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कितने सुरक्षित हैं स्कूल में बच्चे?

April 28, 2018
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कितने सुरक्षित हैं स्कूल में बच्चे?

हम अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए स्कूल भेजते हैं और कुछ दशकों पहले हमें स्कूलों में अपने बच्चों की सुरक्षा पर बहुत ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं थीं, हमने इसे जारी रखा, क्योंकि हमेशा ‘सुरक्षित’ शब्द स्कूल का समानार्थी बन गया था, स्कूल का मतलब ही सुरक्षा होता था। लेकिन दुर्भाग्यवश, अब यह स्थिति नहीं रही है।

1995 में, मंडी डबवाली में, एक पुरस्कार वितरण समारोह में आग लगने से कई स्कूली बच्चों की मौत हो गई।

2001 में, भुज में आए भूकंप में 971 स्कूली बच्चों की मौत हो गई थी।

2004 में, कुम्भकोणम में एक स्कूल में आग लगने से 94 बच्चों की मौत हो गई।

2013 में, बिहार के एक स्कूल में मिड-डे-मिल के बाद 24 बच्चों की खाद्य विषाक्तता (फूड प्वाइजनिंग) होने से मौत हो गई।

2014 में, दो जिम प्रशिक्षकों ने 6 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार किया था।

यह सूची अंतहीन है, प्राकृतिक आपदाओं से लगाकर मानव निर्मित दुर्घटनाओं तक और लोगों की लापरवाही से लगाकर उनके द्वारा किए जा रहे जानवरों जैसे व्यवहार तक, अब स्थिति यह आ गई है कि हमारे बच्चे स्कूल में लंबे समय तक सुरक्षित नहीं हैं। इनमें से कुछ आपदाओं को सरल रोकथाम और तत्परता से रोका जा सकता था। माता-पिता के रूप में हमें, यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम स्कूल के मानकों और नियमों से परिचित हों जिनका स्कूल द्वारा पालन किया जाना चाहिए और उनके अनुपालन पर सतर्कता रखनी चाहिए।

कुछ समय पहले पाकिस्तान में एक स्कूल पर हुए आतंकवादी हमले से भारत में स्कूल जाने वाले बच्चों के अभिभावकों को झटका लगा और उन्हें और अधिक जागरूक होना चाहिए।

स्कूलों में आपदा प्रबंधन   

स्कूल में बच्चों के लिए एक सुरक्षित वातावरण बनाना सबसे महत्वपूर्ण कार्य है, क्योंकि किसी भी आपत्ति की स्थिति में वे सबसे कमजोर होते हैं। गृह मंत्रालय का राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण यह दृढ़ता से महसूस करता है कि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक संरचनात्मक, साथ ही गैर-संरचनात्मक हस्तक्षेप होना चाहिए। संरचनात्मक हस्तक्षेप में स्कूल भवनों के लिए निर्धारित दिशानिर्देशों पर सख्त जाँच शामिल होगी, जबकि गैर-संरचनात्मक हस्तक्षेप का मतलब आपदा प्रबंधन के बारे में कर्मचारियों, शिक्षकों और छात्रों को शिक्षित करना होगा। मंत्रालय ने जोर देकर कहा है कि प्रत्येक स्कूल, शैक्षिक संस्थानों, आपातकालीन अधिकारियों, शिक्षकों, छात्रों और यहां तक कि समाज को बड़े पैमाने पर एक स्कूल सुरक्षा कार्यक्रम को चलाया जाना चाहिए। इस कार्यक्रम के तहत, छात्र सुरक्षा उपायों के बारे में जानें, ताकि वे भविष्य में आपदा प्रबंधक बन सकें, जबकि एक आपदा लचीला समाज समुदाय को शिक्षित करने के उद्देश्य से बनाया गया है। बच्चे को शिक्षित करने के कुछ तरीके और साधन हैं:

  • अभियान, रैलियों आदि के माध्यम से जागरुकता फैलाना
  • आग आपदाओं और भूकंप के लिए कृत्रिम अभ्यास का आयोजन
  • प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षण
  • आदेश और नियंत्रण की एक स्पष्ट रूपरेखा बनाएं, ताकि आपातकालीन स्थिति के समय में कोई गड़बड़ी न हो
  • आग्नि शामक का उपयोग करें

दुनिया भर के स्कूलों पर आतंकवादी हमलों की वजह से, भारत को ऐसी किसी भी घटना के लिए खुद को तैयार करना चाहिए।

