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नारीवाद: अधिकार और कमियां

September 4, 2018
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नारीवाद: अधिकार और कमियां

अगस्त 2018 के आखिरी सप्ताह में, 150 पुरुषों ने अपनी बुरी पत्नियों के ‘विषाक्त’ नारीवाद से छुटकारा पाने के लिए अपने विवाह का ‘अंतिम संस्कार’ कर दिया। इस पूरे समारोह को सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन (एसआईएफएफ) द्वारा आयोजित किया गया था। एक बुनियादी सदस्य के मुताबिक, नारीवाद अपने समानता के मूल एजेंडे से भटक गया है।

“इसका मतलब यह है कि सरकार चाहती है कि पुलिस अब शयनकक्षों में प्रवेश करे, जो शादी के बंधन से मुक्त होने का निश्चित रूप से एक शॉट तरीका है क्योंकि इन नियमों के लागू होने पर कोई रिश्ता काम नहीं करेगा।”

– वैवाहिक बलात्कार 2017 के खिलाफ सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन द्वारा प्रस्तावित कानून

एक ऐसी बुनियाद जो विषाक्त पुरुषत्व और पितृसत्ता को स्वीकार नहीं करती है, उसके लिए विषाक्त नारीवाद के बारे में बात करना सबसे अच्छा है। हालांकि, किसी को यह समझना चाहिए कि नारीवादी आंदोलन के विकास के रूप में, कुछ नकली मुखौटे भी हो सकते हैं जो कभी-कभी चुपके से प्रहार करते हैं। नारीवाद का मतलब क्या है और “नारीवादी” टैग से खुद को अलग करना कितना सही है?

 भारत में नारीवाद और इसकी उत्पत्ति

“नारीवाद” शब्द का मूल अर्थ “लिंगों की समानता के आधार पर महिलाओं के अधिकारों की वकालत करना” है। इसके फलस्वरूप यह किसी भी व्यक्ति द्वारा किए गए तर्क को निषेध करता है जो कहता है कि नारीवाद पुरुषों को गलत तरीके से यातना दे रहा है। ऐसा नहीं है आंदोलन समानता के साथ ही संबंद्ध किया गया है, जिसका अर्थ किसी भी लिंग के लिए विशेषाधिकार को समाप्त करना है। विपरीत दिशा में ली गई कोई भी कार्रवाई स्वचालित रूप से नारीवाद नहीं है।

अठारहवीं शताब्दी के मध्य से भारत में नारीवाद को तीन चरणों में विभाजित किया गया है। हालांकि, पहले के समय में कई शक्तिशाली महिलाएं थीं, जो लगातार सामाजिक मानदंडों के खिलाफ लड़ती थीं, 18वीं शताब्दी में यह सुधार एक बड़े पैमाने पर शुरू होते देखा गया था।

लगभग 1850 के दशक के शुरूआत में, भारत में नारीवाद के पहले चरण के मुख्य व्यक्ति टॉर्च बियरर्स थे जिन्होंने सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के लिए काम किया था। हालांकि, इसका प्रभाव कुछ हद तक सुधार आंदोलन और राष्ट्रवादी आंदोलन के बीच संघर्ष के कारण कम हो गया था। भारतीय घरों में बाद में उपनिवेशवादियों द्वारा किसी भी हस्तक्षेप का विरोध किया गया । इसके परिणामस्वरूप जब भी सरकार ने लड़कियों के लिए शादी की न्यूनतम आयु बढ़ाने की कोशिश की, तब-तब उन्हें विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा।

आधुनिक दिनों में नारीवाद

भारतीय नारीवाद आंदोलन ने पिछले कुछ वर्षों से काफी लंबा सफर तय कर लिया  है। पुरुषों से महिलाओं के अधिकारों की “सुरक्षा ” की उम्मीद करने के बजाय अब महिलाएं खुद की सुरक्षा के लिए सड़कों पर उतरने लगी है। समाज में महिलाओं के लिए समान जगह सुरक्षित करने के लिए नियमित आंदोलन चलाए गए हैं। महिलाओं के समानता के अधिकार को सुरक्षित करने बलात्कार और उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने और पितृसत्ता आदि को खत्म करने के लिए सभी को एक प्रभाव-‘नारीवाद’ के तहत रोका गया है।

शुरुआत के दिनों में नारीवाद की शुरुआत सती प्रथा, इत्यादि के खिलाफ लड़ने जैसी मूल बातों से शुरू हुई, जिस तक अब विविध आधार तक पहुंचा जा सकता है। महिलाएं अपने जीवन में सभी क्षेत्रों जैसे कार्यस्थल, घर और इसी तरह अन्य चीजों में पूर्ण समानता के लिए लड़ती हैं।  पिछड़े क्षेत्रों या सामाजिक पदानुक्रमों की महिलाओं को शहरी या अधिक विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग की महिलाओं की तुलना में विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि, इसके मुद्दे कम या अधिक या फिर समान रहते हैं।

2009 में, मंगलौर में महिलाओं के एक पब में घुसकर उनके समूह के साथ कथित तौर पर मारपीट की गई थी। इसकी जबाव देही के लिए मुख्य रूप से इसके पीछे दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं के खिलाफ खड़े होने के लिए एक “पिंक अंडरवियर” आंदोलन शुरू किया गया था। ठीक इसी तरह, कुछ साल पहले सन 2003 में ब्लैंक नाइट प्रोजेक्ट शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य भारतीय महिलाओं के लिए सुरक्षा की बढ़ती कमी के खिलाफ विरोध करना था। इस परियोजना ने जैसे “आई नेवर आस्क्ड फार इट”, कपड़ों के विभिन्न रूपों को दर्शाते हुए कई पोस्टर जारी किए हैं। निष्कर्ष यह है कि, महिलाओं के कपड़ों का आकार और प्रकार किसी भी तरह से उनकी “इच्छा” या “सहमति” का संकेत नहीं देते हैं।

आलोचना और प्रतिक्रिया

जब भी कोई गांवों और पिछड़े क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण लाने के लिए किए गए आंदोलनों के खिलाफ बोलता है, शहरी नारीवाद अक्सर कठोर आलोचना  साथ उसके सम्मुख खड़ा हो जाता है। ऐसा कहा जाता है कि उन क्षेत्रों में नारीवाद की अब कोई आवश्यकता नहीं है, और वह केवल विशेषाधिकारों की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन, यह वास्तव में कितना सही है?

