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भारत-बांग्लादेश के बीच संबंध

July 23, 2018
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भारत-बांग्लादेश के बीच संबंध

सन् 1971 में पाकिस्तान के विखंडन के साथ भारतीय उपमहाद्वीप में भारी बदलाव आया था, क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान पश्चिम पाकिस्तान से विघटित हो गया था। भारत ने पूर्वी पाकिस्तान में अवामी संघ के नेता शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में लगातार संघर्षों का समर्थन किया जिससे बांग्लादेश का गठन हुआ। भारत बांग्लादेश की स्वतंत्रता का मुखर था और इस देश की स्थापना में भारत ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। भारत प्रबल भौगोलिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और वाणिज्यिक संबंधों के कारण बांग्लादेश के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ोसी है। दशकों की मेहनत और आर्थिक सुधारों के बाद बांग्लादेश ने खुद को एक महत्वपूर्ण विकास अवधि में लाया है। इस क्षेत्र में बांग्लादेश की रणनीतिक स्थिति के कारण आक्रामक विस्तारवादी चीन और अमेरिका की अप्रत्याशित प्रकृति दोनों इस क्षेत्र को अवसर हासिल करने और क्षेत्र में अपनी ताकत बढ़ाने की सोंच रहे हैं। भारत बांग्लादेश के ‘सदाबहार मित्र’ के रूप में उभरा है क्योंकि भारत का क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव बढ़ रहा है, जिसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है। भारत-बांग्लादेश एक नफरत प्यार का संबंध साझा करता है लेकिन यह दोनों देशों को कई मुद्दों पर सहयोग करने के लिए रोक नहीं लगाता।

बांग्लादेश का इस्लामिक राज्य बनना और भारत के साथ समस्याएं

बांग्लादेश भाषाई राष्ट्रवाद के आधार पर स्वतंत्रता प्राप्त करने के चार साल बाद, सन् 1975 में, धीरे-धीरे राष्ट्रवाद से दूर जाने लगा, जिसके कारण इसे इस्लामवादी राज्य बनाने के लिए मुक्ति संघर्ष होने शुरू हो गए जिन्होंने बांग्लादेशी राष्ट्रवाद में अनिवार्य शक्ति के रूप में कार्य किया। इस्लाम को महत्व देने, भारतीय सेना के निर्माण और साझा जल संसाधनों, तटवर्ती सीमाओं और पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशियों के अवैध आप्रवासन पर द्विपक्षीय विवादों के साथ बांग्लादेश की चिंता के साथ अंतर्निहित, जल्द ही भारत-बांग्लादेश संबंधों में विवाद का कारण बन गया। उसी वर्ष हाल ही में स्वतंत्र हुए देश में ‘राष्ट्र के पिता’ शेख मुजीबुर रहमान की हत्या कर दी गई जो देश के इतिहास में सबसे बुरे अध्याय के रूप में देखी गई। इस घटना ने दोनों देशों के बीच संबंधों को तोड़ दिया क्योंकि बांग्लादेशियों को निराशा महसूस हुई जब भारत बांग्लादेश की सामाजिक-आर्थिक कठिनाइयों के दौरान उसका समर्थन नहीं कर सका।

बांग्लादेश की स्वतंत्रता के बाद से भारत तीन मुद्दों पर चिंतित है: बांग्लादेश की आंतरिक स्थिरता, चीन के साथ सामरिक संबंध और भारत के जनजातीय विद्रोहियों के साथ देश की कथित भागीदारी। भारत लोकतंत्र का उत्साही समर्थक रहा है और बांग्लादेश में लोकतंत्र को अस्थिर करने के इरादे को नकार दिया, इसके बजाय, भारत की पूर्वोत्तर रक्षा के लिए बांग्लादेश का रणनीतिक स्थान महत्वपूर्ण है।

