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हिंदी, एक लुप्त होती भाषा

August 3, 2018
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हिंदी, एक लुप्त होती भाषा

वर्ष 2018

रुचि का स्थान: दिल्ली की एक व्यस्त सड़क।

एक युवा मां दिन में पांच बार अपने बेटे को डांटती है। कारण है? कि उसने अपनी मां की दोस्त से हेलो के बजाय नमस्ते करके उनका अभिवादन किया। यहां इस तरह के कई दिखावे हैं।

हिंदी, सदियों से समृद्ध इतिहास के साथ चली आ रही एक भाषा है, जो आज खुद इतिहास बनने के कगार पर खड़ी है। भाषा धीरे-धीरे लुप्त हो रही है, पर शायद अभी पूरी तरह से नही हुई है, लेकिन फिर भी इसकी स्थित बहुत भयावह है। नई पीढ़ी के साथ हिंदी के लिए एक नई लहर (या विरोधी लहर) पैदा करने के लिए चलो पुरानी यादों में वापस चलते हैं।

ऐतिहासिक उत्पत्ति

“हिंदी”, शब्द का उपयोग मूल रूप से उन लोगों के लिए किया जाता था जो एशिया की सबसे लंबी नदियों में से एक सिंधु नदी के पूर्वी हिस्सों में बसे हुए थे। बाद में यह शब्द भाषा से जुड़ गया था जैसा कि हम सब आज इसे जानते हैं।

अन्य भारतीय-आर्य भाषाओं (भारतीय उपमहाद्वीप में भाषाओं के प्रमुख परिवार) की तरह, हिंदी भाषा की जड़ें वैदिक संस्कृत में पायी जाती हैं। 1500 ईसा पूर्व – 800 ईसा पूर्व से, वैदिक संस्कृत में कई बदलाव से हुए, जिन्हें समय के साथ ढाला गया और नया रूप दिया गया। कितने ही लोगों को यह नहीं पता है कि आधुनिक समय की हिंदी जिसे हम आज के समय में जानते हैं, वास्तव में भारत की सबसे युवा भाषाओं में से एक है। इसका मूल खड़ी बोली की भाषा में है, यह एक मात्र ऐसी भाषा थी जिसने 19वीं शताब्दी में मुख्यधारा की लोकप्रियता हासिल थी। यह भाषा मुख्य रूप से दिल्ली और इसके आसपास बोली जाती थी, और धीरे-धीरे इस भाषा ने मैथिली, ब्राज, अवधी जैसी प्रमुख उपभाषाओं का स्थान ले लिया। खड़ी बोली हिंदी से आधुनिक समय की हिंदी और उर्दू का विकास हुआ है। पारसी लेखकों द्वारा बोली जाने वाली भाषा, विशेष रूप से अमीर खुसरो द्वारा, खड़ी बोली से काफी प्रभावित थी।

1881 में, बिहार ने हिंदी को अपनी एकमात्र आधिकारिक भाषा घोषित कर दिया, जो पहले उर्दू थी। ऐसा करने से बिहार आधिकारिक तौर पर हिंदी भाषा को अपनाने वाला पहला भारतीय राज्य बन गया। 14 सितंबर, 1949 में, हिंदी को हमारी संविधान-सभा द्वारा भारत की आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाया गया था। सरकार ने, 1954 में हिंदी व्याकरण के मानकीकरण के लिए एक समिति की स्थापना की।

भाषा प्राय: भारत के मामले में कम से कम विभाजन की जटिल अभिव्यक्ति रही है। पहले ऊपरी और निचली जाति के बीच, और अंततः भारत और पाकिस्तान के बीच। त्रासदी यह है कि, हिंदी, एक भाषा जो एक समय में उत्कृष्टता के स्थान पर थी वो आज अस्तित्व में रहने के लिए संघर्ष कर रही है।

हिंदी के धीमे पतन की त्रासदी

जबकि हरिवंश राय बच्चन विदेश मंत्रालय (1955 से शुरू) में काम कर रहे थे, उन्होंने हिंदी को अपनी आधिकारिक भाषा के रूप में अपनाने से संबंधित मामलों पर बारीकी से काम किया। उन्होंने अपनी आत्मकथा में, उल्लेख किया कि कार्यालय में अंग्रेजी क्रत्रिमता का माहौल कैसा था। उन्होंने वर्णन किया कि कैसे, यदि कोई अपनी आंखें बंद करता है, तो वह ऑक्सफोर्ड या कैम्ब्रिज में कॉकटेल पार्टी के लिए कार्यालय में गलती कर सकता है। अंग्रेजी साहिबों ने हिंदी को नौकरों या चपरासियों के साथ बातचीत करने के लिए एक भाषा से ज्यादा कुछ नहीं समझा। विडंबना यह है कि ऐसा लगता है कि हिंदी भाषा में गिरावट शुरू हो गई थी, भले ही आधिकारिक तौर पर भाषा का प्रयोग बातचीत के लिए किया जा रहा था।