स्कूलों को अज्ञात व्यक्तियों के प्रवेश के खिलाफ माता-पिता के लिए पहचान पत्र जारी करके स्कूलों को आवश्यक सावधानी बरतनी चाहिए। सुरक्षा जाँच सख्त होनी चाहिए। छात्रों को पेशेवर सलाहकारों द्वारा एक बंधक होने की स्थिति में व्यवहार करने के तरीकों के बारे में कुछ सुझाव दिए जा सकते हैं।

अपने बच्चे के बचपन को सुरक्षित रखें

दुर्भाग्यवश स्कूलों में बाल उत्पीड़न और बलात्कार बहुत आम और रोजमर्रा की खबरें बन गई हैं। वास्तव में, बैंगलोर के एक स्कूल में 6 साल के बच्चे के बलात्कार के बाद, कई स्कूलों ने बच्चों के प्रति अपनी कानूनी और नैतिक दोनों जिम्मेदारियां त्याग दी हैं। बैंगलोर में एक माता-पिता का उनकी बच्ची के स्कूल से हस्ताक्षारित फॉर्म प्राप्त हुआ, जो इस प्रकार हैः

जिसमें यह लिखा था: “स्कूल द्वारा आयोजित किए जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों में मेरे बच्चे की भागीदारी के बारे में, मैं प्रबंधन, अधिकारियों, स्कूल के कर्मचारियों और स्कूल के एजेंटों के ऊपर छोड़ता हूँ, अभिभावक और बहनों की चिंताओं में आधिकारिक तौर पर कार्यक्रम से जुड़े हुए अन्य किसी भी व्यक्ति, किसी भी माध्यम से व्यक्तिगत संपत्ति, बीमारी या चोट, नुकसान या हानि जैसा कुछ होता है, तो सारा दायित्व स्कूल का है, क्योंकि हमारा बच्चा किसी भी समारोह में भाग ले रहा है, तो उसके साथ किसी भी तरह की घटना हो सकती है।

इस प्रकार माता-पिता के रूप में हमें आगे बढ़ने और अपने बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता है और यह देखने की कि उनका बचपन उनसे छीना तो नहीं जा रहा है।

  • बच्चे को शिक्षित करें; उम्र के अनुसार, बच्चे को अच्छे स्पर्श और बुरे स्पर्श के बीच अंतर सिखाएं।
  • बच्चे को विश्वास दिलाएं, कोई बात नहीं, क्या मामला है, उनके लिए हमारा प्यार बिना शर्त के है।
  • बच्चे के साथ हर तरीके से बातें करें और सभी मुद्दों पर खुल कर बातें करें।
  • स्कूल में एक दोस्त प्रणाली बनाएँ, ताकि बच्चा हमेशा एक दोस्त की संगत में हो। और साथ ही हर दोस्त को हर समय इस बात की जानकारी रखनी चाहिए कि कौन किधर गया है।
  • शारीरिक शिक्षा और कला के शिक्षकों समेत, सभी शिक्षकों के साथ नियमित रूप से बातचीत करें। किसी भी नए नियुक्त शिक्षक से तुरंत मिलें।

सक्रियतावादी और माता-पिता महसूस करते हैं कि देश भर के स्कूलों के लिए बाल संरक्षण नीति, या सीपीपी अनिवार्य होनी चाहिए। सीपीपी बच्चे को किसी भी प्रकार के दुरुपयोग, हानि, उपेक्षा और शोषण से बचाता है। अभी तक, बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए दिल्ली आयोग के दिशानिर्देशों के आधार पर सीपीपी केवल दिल्ली राज्य द्वारा अपनाया गया है।

निष्कर्ष

2007 में, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने एक जाँच की, जिसमें उन्होंने पाया कि 5 से 12 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों को दुर्व्यवहार और शोषण का सबसे अधिक खतरा है। यह अनुमान लगाया गया कि भारत में प्रत्येक तीन बच्चों में से दो शारीरिक रूप से प्रताड़ित हैं। साथ ही बच्चे, मानव निर्मित आपदाओं और वर्तमान में दुनिया में हो रहे आतंकवाद के कृत्यों से भी बच्चे खतरे में है। अब इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकने का समय आ चुका है। बच्चे हमारे राष्ट्र का भविष्य हैं। उन्हें एक सुरक्षित वातावरण प्रदान करना हमारा कर्तव्य है, जिसमें वे अच्छे नागरिक के रूप में फल-फूल सकें। आओ हाँथ मिलाएं और बच्चों की रक्षा करें।

यह आने वाले कल को सुधारने के लिए सही समय है।