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भीड़तंत्र और हत्या (लिंचिंग)-भारत में नया मानदंड?

July 26, 2018
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भीड़तंत्र और हत्या (लिंचिंग)-भारत में नया मानदंड?

जुलाई में एक अच्छे दिन पर, 32 वर्षीय मोहम्मद आजम अहमद सामाजिक समारोह में भाग लेने के लिए कर्नाटक के हैंडिकेरा गाँव जा रहे थे। मोहम्मद आज़म, गूगल के एक इंजीनियर थे और हैदराबाद में कंपनी के एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। वह अपने दोस्त मोहम्मद सलमान, नूर मोहम्मद और कतर देश के सलहम ईसाल कुबासी के साथ थे। दोस्तों का समूह एक कप चाय और शाम के नाश्ते के लिए रूका। वही पर कुबासी ने पास के बच्चों को चॉकलेट भेंट की और उनके इस कार्य ने एक खतरनाक मोड़ ले लिया। वहाँ के एक स्थानीय व्यक्ति ने इस घटना को देखा और आरोप लगाया कि ये चार पुरुष अपहरणकर्ता है जो चॉकलेट वितरित करके बच्चों को लुभाने की कोशिश कर रहे थे। स्थानीय व्यक्ति ने यह खबर फैलाने और उनकी तस्वीरें साझा करने के लिए व्हाट्सएप का इस्तेमाल किया और जब तक आजम और उसके दोस्त गाँव छोड़कर जाते, तब तक यह खबर जंगली आग की तरह फैल गई। वे किसी भी तरह इस प्रकरण से बचने में कामयाब हो ही रहे थे लेकिन जल्द ही यह खबर पास के गाँव में फैल गई। गुस्साई ग्रामीणों की भीड़ ने पेड़ की मदद से सड़क को बन्द कर दिया और स्वयं को बचाने के प्रयास में कार खाई में जा गिरी। अहमद ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह दुनिया में उनका आखिरी दिन होगा, क्योंकि 30 लोगों की भीड़ ने उन पर और उसके दोस्तों पर हमला कर दिया था। उनके दोस्त घायल हो गए और भीड़ द्वारा अहमद को तब तक पीटा गया जब तक कि वह मर नहीं गया।

इस दुर्दशा पर खेद है कि इन दिनों भारत भर में कई स्थानों पर इस तरह की घटनाएं सामने आई हैं। केवल पिछले महीने ही, व्हाट्सएप पर फैली अफवाहों के आधार पर भीड़ के हमले और लिंचिंग (गैर कानूनी ढंग से हत्या) के एक दर्जन से अधिक मामले हुये हैं। गोहत्या के लिए दोषी ठहराए जाने और बच्चों की तस्करी के आरोप में फैली नकली अफवाहों के कारण कई लोगों की मौत हुई है। ये मामले ज्यादातर गाँव या पिछड़े इलाकों से प्रकाश में आ गए हैं, जहाँ निर्दोषों पर क्रोध जाहिर करने से पहले, अपराधियों ने वीडियो और छवियों पर आँख बंद करके विश्वास किया है। वे झूठी या सच्ची खबर के बीच के अंतर को समझ नहीं सकते हैं और उन पर हमला करने के लिए तैयार हो जाते है जो उन लोगों से असहमत होते हैं। भीड़ (मॉब्स) ने समाज के उन लोगो पर डर के माध्यम से नियन्त्रण कर लिया है जो उनकी तुलना में एक अलग भाषा बोलते हैं और उनके मुकाबले एक अलग संस्कृति या धर्म से संबंधित हैं इसके अलावा कोई भी जो समाज के बारे में अलग दृष्टिकोण रखता है।

एक चीज जो भारत को दुनिया से अलग करती है वह विविधता, मौलिक सिद्धांत के बीच एकता थी जिस पर भारत में लोकतंत्र वर्षों से उन्नति करता रहा है। देश भर में सोशल मीडिया पोर्टलों और मैसेजिंग ऐप के माध्यम से लिचिंग या नकली खबरों के आधार पर मीडिया घरों में बाढ़ आ रही है, जिससे भारतीय समाज की सभी समावेशी प्रकृति खतरे में पड़ रही है। भीड़-तन्त्र, जो जनता या जनता के शासन का मोटे तौर पर व्याख्यान करती है, यह भारत में एक नया मानक बन रहा है। हर सड़क के प्रत्येक कोने पर घात लगाये  एक भीड़ है जो बहुत ही धैर्य पूर्वक उस व्यक्ति पर अपने क्रोध और कुंठा को बाहर निकालने का इंतजार कर रही है, जिसे वे “संदिग्ध” मानते हैं। फेक न्यूज, समाचार के स्रोत की पुष्टि किए बिना या निर्दोष लोगों को सफाई के लिए समय दिए बिना, यह भीड़ हमला करने के लिये हमेशा तैयार रहती है। लिंचिंग अल्पसंख्यकों या अलग राय रखने वाले व्यक्तियों को दबाने के लिए नया हथियार बन गया है। यह (लीचिंग) लोकतंत्र के आदर्शों को नुकसान पहुंचा रहा है और “भीडतंत्र” के लिए एक मजबूत मार्ग प्रशस्त कर रहा है|

सरकार ने लिंचिंग से संबंधित हालिया घटनाओं की निंदा की है और राज्य के अधिकारियों से मामलों की जाँच करने के लिए कहा है लेकिन स्थिति में कुछ बदलाव नहीं आया है क्योंकि प्रधानमंत्री और भाजपा के अधिकतर वरिष्ठ नेता मॉब लिंचिंग मुद्दे पर चुप ही रहे हैं। आमतौर पर समाज में बढ़ता डर केवल समाज के लिए ही बुरा लक्षण नहीं है बल्कि यह देश के सामाजिक निर्माण में भी बाधा डाल रहा हैं। केंद्रीय और राज्य सरकारें भीड़ के हमले और लिंचिंग के खतरे को दूर करने में विफल रही हैं जबकि फेक न्यूज को किसी भी तरह से रोक ना पाने के कारण लोगों को अभी तक किसी पर भी हमला करने का लाइसेंस दे रखा है। हालांकि, व्हाट्सएप ने हाल ही में फेक न्यूजों की बढ़ती सीमा को कम करने के लिए क्या करें, क्या ना करें पर ध्यान केन्द्रित करने के लिए विभिन्न समाचार प्रकाशनों में एक विज्ञापन जारी किया है। ये फेक  न्यूज भारतीय समाज के मूल मूल्यों को अस्थिर कर रही हैं। हाल ही में, माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से भीड़ के हमलों और लिंचिंग से मुकाबला करने के लिए नए कानून बनाने और अधिनियमित बनाने कहा  है। इसके साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफार्मों में फेक न्यूजों के प्रसार को नियंत्रित करने के लिए निवारक उपाय भी किए जा रहे हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने भीड़ के हमलों के बढ़ते खतरे को ‘लोकतंत्र के भयानक कृत्यों’ के रूप में वर्णित किया है और कहा है कि समाज में व्यक्ति या भीड़ कानून को अपने हाथों में नहीं ले सकते हैं।

 

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भीड़तंत्र और लिंचिंग-भारत में नया मानदंड?
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हाल के दिनों में भीड़तंत्र ने कानून को अपने हाथों में लिया है और इन लोगों स्वयं न्याय करने के लिए लिंचिंग को अपना हथियार बना रहे है, जो आम तौर पर झूठी खबरों का शिकार हो जाते हैं और सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप के माध्यम से झूठ बोलते हैं।