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मानवाधिकार दिवस: जहाँ भारत लोगों के अधिकारों को बचाने में खड़ा है

December 7, 2017
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मानवाधिकार दिवस

मानवाधिकार वह दिवस है, जो यूडीएचआर (मानव अधिकारों की सार्वभौमिक वर्णन) को अपनाने वाले संघीय महासभा के निर्णय को सम्मानित करने के लिए आरक्षित है। वर्ष 1950 से यह दिवस अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 10 दिसम्बर को मनाया जाता है और इस दिन सभी मानवाधिकारों को सम्मानित किया जाता है। हर साल 10 दिसंबर को मानवाधिकार दिवस मनाने के लिए, दुनिया भर में राजनीतिक सम्मेलनों और शानदार बैठकों का आयोजन किया जाता है। इस दिन को विशेष बनाने के लिए कई प्रदर्शनियों, तर्क-वितर्क और कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। कई सरकारी, गैर-सरकारी और नागरिक मंडलियाँ इसके महत्वपूर्ण समारोहों में भाग लेती हैं।

हम मानवाधिकार दिवस क्यों मनाते हैं?

जाहिर है, पारित अधिकार पूरे मानव जाति के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन हर साल इस दिवस को एक विशेष दिन ही क्यों मनाया जाता है? खैर, इसके समारोहों का आयोजन करने के लिए जागरूकता आवश्यक है। यह दिवस सभी जातियों और सभी धर्मों के लोगों को सामाजिक, शारीरिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक कल्याण के आम लक्ष्यों से अवगत कराने का काम करता है। यह दिवस कमजोर समूहों जैसे कि महिलाओं, बच्चों, एलजीबीटी(गे) लोगों, अल्पसंख्यक समूहों के व्यक्तियों या विकलांग व्यक्तियों के लोगों के अधिकारों को बढ़ावा देने में भी अग्रणी भूमिका निभाता है। इस समारोह में मानव जीवन की स्थिति का उत्थान करने में, संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रयासों पर प्रकाश डालना भी आवश्यक है।

भारत इसके कार्यों के प्रति कितना सचेत है?

भारत एक बड़े पैमाने पर ग्रामीण आबादी के साथ-साथ एक विकासशील देश है, लेकिन फिर भी यह मानवाधिकार (मानव अधिकार) के जोखिमों का उचित समाधान नहीं कर पा रहा है। मानवाधिकार के जोखिमों को ध्यान में रखते हुए, सरकार ने वर्ष 1993 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) की स्थापना की थी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) एक स्वायत्त सार्वजनिक निकाय है, जो देश के नागरिकों के अधिकारों को बढ़ावा देने और उनके सुरक्षा संबंधी जैसे कार्यों का प्रभावी ढंग से देखभाल करता है। आयोग का मुख्य एजेंडा सभी व्यक्तियों के जीवन, समानता, स्वतंत्रता और गरिमा से संबंधित अधिकारों पर आधारित है।

यहाँ नीचे समस्त समाज की भलाई हेतु भारत में लागू अधिकारों की सूची प्रस्तुत है।

भोजन का अधिकार:

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस अधिकार को लागू करने का आदेश दिया गया था और उसके बाद इसने काफी प्रगति भी की। वर्ष 2011 में पारित भोजन बिल का उद्देश्य शहरी आबादी के लिए 50 प्रतिशत और ग्रामीण इलाकों के लिए 75 प्रतिशत भोजन की सब्सिडी (धन-रूपी सहायता) प्रदान करना है। इस अधिकार के तहत’ गरीबी रेखा के नीचे’ जीवन यापन करने वाले घरों के समूह को बहुत कम लागत पर गेहूँ, चावल और मोटा अनाज (दाल) प्रदान किया जाएगा।

शिक्षा का अधिकार

वर्ष 2009 में संसद द्वारा 6 से 14 साल की आयु के बीच के बच्चों के लिए नि:शुल्क शिक्षा का आदेश दिया गया था। एनएचआरसी का मानना है कि मानवाधिकार की शिक्षा स्कूलों और कॉलेजों के छात्रों के पाठ्यक्रम का एक अहम हिस्सा है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार

भारत का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जहाँ कोई भी चाहें वह स्त्री हो या पुरुष अपनी राय और विचारों को स्वतंत्र रूप से व्यक्त कर सकता है। कानून भी विचार-विमर्श के समय खुले विचारों और स्वतंत्र प्रवाह को अपनाना पसंद करता है। यह अधिकार हमें अपने राजनैतिक मान्यताओं को खुलेतौर पर व्यक्त करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है और इसलिए यह अधिकार उचित निर्णय लेने में भी बेहतर भूमिका निभाता है।

बल पूर्वक मजदूरी (श्रम) से स्वतंत्रता का अधिकार

संविधान में सभी को उल्लिखित अधिकार बल पूर्वक मजदूरी को करने से प्रतिबंधित किया गया है। कानून भी अमानवीय परिस्थितियों के तहत काम प्रदान करने वालों के विरुद्ध है।

मानवाधिकार अनिवार्य रूप से हर किसी के लिए आवश्यक है। हालाँकि, कभी-कभी उनसे अवगत होना मुश्किल हो सकता है। एक मानव-धर्म के हिसाब से सभी को यह सुनिश्चित कराना हमारा कर्तव्य है कि सभी इन अधिकारों का स्वतंत्रा से प्रतिपालन कर सकते हैं।