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इलाहाबाद से प्रयागराज: कितना उपयुक्त है नाम में परिवर्तन करना?

October 18, 2018
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इलाहाबाद से प्रयागराज: कितना उपयुक्त है नाम में परिवर्तन करना?

“नाम में क्या रखा है? अगर हम गुलाब को कुछ और भी कहें तब भी उसकी खुशबू तो वही की वही रहेगी।“

-विलियम शेक्सपियर

यह बात तो निश्चित है कि यह सब लिखते समय लेखक के मन में भारत का विचार तो नहीं आया होगा। हम सभी जानते हैं कि नाम भी हमारे देश में बहुत मायने रखता है, अक्सर उस बिंदु पर जहां लोग खुद को औचित्य देने के लिए सदियों पुरानी बातों को खोदकर निकालने के लिए दृढ़ बन जाते हैं।

हम देश में कई नामों या फिर उनमें हुए परिवर्तनों को देखते हैं जैसे इंडिया, भारत, हिन्दुस्तान-जो भी आपको पसंद होता है कहने लगते हैं। हम कुछ भी कह सकते हैं। चाहे वह सड़क हो, रेलवे स्टेशन हो, हवाई अड्डा हो, या फिर शहर का नाम हो। हालिया घटनाओं के चक्कर में पड़कर अपने आप को मूर्ख न बनने दें।

पिछले 4-5 सालों से नाम बदलने का चलन जारी है। राष्ट्र के नाम बदलने का इतिहास लंबा रहा है, जो आजादी के बाद से अब तक प्रचलित है। इलाहाबाद से मिली हाल ही की वायरल खबरों से पता चला कि इलाहाबाद को प्रयागराज नाम दिया जा रहा है, जिससे एक महत्वपूर्ण सवाल उठ रहा है। क्या यह कार्य वास्तव में प्रचार और सार्थकता के लायक है? और क्या हम सही दिशा में जा रहे हैं?

नाम बदलने के साथ हमारा इतिहास

आज भी बहुत से लोगों को यह पता नहीं है कि कानपुर शहर को अंग्रेजों के युग में कन्नपुर के रूप में जाना जाता था। यह पहली ऐसी जगह थी जिसका नाम परिवर्तन, स्वतंत्रता के बाद (एक वर्ष के भीतर) किया गया था। देश के दक्षिणी तट के साथ एक प्रमुख शहर विशाखापट्टनम को अक्सर 1947 से पहले वाल्टियर कहा जाता था। आजादी के बाद से शहर को पूर्ण रूप से “इंडियन साउंडिंग” नाम से संदर्भित किया जाने लगा।

राष्ट्रीय राजधानी में सबसे महत्वपूर्ण सड़कों में से एक जनपथ, को पहले “क्वींसवे” के रूप में जाना जाता था। दिल्ली में प्रसिद्ध राम मनोहर लोहिया अस्पताल की स्थापना 1932 में अंग्रेजों ने अपने सरकारी कर्मचारियों के लिए की थी। उसके बाद, इसे वेलिंगटन अस्पताल कहा जाने लगा, उसके बाद इसका नाम बदल दिया गया था। अभी भी कई लोग पहले वाले नाम से ही इसको बुलाते हैं। इसलिए जब देश उपनिवेशवाद के चंगुल से बच निकला, तो अंग्रेज अपने पीछे जो भी प्रभाव छोड़ गए थे उसे हटाने का प्रयास भी शुरू किया गया। यह एक परंपरा है जिसकी वजह से हम इतने वर्षों से इन नामों को बरकरार रखने में सफल रहे हैं।

अब सवाल यह उठता है कि क्या यह मुद्दा आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जैसा कि उस समय था?

आधुनिक दिनों में

27 सितंबर 2016 को, हरियाणा सरकार ने केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद आधिकारिक तौर पर गुड़गांव का नाम बदलने की घोषणा की। राज्य के सबसे बड़े शहर को आधिकारिक तौर पर “गुरुग्राम” कहा जाता है। दो साल बाद, अगस्त 2018 में, यह घोषणा की गई कि शहर के प्रसिद्ध लेजर वैली पार्क को अब महाराणा प्रताप पार्क के नाम से जाना जाएगा। दोनों में हुए बदलाव को लेकर बार-बार काफी विरोध किया गया।

