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बॉलीवुड की “आदर्श” भारतीय नारी

September 13, 2018
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बॉलीवुड की "आदर्श" भारतीय नारी

एक स्त्री अपनी आठ मीटर की साड़ी (और संस्कार) के साथ अपने आपको सभ्यता और शिष्टता के आचरण में ढाले रखती है। वह कभी भी मायूस नहीं होती, उसके चेहरे पर हर वक्त मुस्कराहट रहती है। वह अपने परिवार को खुश रखने के लिए अपने माथे पर आने वाली शिकन को भी मिटा देती हैं, जो उसकी कर्तव्य-परायणता का अनुस्मारक है। एक तरफ, वह अपने घर के कर्तव्यों का पालन करती है, तो दूसरी तरफ, दुनिया भर के ताने भी सुनती है। जो प्राचीन रीति-रिवाज को शौक से अपनाती है – वह भारतीय नारी कहलाती है।

अतीत की यादें

मुझे याद है जब मैं छोटी थी, मैंने पहली बार ‘हम साथ-साथ है’ जैसी आदर्शवादी फिल्म देखी थी। उन दिनों यह फिल्म हर भारतीय परिवार में बहुत ज्यादा देखी गई और इस फिल्म में सबसे पहली ऐसी चीज जिस पर मेरा ध्यान केन्द्रित हुआ वह था, परिवार की बहुओं के मंहगे कपड़े या गहने। चमकदार साड़ियों और गहनों से लदी उन औरतों को घर में बहुत ही प्रसन्नचित्त होकर काम करते हुए दिखाया गया था। सही कहा ना? बेशक, उनकी वेशभूषा परिवर्तित नहीं होती, चाहे वे रसोई घर में काम करें या बिस्तर पर सोने के लिए जाएं। इस बीच, पुरुषों को खाने की मेज पर चारों ओर बैठे दिखाया गया था (जो बेशक उन औरतों की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो रसोई घर में खाना बना रहीं हैं)। पुरुषों को परिवार की आर्थिक सहायता करते हुए दिखाए गया था। इस फिल्म में, आपको याद होगा कि, एक महिला शादी से पहले डॉक्टर होने के लिए अभ्यास करती है, लेकिन किसी को उसके डॉक्टर बनने में कोई दिलचस्पी नहीं है?

उस समय की एक और फिल्म ‘हम आपके हैं कौन’ में अभिनेत्री को दुनिया की सबसे संस्कारी बहू के रूप में दिखाया गया था। वह एक ऐसे आदमी से शादी करने के लिए तैयार हो जाती है जिसको वह जानती तक नहीं (मेरा मतलब अरेंज मैरिज से है)। इसके बाद वह एक बच्चे को जन्म देती है – यह सब बहुत ही कम समय में होता है। कौन कहता है कि सुंदर और सुशील लड़कियां भारत में हैं ही नहीं?

कई सालों बाद अंततः मैंने इन सभी महिला पात्रों के बीच पूर्ण समानताओं को देखा। शायद ही किसी को अपने कैरियर को लेकर आवेशी होते दिखाया गया हो। क्योंकि वे परिवार वालों की इच्छानुसार कार्य करती हैं, लेकिन यह बात सौ फीसदी सच है कि वे अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं को खत्म कर देती हैं। इस तरह यदि महत्वाकांक्षी महिलाओं का प्रतिनिधत्व करना कोई बुरी बात है तो भगवान न करें कि महिलाएं महत्वाकांक्षी हों, कोई भी फिल्म निर्माता एक महिला को उसकी गरिमा और परिवार में उसकी प्रतिष्ठा से हटके कुछ और दिखा पाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। तो सवाल क्यूं उठते हैं।

वाकआउट करना

एक औरत के संबंध में व्यक्तित्व की भावना का न होना बॉलीवुड के लिए कितना आकर्षक है? सबसे संदेहास्पद फिल्म विवाह (2006) में पूनम जैसे पात्रों को पूरी तरह से पुरुषों की छाया में रहते हुए दिखाया गया है, इसके लिए पुरुष पात्र की सराहना भी की गई है। इसके अलावा, औरतों की सुन्दरता को दिखाने के लिए वेस्टर्न और छोटे कपडों का चलन और शराब का सेवन करना, बॉलीवुड की प्रथा है। तो फिर एक महिला के चरित्र को मापने के लिए इतने अपमानजनक मानक क्यूं?

फिल्म उद्योग की विनम्र और पारंपरिक अभिनेत्री पूनम काफी समय से सम्माननीय रही हैं, पर इससे बॉलीवुड के मानदंडों को नष्ट होते समय नहीं लगेगा। इसी बीच, पीकू और लिपिस्टिक अन्डर माई बुर्का जैसी फिल्मों ने हमारे भरोसे को कायम रखा है। हमारे सिनेमाघरों को आज-कल की महिलाओं का और अधिक निरूपण करने की जरूरत है। ऐसे महिला पात्र जो ढीठ हैं, नई सोच वाली हैं, बेशक साड़ी और गहनों के बंधन में पड़ना नहीं चाहतीं।

 

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बॉलीवुड धीरे-धीरे महिला सशक्तिकरण के बदलते आयामों के संदर्भ में आ रहा है। काफी समय से, हमने इसे "एक आदर्श महिला" होने का क्या अर्थ है, के लिए बहुत रूढ़िवादी होते देखा है। आइए इस पर एक नजर डालते हैं।