भारत-बांग्लादेश के बीच समस्याओं के कारण

सीमा विवाद

रक्षा मंत्रालय के अनुसार भारत बांग्लादेश के साथ पांच राज्यों के माध्यम से 4351 कि.मी. तक फैली भूमि सीमा को साझा करता है, जैसे, पश्चिम बंगाल (2217 कि.मी.), असम (262 कि.मी.), मेघालय (443 कि.मी.), त्रिपुरा (856 कि.मी.) और मिजोरम (318 कि.मी.)। यह सीमा 5 राज्यों में 25 जिलों से होकर गुजरती है। पोरस बार्डर को अक्सर भारत से बांग्लादेश तक खाद्य वस्तुओं, मवेशी, औषधियों और दवाइयों की तस्करी के लिए एक मार्ग के रूप में उपयोग किया जाता है। बांग्लादेश से हजारों अवैध आप्रवासियों ने पिछले कुछ वर्षों में रोजगार की तलाश और अपने जीवन में सुधार के लिए भारत की सीमा में आए हैं। अवैध प्रवासियों और भारतीय सैनिकों के बीच हुई हिंसा का सामना करने के लिए भारतीय सीमा गश्ती पुलिस द्वारा देखते ही गोली मारने की विवादित नीति लागू की गई है।

जल विवाद

भारत और बांग्लादेश की सीमाओं से 54 अलग-अलग आकार की नदियों का आवागमन होता है। सन् 1996 दोनों देशों के लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष था क्योंकि इस वर्ष गंगा जल के बँटवारे पर उन्होंने सफलतापूर्वक एक समझौता किया था। हालांकि, फराक्का बैराज बनाने और उसे संचालित करने की भारतीय योजना विवाद का प्रमुख कारण रही है। फराक्का बैराज के निर्माण का उद्देश्य गंगा नदी की भागीरथी-हुगली शाखा के कम प्रवाह को बढ़ाना है ताकि कोलकाता बंदरगाह में पानी की गहराई को बढ़ाया जा सके, जो सील्ट के कारण संकट में है। हालांकि, बांग्लादेश में सिंचाई निकासी में वृद्धि हुई, लेकिन फराक्का में लीन सीजन (वर्षा की कमी वाला समय) का सहभाजन भारत और बांग्लादेश के बीच एक विवाद बन गया। लीन सीजन (वर्षा की कमी वाला समय) के दौरान अपर्याप्त पानी दोनों देशों में आंकी की गई मांगों को पूरा करने में असमर्थ है, जिसके कारण यह सीमावर्ती देशों के बीच संघर्ष का मूल कारण बन गया है।

अवैध प्रवासन

अवैध प्रवास इन दोनों देशों के बीच सबसे समस्यात्मक मुद्दा रहा है। सन् 1971 से, जब स्वतंत्रता का युद्ध समाप्त हुआ तब बांग्लादेश का निर्माण हुआ और लाखों बांग्लादेशी प्रवासी (उनमें से अधिकांश अवैध) भारत में पड़ोसी राज्यों की सीमा पार कर आ गए। हालांकि, भारत सरकार ने इनमें से कुछ अवैध आप्रवासियों को निर्वासित करने का भी प्रयास किया, लेकिन आप्रवासियों की बड़ी संख्या और दोनों देशों के बीच पोरस बार्डर ने भारत सरकार के प्रयासों को नाकाम कर दिया। बांग्लादेश की आजादी के समय भारत के पश्चिम बंगाल राज्य में कम से कम 10 लाख बांग्लादेशियों ने प्रवेश किया था। अवैध आप्रवासियों ने देश की आंतरिक सुरक्षा पर प्रत्यक्ष रूप से खतरा उत्पन्न करने के साथ-साथ भारत के पूर्वोत्तर में सामाजिक निर्माण पर भी असर डाला।