अगस्त 2018 में एक और जगह के नाम में बदलाव किया गया था और वह है मुगलसराय रेलवे जंक्शन। अपने नाम और समृद्ध इतिहास के साथ यह जंक्शन देश में अन्य के बीच काफी पुराना है। अब इसे आधिकारिक तौर पर दीन दयाल उपाध्याय रेलवे जंक्शन के नाम से जाना जाता है, जो कि योगी आदित्यनाथ की अगुआई वाली उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा प्रस्तावित था और बाद में केंद्र द्वारा स्वीकृत किया गया था।

ऐसा लगता है कि उत्तर प्रदेश राज्य में बहुत से स्थानों के नाम में बदलाव हुए हैं। 17 अक्टूबर 2018 को राज्य कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद, अब से इलाहाबाद शहर को आधिकारिक तौर पर प्रयागराज के नाम से जाना जाएगा। हालांकि, सूची यहीं खत्म नहीं होती है।

2013 में, ममता बनर्जी के नेतृत्व में, पश्चिम बंगाल राज्य को नाम परिवर्तन की सूची में देखा गया। कुछ के नाम बदलने की घोषणा की गई है जो निम्नानुसार है:

ब्रॉड स्ट्रीट (अलीपुर) को उस्ताद बडे अली खान सरानी, क्रीक रॉ को सर नीलरतन सिरकार सरानी और इसी तरह कई अन्य।

भाजपा के संसद सदस्य महेश गिरि के अनुरोध के बाद 2014 में दिल्ली की प्रसिद्ध औरंगजेब रोड का नाम बदलकर डॉ एपीजे अब्दुल कलाम रोड रखा गया था। अकबर रोड के नाम को बदलने के लिए भी संक्षिप्त वार्तालाप किया गया है।

क्यों बदल रहें हैं जगहों के नाम?

नाम बदलने की इस प्रथा पर उचित राय बनाने या देने के लिए, हमें सबसे पहले जितनी ज्यादा हो सके इसके बारे में जानने की जरूरत है। सबसे उचित कारण यह है कि इन स्थानों को नए नाम देकर, हम अपने देश से आक्रमणकारियों के प्रभाव को हटा रहे हैं। उदाहरण के लिए, वाल्टेयर अंग्रेजों द्वारा विशाखापत्तनम शहर को दिया गया नाम था, जो  शब्द-व्युपत्ति से काफी स्पष्ट था।

नए मामलों में, गुड़गांव को “गुरुग्राम” में बदलते हुए यह कहा गया था कि “गुरुग्राम” प्राचीन नाम था – जिसका नामकरण महाभारत के गुरु द्रोणाचार्य ने गया था। दावा किया जाता है कि “गुरु-ग्राम” नाम समय के साथ बिखर गया था, जिस वजह से यह गाँव “गुड़गांव” में बदल दिया गया था। इसलिए “गुरुग्राम” के समर्थक कहते हैं कि नामकरण हमारी संस्कृति को संरक्षित करने का एक तरीका है।

इलाहाबाद का नाम बदलने के लिए भी इसी तरह का कारण बताया गया है, जिसमें कहा गया है कि प्राचीन काल में इसे 1575 तक “प्रयाग” के नाम से जाना जाता था। ऐसा कहा जाता है कि अकबर ने बाद में इस शहर को “इलाहाबास” नाम दिया, जिसका साधारणतया अनुवाद है “ईश्वर का निवास स्थान”। वर्षों के, साधारण संशोधनों और बदले गए उच्चारण के साथ, इस जगह को “इलाहाबाद” के रूप में जाना जाने लगा।

एक (असहज) राय

नाम में क्या रखा है? कुछ भी तो नहीं। एक चीज़ या स्थान अपने गुणों को नही खोता है, चाहे आप इसे किसी भी नाम से पुकारें। हालांकि इस नाम-बदलने की होड़ के साथ इसका असर देश पर पड़ता है, हमें अन्यथा की तुलना में अधिक विचारशील होने की जरूरत है। गुलाब या किसी और वस्तु के नामकरण की तरह संशोधित नाम अहिंसक या निरपराध नहीं होते। आइए चर्चा करें और कुछ सवालों के जवाब देने का प्रयास करें।

इलाहाबाद का नाम बदलकर “प्रयागराज” करने से क्या अपनी संस्कृति को संरक्षित करने और उसे याद रखने में मदद मिलेगी?