एक लोकप्रिय तर्क यह भी है कि रात में क्लबों में शॉर्ट स्कर्ट पहनना और मदिरा-पान का सेवन करना नारीवाद के नाम पर शर्मिंदगी महसूस करना नहीं है। वे कहते हैं कि शिक्षा के अधिकार के लिए लड़ना कैरियर के लिए असली नारीवाद है। हालांकि, उचित मायनों में यह विचारधारा स्वयं अंतर्निहित पितृसत्ता के बारे में बात करती है जो अभी भी हमारे देश में प्रचलित है।

समानता से परे मांग की कोई निश्चित डिग्री नहीं है, जो नारीवाद को कुछ और बना देता है। जब आंदोलन शुरू हुआ, तो इसमें पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं के साथ भी उसी तरह का व्यवहार किया जाना था। और हां, इसका मतलब सिर्फ अवसर नहीं बल्कि समान जिम्मेदारियां भी सौंपी जाएं। इसका मतलब है कि हर क्षेत्र में समानता- जैसे बिना उनके चरित्र पर सवाल उठाए रात में सड़कों पर घूमने का अधिकार आदि। इसलिए, जब हम किसी व्यक्ति के छोटे कपड़े पहन कर घूमने पर कोई सवाल खड़ा नहीं करते हैं, तो फिर क्यों एक महिला जो बिल्कुल वही प्रक्रिया दोहराती है को एक “छद्म-नारी” के रूप में बुलाते हैं, बल्कि इसके लिए हमें उन्हें निश्चित रूप से यह बताना चाहिंए कि समानता केवल एक निश्चित स्तर तक ही प्रदान की जाएगी। ऐसी मानसिकता को निश्चित रूप से बदलने की जरूरत है।

एक मेट्रो सीट से पुरुष को खड़े कर देना नारीवाद नहीं है, मैं सहमत हूँ, लेकिन 8 डिब्बों वाली ट्रेन में 6 डिब्बों को आरक्षित करना नारीवाद है। अगर महिलाएं ऐसे देश में सुरक्षित महसूस करना चाहती हैं जहां उनके लिंग के खिलाफ अपराध दर हर दिन लापरवाही से बढ़ रही है, तो यह विशेषाधिकार की मांग नहीं है।

परिवर्तन की आवश्यकता

हाल ही में, लोगों की बढ़ती प्रवृत्ति जिसमें कहा गया कि , “मैं नारीवादी नहीं हूं, मैं मानवतावादी हूं”। हालांकि, यह तर्क थोड़ा समान हो जाता है-

क्यों ‘ अंधकारमय जीवन मायने रखता है’, क्यों ‘सभी के जीवन में फर्क नहीं है’? क्यों? क्योंकि आप अनिवार्य रूप से समस्या के मुद्दे को भुला रहे हैं। हां, सभी की अपनी जिंदगी के मायने होते हैं और इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। आंदोलन उस बात के लिए जीवन, या किसी अन्य सामाजिक परम्पराओं का सार नहीं लेता है। लेकिन यह क्या कहना चाहता है कि अंधकारमय जीवन खतरे में हैं, उनके खिलाफ हो रहे इस अपराध और भेदभाव को ध्यान में रखना आवश्यक है।

इसी तरह, नारीवाद को “मानवतावाद” नहीं कहा जाता है क्योंकि महिला सशक्तिकरण में हम जितना भी लंबा सफर तय कर चुके हैं, उससे कहीं अधिक लंबा सफर तय करना अभी बाकी है। यहां तक कि यदि दुनिया में एक भी महिला अपने समान अधिकारों से वंचित रह जाती है, तो नारीवाद की आवश्यकता होगी। आंदोलन सभी लिंगों की समानता के लिए काम करता है, और इसे स्वाभाविक रूप से विशेषाधिकार के तहत विशेष रूप से  लिंग उत्थान द्वारा किया जाता है। इसलिए, नारीवाद है।  इसे “मैन हेटिंग” योजना के रूप में प्राप्त करने के लिए आंदोलन के पूरे उद्देश्य के अवसर को खो देना है। यहां तक कि यदि महिलाओं को पुरुषों से अधिक विशेषाधिकार दिए जाते हैं, तो इसका मतलब है कि नारीवाद खत्म हो रहा है।

दूसरा, आधुनिक दिनों में नारीवाद सिसजेन्डर वुमेन के लिए काम करते समय भी ट्रासवुमेन को अधिक से अधिक समावेशी होना चाहिए। अगर उनके अधिकारों को अनदेखा किया जाता है, या नारीवाद को उतना प्रभावी नही बनाया जाता है, तो यह अपने आप में एक विषाक्त विशेषाधिकार है।

ट्रांसवुमेन महिलाएं हैं, और नारीवाद समानता है।

 

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नारीवाद- अधिकार और कमियां
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अगस्त 2018 के आखिरी सप्ताह में, 150 पुरुषों ने अपनी बुरी पत्नियों के 'विषाक्त' नारीवाद से छुटकारा पाने के लिए अपने विवाह का ‘अंतिम संस्कार’ कर दिया।