वर्तमान युग में, हिंदी की लोकप्रियता में गिरावट आई है, मगर इसके बोलने वालों में नहीं। 1970 से हिंदी बोलने वालों की बढ़ती संख्या को समझाते हुए हिंदी भाषी क्षेत्रों की आबादी तेजी से बढ़ रही है। हालांकि,  हमारे दैनिक जीवन में, हम एक बार लोकप्रिय भाषा का क्षय देखते हैं।

सामाजिक पाखंड

हिंदी मुख्य रूप से देश के उत्तरी हिस्सों में बोली जाती है। हालांकि, यदि आप आज गहराई से शोध करते हैं, तो दिल्ली और गुरुग्राम जैसी मेगासिटी में यह प्रतीत होता है की वहां के लोग आने वाली पीढ़ियों में अपनी मातृभाषा हिंदी का प्रचलन नहीं करेंगे। बहुत से लोग मानते हैं, कि इस तरह इस भाषा का धीरे-धीरे पतन हो जायेगा। माता-पिता चयन करते हैं कि उनके बच्चे एक विशेष अंग्रेजी माध्यमिक विद्यालय में पढ़ें, जो कि अब समाज में  दर्जे के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

जिसका आंशिक श्रेय हमारी दूसरी आधिकारिक संघ भाषा- अंग्रेजी की लोकप्रियता को जाता है। यह दुनिया की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है और पूरी दुनिया में संचार का एक आम साधन है। अतः स्पष्ट होता है कि इन दिनों भारतीय माता-पिता अपने बच्चों को अंग्रेजी भाषा का एक निपुण उपयोगकर्ता बनाना चाहते हैं।

हालांकि, भारत में संयोगवश जो हुआ है वह हिंदी से अंग्रेजी में बदलाव है। मेट्रो शहरों में उच्च मध्यम श्रेणी के परिवार अब अंग्रेजी को ही अपनी प्राथमिक भाषा के रूप में उपयोग करते हैं। जिसके परिणामस्वरूप, अब नई पीढ़ी हिंदी बोलने में अपमान महसूस करती है। यह मानते हुए कि वे प्राथमिक रूप में भाषा का उचित उपयोग करना जानते हैं। अंग्रेजी माध्यम से संचालित कई विद्यालयों में, छात्रों को दण्ड औऱ पुरुस्कार देने की पद्धति के माध्यम से अंग्रेजी में बातचीत करने की आदत डाली जाती है। कल्पना कीजिए कि आपको मातृ भाषा में न बोलने के लिए पुरस्कृत किया जा रहा हो। जबकि हिंदी अब भी कम से कम माध्यमिक विद्यालयों में व्यापक रूप से अनिवार्य विषय है, हालांकि उच्च शिक्षा अब लगभग पूरी तरह से अंग्रेजी में हो गयी है। शायद ही कोई ऐसा आधुनिक पेशेवर होगा जिसे अपने स्वयं के पेशे का सही हिंदी अर्थ पता हो।

भारत में बनायी जाने वाली कई वेबसाइटों की प्राथमिक भाषा अंग्रेजी है। इसका स्पष्ट कारण यह है कि अंग्रेजी को अधिक लोकप्रियता और उत्कृष्टता दी गई है, जबकि इसके साथ ही साथ हिंदी को पिछड़ी भाषा के रूप में देखा जा रहा है। ऐसा होने पर भी देश की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी को लागू करने का समर्थन नहीं किया जा रहा है। किसी को तो हिंदी के हो रहे इस पतन के बारे में कुछ विचार करना चाहिए। सभी उत्तरी मेगा-सिटी (बड़े शहर) हिंदी भाषा को भूलने के कगार पर हैं। भाषा की पश्चिमी लहर को अपनाने की दौड़ में दौर में फंस गए हैं, क्या यह आधुनिक दुनिया के लिए हमारी पद्धति के रूप में है?

 

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हिंदी एक लुप्त हो रही भाषा
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युग के दौरान हिंदी की यात्रा और पतन की वर्तमान स्थिति पर एक नजर।