इससे हमें कोई मदद नहीं मिलने वाली, हम एक और विस्तारित उदाहरण पेश करेंगे। आइए सबसे पहले हम इसे आर्थिक दृष्टिकोण से समझने की कोशिश करें। हम निश्चित रूप से जानते हैं कि नाम परिवर्तन होगा:

  1. किसी भी मौद्रिक या आर्थिक गतिविधि को कोई लाभ नहीं मिलने वाला। इसलिए मैं फिर कहूंगी, नाम में क्या रखा है?
  2. इस तरह, सरकारी संपत्तियों पर पुराने नाम को नए नाम में बदलने की वजह से संसाधनों की आवश्यकता पड़ रही है। उल्लेख नहीं है, यह प्रयास पूरी तरह से निरर्थक है।

एक और राजनीतिक या यहां तक कि भावनात्मक संभाषण के लिए आगे बढ़ते हुए, यहां बहुत सारे कारण हैं कि क्यों प्रयागराज का नाम बदलने से कोई अच्छा काम नहीं होगा। 4 शताब्दियों से अधिक समय से, यह शहर “इलाहाबाद” के नाम से जाना जाता है। शहर में पले-बढ़े हजारों लोग, इस नाम से खुद को जोड़ते हैं। इसलिए, नया नाम अपक्षरण का एक और चिंताजनक विषय बन गया है। इसके अलावा, इस नाम की परिधि के भीतर गैर-सरकारी उपयोग में “प्रयाग” नाम पहले ही मौजूद है। स्थानीय लोग अक्सर इस नाम का उपयोग करते हैं, ऐतिहासिक दस्तावेज भी इसका हवाला देते हैं। इसलिए अज्ञानता की कोई “आशंका” ही नहीं है

“प्रयाग” शब्द का शाब्दिक अर्थ है “मिलने का एक क्षेत्र”, या हिंदी में- “संगम”। आज भी स्थानीय लोगों द्वारा संगम के इस क्षेत्र को “प्रयाग” कहा जाता है। इसलिए, शहर के पूरे सांस्कृतिक इतिहास को फिर से नामित करने की कोई जरूरत नहीं थी।

क्या नाम परिवर्तन एक सकारात्मक संदेश भेजता है?

यहां, हम पहले “गुरुग्राम” का उदाहरण लेते हैं। जब इसका नाम बदला गया था, तो यहां विरोध प्रदर्शन हुआ, न सिर्फ इसलिए कि लोगों का मानना था कि यह एक व्यर्थ कार्य था, बल्कि इसलिए भी क्योंकि यह समाज के एक बड़े वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है। गुरु द्रोणाचार्य, कई लोगों के लिए एक सम्मानित व्यक्ति और एक महान शिक्षक होने के नाते, दलित समुदाय द्वारा पसंद नहीं किए जाते थे। नीची जाति से संबंधित होने के कारण एकलव्य के प्रति द्रोणाचार्य का झुकाव – दोनों कारण स्पष्ट और बोधगम्य है।

एक संक्षिप्त सारांश प्रस्तुत करने के लिए: शहरों, सड़कों, हवाई अड्डों आदि के नाम बदलना देश के लिए कोई अच्छा काम नहीं है। वास्तविक रूप से, रोजमर्रा की समस्याएं जिनका लोगों को सामना करना पड़ता है बिल्कुल वैसी ही रहती है। शहरों के नाम में परिवर्तन के लिए बाध्य करना लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाता है।

मुगलसराय जंक्शन का नाम अब आरएसएस के सदस्य उपाध्याय के नाम पर रखा गया है, इसके विरोध में भी कई लोगों ने आवाज उठाई कि यह देश को “भगवा” करने का एक और स्पष्ट प्रयास है। कई स्थानीय लोग अपने आपको खुद के घर से और उसके लाभ से अवरोपित समझते हैं?

यदि केंद्र या राज्य सरकार वास्तव में लोगों के लिए कुछ करना चाहती है तो- इसे वास्तविक कल्याण योजना पर ध्यान देना चाहिंए। स्थानों के नाम पर राजनीति और धर्म को, जिसकी हमें जरूरत होती है, को थोपना राजनीति का अंतिम कदम होता है। देश में धर्म को लेकर पहले से ही काफी तना-तनी का माहौल है।

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इलाहाबाद से प्रयागराज: कितना उपयुक्त है नाम में परिवर्तन करना?
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नाम में क्या रखा है? अगर हम भारत के बारे में बात करें तो शायद बहुत कुछ। नाम बदलने का "कला" लंबे समय से देश में चल रही है- चाहे वह शहर हो, सड़कें हों, कुछ और। इलाहाबाद के नाम को अब आधिकारिक तौर पर प्रयागराज में बदल दिया गया है, हमें खुद से एक प्रश्न पूछने की जरूरत है: क्या यह तरीका सही है?