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गांधी जयंती विशेष: छात्रों और शिक्षकों के लिए महात्मा गांधी पर निबन्ध

October 10, 2017
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गांधी जयंती

पूरे भारत में हर साल 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी (गांधी जयंती) की जयंती, एक राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में मनाई जाती है। दुनिया भर में 2 अक्टूबर, अहिंसा अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है। महात्मा गांधी ने भारत को स्वतंत्रत कराने के लिए स्वतंत्रता संग्राम में अथक और निःस्वार्थ रूप से योगदान दिया था। महात्मा गांधी के दो आदर्श सत्य और अहिंसा थे। गांधी जी ने अपने सत्य और अहिंसा के सिद्धांत के माध्यम से भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्रत कराने का मार्ग प्रशस्त किया था। जिसके लिए महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता के नाम से संबोधित किया गया था। वह न केवल भारत के बल्कि विश्व के लिए आशा के संदेशवाहक थे।

महात्मा गांधी ने न केवल अंग्रेजों के खिलाफ भारत के स्वतंत्रता संग्राम में काफी योगदान दिया था, बल्कि अपने दृढ़विश्वासी दृष्टिकोण के माध्यम से दुनिया भर में लोगों को किसी भी प्रकार के भेदभाव – जाति, रंग और धर्म के खिलाफ आवाज उठाने के लिए भी प्रेरित किया था। महात्मा गांधी का गहन उद्धरण, “अपने आप को खोजने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप दूसरों की सेवा में खुद को समर्पित कर दें”, उन्होने भारत के लिए अपने महत्वपूर्ण स्वार्थरहित योगदान का उचित ढंग से बखान किया। एक दृढ़-विश्वासी निस्वार्थी व्यक्ति, मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में, एक हिन्दू व्यापारी परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम करमचंद उत्तमचंद गांधी और माता का नाम पुतलीबाई था।

गांधी जी ने बॉम्बे विश्वविद्यालय में एक वर्ष कानून (लॉ) की पढ़ाई की और उसके बाद उन्होने वर्ष 1891 में स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के लिए यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में दाखिला लिया। महात्मा गांधी को इंग्लैंड की कानूनी परिषद में स्वीकृति मिल गई थी। उन्होंने एक वर्ष बॉम्बे (अब मुंबई के रूप में जाना जाता है) में कानून (लॉ) का अभ्यास किया और बाद में वह दक्षिण अफ्रीका गए, जहाँ उन्होंने जातिवाद का अनुभव किया। महात्मा गांधी ने भारतीय निवासी समुदाय के नागरिक अधिकारों के संघर्ष में, पहले दक्षिण अफ्रीका में अहिंसक सविनय अवज्ञा का काम किया था। उनके अहिंसा और सत्याग्रह दो ऐसे हथियार थे, जिसके माध्यम से वे लोगों के रक्त को बहाए बिना भारत को स्वतंत्रत कराने में सक्षम थे।

महात्मा गांधी ने अपने प्रसिद्ध उद्धरण “जो बदलाव आप दुनिया में देखना चाहते हैं, वह बदलाव अपने आप में करें” से लोगों को काफी प्रभावित किया।

गांधी जी ने अहिंसा, सत्य और आत्म-संयम का पालन किया। जब वह लंदन में थे, तो वहाँ भी वह शाकाहारी भोजन का निष्पक्षतापूर्ण ढंग से उपयोग करते थे और दूसरों को भी शाकाहारी भोजन को अपनाने के लिए प्रेरित करते थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हमेशा सादा जीवन और उच्च विचार में विश्वास किया। उनका रहन-सहन भी साधारण था और वह पहनने के लिए हाथ वाले चरखे द्वारा कच्चे धागे से बुनी हुई पारंपरिक भारतीय धोती और एक शाल उपयोग करते थे। वह हमेशा मांस, शराब और विभेदनहीनता से दूरी बनाकर रहते थे। महात्मा गांधी ने राजनैतिक विरोध के साथ-साथ आत्म-संयम के लिए कई बार लंबे समय तक उपवास किया था।