सुरक्षा सम्बन्धी चिंताएँ

पिछले कुछ वर्षों में, विद्रोह ने भारत और बांग्लादेश के बीच संबंधों को प्रभावित किया है। सन् 1956 से, पूर्वोत्तर भारत, निवासियों के बीच बढ़ते जातीय अलगाववाद के कारण विद्रोह का सामना करने वाला तथा बुरी तरीके से आघात पहुँचाने वाला क्षेत्र रहा है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी, आईएसआई पर बांग्लादेश से पूर्वोत्तर भारत में विद्रोहियों की घुसपैठ, उनका सहयोग और वहीं से उनका परिचालन करने का आरोप लगाया गया है। लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (यूएलएफए), त्रिपुरा नेशनल लिबरेशन (एनएलएफटी)और नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफएम) प्रमुख विद्रोही समूह हैं जो पूर्वोत्तर भारत में आतंक का माहौल बनाए हुए हैं।

भारत-बांग्लादेश के बीच आर्थिक संबंध

अर्थ तंत्र ने भारत और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने में एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में कार्य किया है। दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों के बहुआयामी, व्यापार लेन देन, क्रेडिट व्यवस्था, संयुक्त उद्यम, पारगमन सुविधाओं और परिवहन विकास को अपनाया गया है। यहाँ तक कि प्रतिकूल राजनीतिक स्थितियों के दौरान भी, इन देशों ने आर्थिक संबंधों को बिना किसी बाधा के जारी रखा और प्रसारित किया है। वर्ष 1982, बांग्लादेश के लिए एक महत्वपूर्ण वर्ष था क्योंकि इसी वर्ष इसने उदारीकरण के मार्ग की शुरूआत की थी। भारत ने दोनों देशों के बीच व्यापार संबंधों के कारण प्रमुख लाभ उठाए हैं। बांग्लादेश भारत के निर्यात के लिए सबसे महत्वपूर्ण बाजारों में से एक के रूप में कार्य करता है।

पिछले कुछ दशकों से, बांग्लादेश सार्क क्षेत्र में भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार रहा है। सन् 1985-90 के दौरान, भारत के साथ बांग्लादेश का व्यापार दुनिया और सार्क देशों के कुल व्यापार से अधिक हो गया था। 1988-89 से 1992-93 की अवधि के बीच, बांग्लादेश के निर्यात में 293 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि भारत का कुल निर्यात 164 प्रतिशत बढ़ा। 1995 में, भारत बांग्लादेश के निर्यातकों के रूप चीन को पीछे छोड़ते हुए पहले स्थान पर पहुंचा और भारत ने 2005-06 तक यही स्थिति बनाए रखी तथा एक दशक तक इसका लाभ उठाया, जिसके बाद चीन फिर सेनिर्यातकों में पहले स्थान पर आ गया। चीन अब भी पहले स्थान पर बना हुआ है।

बांग्लादेश में भारत का कुल निर्यात वित्तीय वर्ष 2011-12 में 5.84 अरब डॉलर तक पहुंच गया, तब से दोनों देशों के बीच व्यापार में गिरावट आ गई है। 2014-15 में 4.6 प्रतिशत की मामूली वृद्धि हुई, जो इसे 6.4 अरब डॉलर तक ले गई, हालांकि 2015-16 में 6.4 प्रतिशत (6.03 अरब डॉलर) तक की मामूली गिरावट आई थी। 2016-17 में निर्यात 13 प्रतिशत बढ़ कर, मंहगी मशनरी और परियोजना कार्यान्वयन के लिए उपकरणों के निर्यात के कारण,6.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया। भारत-बांग्लादेश के बीच संबंध तीन प्राथमिक स्तंभों, समेकित आतंकवादी पहल, व्यापार एवं वाणिज्य तथा द्विपक्षीय विश्वास और आत्मविश्वास निर्माण प्रयास, के आधार पर मजबूत हो सकता है।

 

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भारत और बांग्लदेश के बीच संबंध
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बांग्लादेश ने 1971 में भारत द्वारा दिए गए समर्थन से पश्चिम पाकिस्तान के बंधनों से स्वतंत्रता प्राप्त की। तब से दोनों ने एक यात्रा की शुरूआत की जिसने देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में सुधार किया है।