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प्रो-लाइफ या प्रो-चॉइस: गर्भपात का मुद्दा

August 22, 2018
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प्रो-लाइफ या प्रो-चॉइस: गर्भपात का मुद्दा

पिछले एक दशक में दो समूहों के बीच इस मुद्दे की संख्या में वृद्धि देखी गई, जिन्हें प्रचलित रूप में “प्रो-लाइफ” और “प्रो-चॉइस” के नाम से जाना जाता है। हालांकि, इस मुद्दे के दोनों आधार भूत तथ्य बहुत पुराने हैं और किसी भी राष्ट्रीय सीमा तक ही सीमित नहीं हैं। भारतीय संदर्भ में, यह मुद्दा हमारी जटिल नैतिकता और सामाजिक मूल्यों की वहज से अधिक पेचीदा हो गया है।

गर्भपात का मुद्दा क्या है?

प्रो-लाइफ: तर्क देता है कि भ्रूण गर्भावस्था की स्थिति के ज्ञान में आने के क्षण से ही मूल मानव अधिकारों के हकदार है। ऐसा कहा जा रहा है कि, “प्रो लाइफ” पक्ष आम तौर पर एक ही स्थिति में गर्भपात और हत्या को रखता है क्योंकि इसे भ्रूण के पूर्व के “जीवन के अधिकार” का उल्लंघन करना माना जाता है।

प्रो-चॉइस: “प्रो-चॉइस” समूह, संबंधित महिला के व्यक्तित्व और स्वतंत्रता पर केंद्रित है। उनका तर्क है कि यह अकेली महिला जिसके पास अपने शरीरिक अधिकार है तो किसी भी परिस्थिति में, राज्य सहित कोई भी व्यक्ति उसकी व्यक्तिगत शारीरिक पसंद में हस्तक्षेप नहीं करेगा।तर्क को देखते हुए, अगर महिला गर्भावस्था को जारी रखना चाहती है या उसे रोकना चाहती है तो यह उस महिला का एकमात्र निर्णय होना चाहिए।

भारतीय तस्वीर

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेसी (एमटीपी) एक्ट, 1971 की शुरूआत के बाद से, गर्भपात देश में कानूनी है। जहां लगभग 18 देशों ने अभी तक गर्भावस्था को समाप्त करने वाले प्रतिबंध को हटा दिया है वही इसे दुनिया में अधिक प्रगतिशील गर्भपात कानूनों में से एक माना जाता है। हमारे देश में हर साल औसतन 6.4 मिलियन गर्भधारण समाप्त कर दिए जाते हैं। हालांकि, उपरोक्त कानून की मौजूदगी के बावजूद, गर्भपात का एक बड़ा हिस्सा “असुरक्षित” श्रेणी में है। आंकड़े बताते हैं कि असुरक्षित गर्भपात के कारण भारत में लगभग 13 महिलाएं हर दिन मर जाती हैं। यह देश में माताओं की मृत्यु का तीसरा प्रमुख कारण है।

यह एक विचित्र परिदृश्य है। अगर हमारा कानून महिलाओं को गर्भावस्था को (कुछ बाध्यकारी स्थितियों के साथ) समाप्त करने का कानूनी अधिकार देता है, तो क्यों उनमें से बहुत सी महिलाएं असुरक्षित तरीकों का सहारा लेती हैं, यहां तक कि प्रक्रिया में अपने जीवन को भी जोखिम में डालते हुए? एक संभावित उत्तर यह रहता है कि इसे खासकर अविवाहित महिलाओं के मामले में कलंक माना जाता है। हमारी न्यायिक प्रणाली में यह एक अन्य दोष है।

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी एक्ट, 1971:एक निरर्थक कानून?

