घरों में देशी घी के दिये पूरी रात जलाए जाते हैं। फिर अगली सुबह, इस दिये की लौ से धुआं एकत्र करके काजल बनाया जाता है जो महिलाएं अपनी आँखों में लगाती हैं। यह बहुत शुभ प्रथा मानी जाती है जिससे पूरे वर्ष भर समृद्धि आती है। उत्तर भारत की तरह, पश्चिमी भारत में दिवाली को 5 दिन तक मनाया जाता है।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में, दिवाली का त्यौहार 4 दिनों तक मनाया जाता है। वसुबरस पहला दिन है जिसे गायों और बछड़ों की आरती का प्रदर्शन करके मनाया जाता है। यह माँ और बच्चे में प्रेम का प्रतीक है। फिर अगला दिन अन्य क्षेत्रों की तरह धनतेरस या धनत्रयोदशी के रुप मे मनाते हैं। तीसरे दिन, नरकचतुर्दशी मनाई जाती है फिर लोग सुबह स्वच्छ जल से स्नान करके मंदिर जाते हैं और इसके बाद महाराष्ट्र के लोग दिवाली उत्सव में कई मिठाईयां जैसे “करंजी”, “लड्डू” और तीखे एवं मसालेदार व्यंजन जैसे “चकली” और “सेव” विशेष तैयारी के साथ बनाते हैं। यह भोज फारल के नाम से जाना जाता है। चौथा दिन, यह दिवाली का दिन है इस दिन देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। दिवाली के दिन महाराष्ट्र में प्रत्येक घर में देवी लक्ष्मी की तरह धन और आभूषणों की भी पूजा की जाती है।

दक्षिणी भारत

दिवाली तमिल के ऐपसी महीने में (जो थुला माह के नाम जाना जाता है) और ‘नरक चतुर्दशी’ तिथि को मनाई जाती है। यह अमावस्या से पहले का दिन होता है। दक्षिण भारत में, नरक चतुर्दशी दीपावली त्योहार का मुख्य दिन है। मुख्य दिन से एक दिन पहले चूल्हा साफ किया जाता है फिर इसको चूने के द्वारा पोता जाता है। फिर चूल्हे पर लोग धार्मिक प्रतीकों को बनाते हैं और बाद में पानी भरकर तेल से स्नान के लिए मुख्य दिन पर इसका प्रयोग किया जाता है। यहाँ लोग घरों को धुलते हैं और उन्हें कोलाम डिजाइनों से सजाते हैं जो उत्तर भारत की रंगोली की तरह होती है। यहाँ भी उत्तर भारत की तरह पटाखे दगाये जाते हैं और नए-नए कपड़े पहने जाते हैं। वास्तव में, दिवाली की पूजा में इस्तेमाल होने वाली प्लेट में पटाखों और नए कपड़ों को रखा जाता है। दिवाली या नरक चतुर्दशी की सुबह, सूर्योदय से पहले एक तेल स्नान किया जाता है। फिर बाद में मिठाई खाई जाती है और नए कपड़े पहने जाते हैं।

दक्षिण भारत में दिवाली पर एक दूसरी रस्म थलाई दीपावली के नाम से मनाई जाती है। इस दिन, नवविवाहित जोड़े दुल्हन के माता-पिता के घर दिवाली मनाते हैं।

आंध्र प्रदेश

यहाँ दिवाली में हरिकथा या भगवान हरि की कथा का संगीतमय बखान कई क्षेत्रों में किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण की पत्नी सत्यभामा ने राक्षस नरकासुर को मार डाला था। इसलिए, सत्यभामा की विशेष मिट्टी की मूर्तियों की प्रार्थना होती है। अन्य सारे उत्सव दक्षिणी राज्यों की तरह मनाए जाते हैं।

कर्नाटक

पहला दिन, जो अश्विजा कृष्ण चतुर्दशी का दिन है इस दिन लोग तेल स्नान करते हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान कृष्ण ने नरकासुर को मारने के बाद अपने शरीर से रक्त के दागों को मिटाने के लिए तेल से स्नान किया था। तीसरे दिन, दिवाली के दिन को बाली पदयमी के नाम से जाना जाता है इस दिन महिलाएं घरों में रंगोलियाँ बनाती हैं और गाय के गोबर से घरों को लीपती भी हैं। इस दिन राजा बालि से जुड़ी कहानियां मनाई जाती हैं। कर्नाटक में, दिवाली के यह दो दिन मुख्य रुप से मनाएं जाते हैं।

दिवाली पूजा का समय और मुहूर्त

• अमावस्या तिथि की शुरुआत: 6 नवंबर 2018 को 22:27 से
• अमावस्या तिथि का समापन: 7 नवंबर 2018 को 21:32 के बाद
• लक्ष्मी पूजा का मुहुर्त:  7 नवंबर 2018 को 17:57 से 1 9:53 तक: अवधि – 1 घंटा 56 मिनट

आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।