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भारत और हमारा पैरलेल सिनेमा

August 9, 2018


भारत और हमारा पैरलेल सिनेमा

1960 के दशक के प्रतिष्ठित फ्रेंच-स्विस फिल्म निर्देशक जीन-लुक गोडार्ड ने कहा, कि “मुझे सिनेमा के अलावा जीवन के बारे में कुछ भी नहीं पता”।

यह सच है, कि सिनेमा अक्सर हमारे दैनिक जीवन का प्रतिबिंब है। यह मनोरंजन के स्रोत से कहीं अधिक है और केवल पैरलेल सिनेमा का ही उद्भव केवल इस बिंदु को साबित करता है। द लंच बॉक्स, मार्गरीटा विद ए स्ट्रॉ, मसान’ आदि जैसी फिल्मों के माध्यम से, पैरलेल सिनेमा को अत्यधिक दर्शकों तक पहुचाया गया और तभी से लोगों ने पैरलेल सिनेमा को पसंद करना प्रारंभ किया। जो लोग पैरलेल सिनेमा से अनजान हैं उनकी जानकारी के लिए, पैरलेल सिनेमा उन मुद्दों और चित्रण को प्रदर्शित करता है जो  मुख्यधारा के सिनेमा से अलग हैं। इस तरह के सिनेमा में फिल्में खुले यथार्थवाद पर  आधारित होती हैं, जो पारंपरिक भारतीय सिनेमा के आकर्षण को अक्सर उखाड़ फेंकता है। नतीजतन, आपको इन फिल्मों में शायद ही कभी आइटम सांग्स या रोहित शेट्टी की लड़ाई की श्रेणी पर आधारित फिल्मों की तरह द्रश्य देखने को मिलेंगे।

पैरलेल सिनेमा का इतिहास

पहले समय के भारतीय सिनेमा पर रामायण, महाभारत इत्यादि जैसे महाकाव्यों का प्रभुत्व था। हालांकि, 1920 के दशक के बाद, ऐसे सिनेमाघरों का आगमन हुआ जिसने हमारे मानदंडों को चुनौती देना शुरू कर दिया।

उदाहरण के लिए, बाबूराव पेंटर की सावकारी पाश (1925), एक मूक फिल्म थी जो एक गरीब किसान और उसकी विपत्तियों के आसपास घूमती है। गुडवल्ली रामाब्रहम की फिल्म राइथ बिदा जो (1939) में प्रदर्शित हुई थी और इस फिल्म में जमीदारों की आलोचना की गई थी, ये वे जमींदार थे जो ब्रिटिश सरकार के लिए जमींदार से कर समाहर्ता में बदल गए थे। इस फिल्म को बाद में उपनिवेशवादियों ने प्रतिबंधित कर दिया था।

1940 के दशक के उत्तरार्ध से 1960 के दशक तक, भारत में बहुत अधिक पैरलेल सिनेमाओं का उद्भव हुआ है, जिसे भारतीय सिनेमा के स्वर्ण युग के रूप में भी जाना जाता है।

यह स्वर्ण युग इतालवी नियोरिज्म (एक फिल्मी आंदोलन जो गरीब और मजदूर वर्गों पर केंद्रित था) से प्रेरित था।

पैरलेल सिनेमा को प्रकाश में लाने का श्रेय बंगाली सिनेमा को दिया जाता है, जिसमें सत्यजीत रे, मृणाल सेन, तपन सिन्हा, ऋत्विक घटक जैसे प्रमुख निर्देशकों का नाम प्रमुख है।

हालांकि, प्रचलित राय के विपरीत, बंगाली सिनेमा अकेला नहीं था जिसने इस विचारधारा को आगे बढ़ाया। अडूर गोपालकृष्णन (मलयालम सिनेमा), गिरीश का सारवल्ली (कन्नड़ सिनेमा), के.एन.टी. शास्त्री (तेलुगू सिनेमा) आदि ने भी पैरलेल सिनेमा को आगे बढ़ाने का कार्य किया और इसलिए इन्हें भारतीय पैरलेल सिनेमा का अग्रदूत या (मार्गनिर्माता) कहा जा सकता है।

उन दिनों, फिल्में भारतीय साहित्य से काफी प्रेरित थीं। आज तक, विद्वानों द्वारा जनसांख्यिकीय, सामाजिक-आर्थिक और साथ ही उस युग के राजनीतिक माहौल के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए व्यापक अध्ययन किया जाता है। उनके अद्वितीय परिप्रेक्ष्य के कारण, उन्हें  कलात्मक फिल्म आर्ट मूवीज के रूप में भी जाना जाता है औरअक्सर राज्य सरकारों के द्वारा इन फिल्मों को प्रामाणिक भारतीय कला शैली को बढ़ावा देने के लिए वित्त पोषित किया जाता है।

1990 के दशक में पैरलेल सिनेमा पर आधारित फिल्मों के निर्माण को लेकर लागत में बढ़ोत्तरी देखी गई जिसके कारण पैरलेल सिनेमा में गिरावट देखी गई। चूंकि उद्योग व्यावसायिक हो गए थे और आर्ट फिल्में बनाना एक जोखिम भरा कार्य हो गया था, क्योंकि इन फिल्मों को लेकर यह भरोसा भी नहीं था कि इनके माध्यम से लगी लागत वापस आ जाएगी। इसलिए, बॉलीवुड ने एक बार फिर मुख्यधारा के सिनेमा की ओर बढ़ना शुरू कर दिया।