महात्मा गांधी को वर्ष 1916 में भारत के राज्य बिहार के जिले चंपारण में हजारों भूमिहीन किसानों और कृषि-मजदूरों के नागरिक विरोध के आयोजन के लिए गिरफ्तार किया गया था। महात्मा गांधी ने वर्ष 1916 में चंपारण सत्याग्रह के माध्यम से, किसानों और कृषि-मजदूरों के साथ मिलकर, विनाशकारी अकाल (भुखमरी) के दौरान अंग्रेजों द्वारा किसानों पर बढ़ाकर लगाए गए करों का विरोध किया था। गांधी जी ने अपने स्थिर दृढ़ संकल्प के साथ, वर्ष 1930 में अंग्रेजों के समुद्र के नमक एकाधिकार का विरोध करने के लिए 440 किलोमीटर लंबी पैदल यात्रा (दांडी यात्रा) निकालकर ब्रिटिशों को चौंका दिया था और अंग्रेजों ने भारतीयों द्वारा चुनौती देने के परिणामस्वरूप नमक कर लगाया था। इतिहास में इस यात्रा को दांडी नमक यात्रा के नाम से जाना जाता है और लगभग 60,000 लोगों को दांडी यात्रा के परिणामस्वरूप कैद किया गया था। गांधी जी का मानना था कि सभी इंसान ईश्वर के विशेष व्यक्ति हैं और उनके साथ जाति, रंग, भाषा, पंथ, क्षेत्र, धर्म और जातीयता को नजरअंदाज करते हुए, समान व्यवहार किया जाना चाहिए। महात्मा गांधी को धार्मिक बहुलवाद में विश्वास था और उन्होंने अछूतों को हरिजन (भगवान के बच्चे) कहा था, उन लोगों के सशक्तिकरण के लिए प्रचार किया था। गांधी जी ने वर्ष 1942 में, भारतीयों से आग्रह किया कि वे ब्रिटिशों के साथ सहयोग करना बंद कर दें और इस पहल को भारत छोड़ो आंदोलन के नाम से जाना जाता है।

हालाँकि, स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष की कहानी और अवधि बहुत लंबी थी और भारत को स्वतंत्र कराने लिए कई लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। आखिरकार, भारत को अगस्त 1947 में आजादी मिली, लेकिन आजादी के साथ-साथ भारत को भयावह विभाजन का सामना करना पड़ा। वर्ष 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद भारत और पाकिस्तान के विभाजन के निर्माण से संबंधित धार्मिक हिंसा के बाद, गांधी जी ने धार्मिक हिंसा को समाप्त करने के लिए असंख्य उपवासों को करते हुए, मौत को गले लगा लिया। नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली के बिरला हाउस में, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर तीन गोलियों चलाकर उनकी हत्या कर दी थी।

राष्ट्रपिता काफी पढ़े-लिखे होने के साथ-साथ एक बेहतरीन लेखक भी थे। उनके आदर्श अहिंसा, सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा, अब भी लोगों के जीवन में शक्तिशाली दर्शन बने हुए हैं और इससे दुनिया भर के लोगों को भेदभाव का विरोध करने के लिए साहस प्राप्त करने में मदद मिलती है। उन्होंने अपने जीवनकाल के दौरान कई पुस्तकें जैसे एक आत्मकथा – सत्य के साथ मेरे प्रयोग की कहानी, हिंद स्वराज या भारतीय गृह नियम, स्वास्थ्य की कुंजी आदि पुस्तकें लिखीं। महात्मा गांधी ने देश से जीवनभर निस्वार्थ प्रेम किया और अपनी कड़ी मेहनत, आत्म संयम, सच्चाई और अहिंसा के माध्यम से, जो लोग भारतीयों के बीच विभिन्न स्तरों पर भेदभाव का काम करते हैं और उनका विरोध करते रहे हैं, उनको हासिल करने के लिए उम्मीदों को प्रज्वलित किया है।