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नाथूराम गोडसे और महात्मा गाँधी की हत्या

January 30, 2019
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नाथूराम गोडसे और महात्मा गाँधी की हत्या

शहीद दिवस- महात्मा गाँधी की पुण्य तिथि

भारत में प्रत्येक वर्ष 30 जनवरी को शहीद दिवस मनाया जाता है क्योंकि वर्ष 1948 में इसी दिन “राष्ट्रपिता” मोहनदास करमचँद गाँधी की नाथूराम गोडसे द्वारा हत्या कर दी गई थी। लोगों की व्यापक अपील के कारण, मोहनदास करमचंद गाँधी को महात्मा गाँधी के रूप में जाना जाने लगा। लोग उन्हें प्यार से बापू कहकर भी बुलाते थे। एक प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी, महात्मा गाँधी ने अंग्रेजों के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन, सत्याग्रह, दांडी मार्च और भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की। समाज के विभिन्न वर्गों से पुरुष और महिलाएं महात्मा गाँधी के साथ स्वतंत्रता के संघर्ष में शामिल हुए थे।

प्रत्येक वर्ष इस दिन (30 जनवरी) को शहीद दिवस के रूप में जाना जाता है, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, रक्षा मंत्री, और तीन सेवा प्रमुख, राजघाट में महात्मा गाँधी की समाधि पर फूलों से श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इकट्ठा होते हैं। सशस्त्र बलों के कर्मचारियों और इंटर-सर्विसेस दल सलामी देकर श्रद्धांजलि देते है। पूरे देश भर में सुबह के 11 बजे महात्मा गाँधी और अन्य शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया, दो मिनट का मौन धारण करवाया जाता है।

नाथूराम गोडसे कौन थे?

नाथूराम विनायक गोडसे एक दक्षिणपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता और हिंदू राष्ट्रवाद के एक समर्थक थे। नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली के प्वाइंट ब्लैंक रेंज में महात्मा गाँधी के सीने परतीन बार गोली चलाकर उनकी हत्या कर दी थी।

नाथूराम गोडसे का जन्म पुणे के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। नाथूराम गोडसे हाई स्कूल की शिक्षा को बीच में ही छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में शामिल हो गए। नाथूराम गोडसे अपने भाइयों के साथ, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के सदस्य बन गए। बाद में, नाथूराम गोडसे ने स्वतंत्रता के मामले में समर्थन देने के लिए “हिंदू राष्ट्रीय दल” नामक एक संगठन की स्थापना की। नाथूराम गोडसे दोनों संगठनों के सदस्य थे।

नाथूराम गोडसे ने स्वयं ही “हिंदू राष्ट्र” नामक समाचार पत्र का संपादन भी किया था। नाथूराम गोडसे एक विपुल लेखक थे और अक्सर अपने विचारों और लेखों को लिखा करते थे और फिर उन्हें विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित किया जाता था। अपने जीवन के प्रारंभिक दिनों के दौरान, नाथूराम गोडसे महात्मा गाँधी के अनुयायी थे। नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी द्वारा शुरू किए गए ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ का पूर्ण रूप से समर्थन किया और सक्रिय रूप से इसमें भाग भी लिया था। बाद में, नाथूराम गोडसे महात्मा गाँधी के विचारों के खिलाफ हो गए और यह मानने लगे थे कि महात्मा गाँधी ने बार-बार “भूख हड़ताल” की नीति का उपयोग करके हिंदुओं के हितों को नुकसान पहुँचा रहे हैं।

नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या क्यों की?

बहुत से सिद्धांत, अदालत की कार्यवाही के रिकॉर्ड, और कई लेख महात्मा गाँधी की हत्या के विषय पर कई अलग-अलग तरह की बाते करते हैं ,लेकिन अभी भी गाँधी जी को मारने का सटीक कारण निर्धारित नहीं हो पाया है। यह पता करने के लिए कि कौन सा राजनीतिक दल इसमें शामिल था, बहुत छानबीन की गई, परन्तु जो भी राजनीतिक दल इस हत्या में शामिल था, तो उसके पास उनकी हत्या करवाने की कोई विशेष वजह नहीं थी। नाथूराम गोडसे ने कई बार महात्मा गाँधी की हत्या करने की योजना बनाई और आखिरकार 30 जनवरी को, इससे पहले कि वह अपनी शाम की प्रार्थना समाप्त कर पाते, नाथूराम गोडसे महात्मा गाँधी की हत्या करने में सफल हो गए।

गोडसे की कठोर कार्रवाई के पीछे कुछ कारण निम्न हैं

इस मुद्दे पर, नाथूराम ने स्पष्ट रूप से अदालत की कानूनी कार्यवाही में कहा था, “इसका कारण पूर्ण रूप से राजनीतिक और केवल राजनीतिक वजह है।

नाथूराम गोडसे ने सोचा कि देश का विभाजन करने के लिए गांधी जी जिम्मेदार थे और दोनों पक्षों के कृपा पात्र बनना चाहते थे। गोडसे का मानना था कि गांधी जी के लिए सुधार गृह से अच्छा कोई रास्ता नहीं हो सकता है और देश के एक भावुक उत्साही प्रेमी होने के नाते, ये पूरी राजनीतिक बातें जिन्होंने समाज में अपनी जगह बना ली थी और वे इसके खिलाफ कार्रवाई करने विश्वास था, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इसलिए नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या करने की कोशिश की।

गोडसे ने सोचा कि वर्तमान सरकार मुसलमानों का समर्थन गलत तरीके से कर रही थी और यह पूरी तरह से गांधी जी की नीतियों की वजह से था।

जब उन्हें पता चला कि कश्मीर संकट के बावजूद जिन्ना की सहमति पर गांधी जी पाकिस्तान यात्रा पर गए थे, तब वह और परेशान हो गये थे। गोडसे ने सोचा कि यह सब मुसलमानों के प्रति गांधी जी की दयालुता के कारण ऐसा किया है, लेकिन वह हिंदुओं की भावनाओं की परवाह नहीं करते हैं। नाथूराम गोडसे ने स्वयं कहा था कि, “वह एक संत हो सकते हैं, लेकिन एक राजनीतिज्ञ नहीं है”।

महात्मा गांधी ने कांग्रेस के सदस्यों से उनके शब्दों के बावजूद पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये का भुगतान न करने के अपने फैसले को रद्द करने का आग्रह किया। यहाँ तक कि उन्होंने इस काम के लिए “भूख हड़ताल” के तरीके को भी अपनाया। गोडसे का मानना था कि गांधी जी मुसलमानों के लिए उपवास रखते थे, जिसने बाद में उन्हें गांधी जी की नृशंस हत्या की कार्रवाई करने के लिए प्रेरित किया।

निष्कर्ष:

महात्मा गांधी की हत्या के बाद, नाथूराम गोडसे को गिरफ्तार कर लिया गया था और उन पर मुकदमा चलाया गया। 8 नवंबर 1949 को उनका परीक्षण पंजाब उच्च न्यायालय, शिमला में किया गया था। 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे को अंबाला जेल में फांसी दे दी गई थी।