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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30 क्या है?

February 20, 2018
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भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30

भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है तथा धार्मिक अधिकारों और विशेषाधिकारों की सुरक्षा के साथ-साथ जातीय अल्पसंख्यक देश के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की आधारशिला है। हिंदू बाहुल्य क्षेत्र होने के बाद भी भारत का संविधान विशेष रूप से अल्पसंख्यकों के कुछ अधिकारों का समर्थन करता है और भारत के नागरिकों के धर्म, जाति या लिंग के सभी मूलभूत अधिकारों को स्पष्ट करता है। अनुच्छेद 30 को भारतीय संविधान के भाग तृतीय (III) के तहत वर्गीकृत किया गया है और यह अनुच्छेद शैक्षणिक संस्थानों के प्रबंध और अल्पसंख्यकों के अधिकार का समर्थन करता है।

अनुच्छेद 30 की विशेषताएं

अनुच्छेद 30 की आलोचना

भारत में जातीय और साथ ही धार्मिक अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए अनुच्छेद 30 को विभिन्न धाराओं के साथ शामिल किया गया था, वहीं इसमें कुछ कमियाँ भी हैं।

वास्तविक तथ्य यह है कि अल्पसंख्यकों के पास स्थापित शैक्षिक संस्थानों का व्यक्तिगत नियंत्रण होता है, जिसका अर्थ यह है कि सरकार इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

  1. समानता के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए भारत में अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ अधिकारों की रक्षा करने का प्रावधान अनुच्छेद 30 में शामिल है।
  2. धर्म और भाषा के आधार पर सभी अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के अनुसार शैक्षणिक संस्थानों को स्थापित और प्रबंध करने का अधिकार है।
  3. राज्य को यह सुनिश्चित करना होगा कि संपत्ति के अधिग्रहण के लिए जरूरी राशि समुदाय के बजट से अधिक ना हो। इसलिए, यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि अनुच्छेद के तहत प्रत्याभूत अधिकार प्रतिबंधित या रद्द ना किया गया हो।
  4. अनुच्छेद 30 में एक स्तरीय खेल का मैदान बनाने के लिए भी एक उपधारा है। इस अनुच्छेद के अनुसार, देश की सरकार धर्म या भाषा की वजह से किसी भी अल्पसंख्यक समूह द्वारा संचालित शैक्षिक संस्थानों को सहायता देने में कोई भी भेदभाव नहीं करेगी।

इसके गठन और साथ ही प्रबंधन पर नियंत्रण की वजह से भ्रष्टाचार के मामले में, सरकार के पास हस्तक्षेप करने और स्थिति को नियंत्रित करने का अधिकार नहीं होगा। अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यक संस्थानों को शिक्षा अधिनियम के अधिकार के अनुसार, गरीबों के लिए अपनी 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने की छूट देता है, जो भारत के संविधान में निहित मूलभूत अधिकारों के विपरीत है।

इसके अलावा, अनुच्छेद 30 की धारा 1 (ए) के अनुसार, पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण नीति को लागू करने की बाध्यता अल्पसंख्यक संस्थानों की नहीं है। एक बार फिर, भारतीय संविधान के अनुसार यह पिछड़े वर्गों के अधिकारों का खंडन करती है। जबकि यह अनुच्छेद अल्पसंख्यकों के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है और यह वास्तव में गैर-अल्पसंख्यकों को नकारते हुए अपने संस्थानों को “स्थापित और प्रशासित” करने का मौलिक अधिकार है।

जहाँ अल्पसंख्यक संस्थान पूर्ण स्वतन्त्रता का आनंद लेते हैं, वहीं हिंदू संस्थानों को सरकार के हस्तक्षेप का सामना करना पड़ता है, जो गैर-अल्पसंख्यक के खिलाफ भेदभाव है। भारत के सभी नागरिकों के समान अधिकारों को सुनिश्चित करने की कोशिश करते समय अनुच्छेद, सांप्रदायिक असंतुलन को बढ़ावा दे सकता है।

दुर्भाग्य से, अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों के प्रति सरकार के एक सहिष्णु दृष्टिकोण को प्रदान करता है, लेकिन यह प्रोत्साहित करने वाला नहीं है, जैसा कि इसे होना चाहिए। अनुच्छेद 30 के आधार पर अल्पसंख्यक और बहुमत के अलगाव में, संविधान का संपूर्ण उद्देश्य और नागरिकता का लोकाचार खो गया है।