यह अधिनियम, एक ओर जहाँ देश में गर्भपात को कानूनी घोषित करता है, वहीं दूसरी ओर इस पर कई प्रतिबंध भी लगाता है। 2014 में संशोधन विधेयक संसद में पारित होने के बाद से अब तक इस कानून में वर्षों से किसी प्रकार का कोई संशोधन नहीं देखा गया है। यह अधिनियम एक रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर (आरएमपी) की मंजूरी के साथ 12 सप्ताह तक गर्भावस्था को समाप्त करने और गर्भावस्था की कुछ विशेष परिस्थितियों में से दो मामलो में 12 से 20 सप्ताह के बीच गर्भपात की अनुमति देता है।

हालांकि, 20 सप्ताह के बाद गर्भपात कराने की अनुमति नहीं है और याचिका के ऐसे कई मामलों को खारिज किया गया है। जबकि, बताए गए कारणों में महिला के लिए सामान्य चिकित्सा चिंताएं हैं, वर्तमान समय में कानून इसकी प्रामाणिकता पर सवाल उठा रहा है। जब यह 1970 में प्रस्तावित किया गया था, तब तकनीकी प्रगति इतनी अधिक नहीं हुई थी। लेकिन, समय के साथ, प्रौद्योगिकी और चिकित्सा की उपलब्धियां में भी प्रगति हुई है और साथ ही साथ गर्भपात से संबंधित सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गई हैं। कई स्त्रीरोग विशेषज्ञों ने आश्वस्त किया है कि आज की दुनिया में, 20 सप्ताह का समय किसी भी गर्भवती महिला के लिए बहुत कठिनाई पूर्ण होता है और इसे महिला के जीवन को बिना किसी जोखिम में डाले  आगे बढ़ाया जा सकता है। दूसरा, विकासशील भ्रूण में हो रही कई असामान्यताओं को केवल 20 सप्ताह की समय सीमा के अल्ट्रासाउंड में ही पता लगाया जा सकता है।

सुधार की मांग करने वाले लोगों का कहना हैं कि कानून को चिकित्सा प्रगति, साथ ही वर्तमान में 20 सप्ताह कीअवधि में असामान्यताओं का पता लगाने की समस्या को ध्यान में रखने की आवश्यक है। इसमें आगे कहा गया है कि महिलाओं को अपने शरीर के बारे में निर्णय लेने के अपने अधिकार का सम्मान करने के साथ-साथ स्वंय से अधिक से अधिक निर्णय लेने की शक्तियां दी जानी चाहिए।

समाज और हमारे सामाजिक कलंक

हम ऐसे देश में रहते हैं जहाँ शांतिपूर्ण स्वरों का उपयोग किए बिना सेक्स के बारे में शायद ही कभी बात की जाती है। स्कूल के बच्चे को यौन शिक्षा के नाम पर कुछ नहीं सिखाया जाता। एक समाज के रूप में, हम अक्सर हमारी संस्कृति पर घमंड करते हैं और हमेशा हमारी नैतिक पुलिस व्यवस्था के साथ अन्य लोगों पर आरोप लगाने के लिए तैयार रहते हैं। उदाहरण के लिए, महिलाओं में सेक्सुअलिटी की अभिव्यक्ति, एक ऐसी चीज है जिस पे होने वाले खतरे को लेकर वे अपनी आवाज उठाने से कभी पीछे नहीं हटती है।

जब हम गर्भपात के बारे में बात करते हैं और इसे हमारी नैतिक परिधि पर ढूंढने की कोशिश करते हैं, तो हमें तार्किक रुप से सोचने की जरूरत है। कोई भी बहस,प्रत्येक महिला के एक व्यक्ति होने के नाते अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने के पूर्ण अधिकार को स्वीकार किए बिना शुरू नहीं की जा सकती है। अगर इस पहलू के बारे में बारीकी से सोचा जाए, तो एक बिंदु पर आकर हमारा तार्किक मन इस पर बहस करना बंद कर देगा। जब यह एक महिला का अपना शरीर होता है, तो गर्भावस्था की तरह उसके साथ कुछ भी गंभीर हो सकता है, जिसमें किसी का नहीं, लेकिन उसका स्वंय का निर्णय लेना सबसे जरुरी है।

अगर हम इस तर्क के साथ आने का प्रयास करते हैं कि क्यों एक महिला को अपने जीवन के लिए इतना महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लेना चाहिए, तो शायद हमें हमारे विवेक को सही रास्ते पर वापस लाना की जरूरत है।

 

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प्रो-लाइफ या प्रो- चॉइस: गर्भपात का मुद्दा
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प्रो-लाइफ या प्रो-चॉइस एक सवाल है जो अक्सर बहस के मुद्दों को प्रकाश में लाता है। यहां, हम दोनों तरह की कहानियों का विश्लेषण कर रहे हैं।