पुनरुत्थान

1990 के समय में जो फिल्में आईं थी उनमें मुंबई की असल जिंदगी की समस्याओं को दिखाया गया था, वह शहर जो वास्तव में आकर्षण से दूर है और अक्सर आकर्षण से ही जोड़ा जाता है। सत्या (1998) फिल्म को राम गोपाल वर्मा की बेहतरीन फिल्मों में से एक माना जाता है। यह एक ऐसी फिल्म है जिसमें मुंबई के अंडर वर्ल्ड के बारे में बात की गयी थी। लेकिन उस समय यह फिल्म और इसकी पसंद कम या ज्यादा वाणिज्यिक थी, इसलिए इसे पूरी तरह से पैरलेल सिनेमा का हिस्सा घोषित नहीं किया गया है। 2000 के दशक में ऐसी फिल्में देखाई गईं जो कि समाज की अपील को खत्म करने का जज्बा रखती थीं। मेरे भाई … निखिल (2005) में एड्स के बारे में बात की गई है, सोनचिडी (2011) भारत में बनायी गई कुछ साइंस फिक्सन की फिल्मों में से एक है।

पैरलेल सिनेमा और हमारा समाज

पैरलेल सिनेमा के उद्भव का एक स्पष्ट उद्देश्य था: निरन्तर सिनेमा देखने वालों को अर्थ हीन मनोरंजन के अतिरिक्त कुछ और देना। इस अनुरूप सिनेमा की  भिन्न शाखा को “विद्रोही” कहना बहुत गलत नहीं होगा। श्याम बेनेगल द्वारा मंडी (1983) एक ऐसी फिल्म है जो इन मुद्दों से निपट रही है कि लगभग पूरा समाज फुसफुसाते हुए बात करता है। इस फिल्म की कहानी एक वेश्यालय और उसकी वेश्याओं के चारों ओर घूमती है, जो अन्त में अपने निवास स्थान के लिए लड़ती है, उन राजनेताओं से उनको खतरा होता है जोकि उनके वेश्यालय में नित्य आते हैं। बहुत से लोग यह नहीं जानते हैं, लेकिन गुलजार, एक गुणवान गीतकार होने के अतिरिक्त एक फिल्म निर्देशक भी थे। 1982 में, वह नमकीन फिल्म के साथ उभरे, यह एक ऐसी फिल्म है जिसने ग्रामीण भारत में महिलाओं के उत्पीड़न को उजागर किया।

सिनेमा एक बहुत ही प्रभावशाली हथियार है जो दोनों तरीकों से काम करता है। जहाँ सिनेमा लोगों को प्रभावित करता है, वहीं लोग इसे वापस से प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि, पैरलेल एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है- यह हमारे समाज को प्रतिबिंबित करता है और साथ ही साथ इसे प्रभावित भी करता है। हालांकि, इसके रास्ते में कुछ बाधाएँ हैं। जबकि कलात्मक फिल्में (आर्ट मूवीज) कान, वेनिस, बर्लिन इत्यादि जैसी फिल्म समारोहों में अपनी उपस्थिति बनाए रखती हैं और आलोचकों से प्रशंसा प्राप्त करती हैं, लेकिन ये फिल्में उन दर्शकों तक पहुँचने में विफल रहती हैं, जिन्हें इनकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। जो फिल्में सामाजिक कलंक और दुर्दशा के बारे में अवगत कराती हैं, उन्हें बड़े सिनेमाघरों में नहीं चलाया जाता है और यदि इसे चलाते भी हैं, तो ये अक्सर सिंगल स्क्रीनिंग तक ही सीमित रहती हैं। दर्शक काफी हद तक विशेषाधिकार प्राप्त अभिजात वर्ग के होते हैं जो पैरलेल सिनेमा को पहले से ही समझते हैं और इसका समर्थन भी करते हैं। लेकिन इन्हें समाज के उस दूसरे हिस्से में कौन ले जाएगा, जिनके बारे में ये आर्ट मूवी वास्तव में बात करती हैं?

एक शानदार सभागार के अंदर बैठकर और फिल्म स्क्रीनिंग देखते हुए आप कितनी बार कम विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्ति के बारे में सोचते हैं? सिनेमा में अभी भी यह वर्ग काफी हद तक अनुरूप फिल्म सिनेमाघरों तक ही सीमित है, जो रेस 3, मस्तीजादे इत्यादि जैसी फिल्में दिखाती हैं। शुक्र है, बॉलीवुड ने इंग्लिस विंग्लिश, लिपस्टिक अंडर माई बुर्खा, ए वेडनेसडे, गैंग्स ऑफ वासेपुर आदि फिल्मों का निर्माण किया है, जो पैरलेल सिनेमा के साथ मुख्य विचारधारा के मनोरंजन को लाने की कोशिश करती हैं। इसलिए, जब हम समाज अनुभव हीनता के लिए पैरलेल सिनेमा को  लाने के लिए काम करते हैं, तो इस प्रकार की फिल्में हमारी आशाओं और हमारी सोंच को जीवित रखती हैं।

साराँश
लेख का नाम    भारत और हमारा पैरलेल सिनेमा

लेखक              अपेक्षा दुहन

विवरण             सिनेमा हमेशा हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग रहा है। यहाँ भारतीय पैरलेल सिनेमा-सिनेमा की यात्रा पर एक संक्षिप्त नजर डाली गई है जो आज तक सामाजिक मानदंडों को चुनौती दे रही है।

 

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भारत और हमारा पैरलेल सिनेमा
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सिनेमा हमेशा हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग रहा है। यहाँ भारतीय पैरलेलसिनेमा-सिनेमा की यात्रा पर एक संक्षिप्त नजर डाली गई है जो आज तक सामाजिक मानदंडों को चुनौती दे रही है।