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भारत में धर्मनिरपेक्षता और इसकी विवेचना

July 24, 2018
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भारत में धर्मनिरपेक्षता और इसकी विवेचना

भारत देश को कई अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों की भूमि माना जाता है जो हजारों सालों से सद्भाव और सह-अस्तित्व की भावना में जी रहा है। भारतीय विविधता आधुनिक भारत की शक्ति और आधार रही है, देश की समावेशी प्रकृति दुनिया के किसी अन्य देश की अपेक्षा अलग है। भारत जैसे देश में धर्मनिरपेक्षता जटिल सामाजिक ताने-बाने के साथ एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। प्राचीन काल से दुनिया के विभिन्न हिस्सों से अलग-अलग धर्मों के लोगों का यहां पर प्रादुर्भाव हुआ है। कभी-कभी लोग अधिक झगड़े होने के बावजूद भी एक जुट होकर रहते थे। धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा भारतीय संविधान से 1976 तक गायब रही, जब तक कि संविधान का  42वां संशोधन अनुकूलित और लागू नहीं हुआ। हालांकि, भारतीय संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता और इसकी व्याख्या की अवधारणा अभी भी पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता की व्याख्या की तुलना में अदालतों और विशेषज्ञों के बीच अनिश्चित और अस्पष्ट दिखाई देती है।

धर्मनिरपेक्षता की चुनौतियां और बदलता स्वरूप

भारतीय संविधान के प्रावधानों और अधिकारों को एक साथ पढ़ने और उनके मूल्यांकन के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि, भारतीय संविधान की प्रस्तावना में मात्र शब्दों के बजाय धर्मनिरपेक्ष स्वरूप भी हासिल किया है। एक बिंदु पर, धर्मनिरपेक्ष विचार, बहुलवादी भारत का सभी संप्रदायों और धर्मों की सहिष्णुता को भारतीय समाज का मूल माना जाता था।लेकिन, राजनीति के लिए छोटे वोट बैंक के रूप में संप्रदायों और धर्मों को उकसाया गया है। 1990 के दशक के शुरुआत से होने वाली घटनाओं ने वास्तविकता की स्थिति को बदल दिया है जो भारत का एक महत्वपूर्ण आधार था। भारत में धर्म निरपेक्षता का अर्थ इतिहास में बदल गया है, शुरुआत में इसे बहुसंख्यक विरोधी और अल्पसंख्यक समर्थक माना जाता था। इस अवधि के दौरान, कई राजनीतिक दलों ने अल्पसंख्यकों को सुदृढ़ और खुश करने के लिए धर्मनिरपेक्षता का उपयोग एक हथियार के रूप में किया। हालांकि, वर्तमान में, कुछ पक्षों ने भारतीय संदर्भ में बहुसंख्यक संप्रदायों को मजबूत करने के लिए धर्म निरपेक्षता के बहुसंख्यक समर्थकों के रूप में काम करना शुरू कर दिया है। राजनीतिक क्षेत्र में से कुछ ने धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा का विरोध किया है क्योंकि यह उद्देश्यों को पूरा करने में असफल रहा है, जबकि कुछ लोगों का मानना ​​है कि धर्मनिरपेक्षता के बिना भारत देश में हर जगह एक अस्थिर वातावरण पैदा हो जाएगा।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता और पश्चिमी अवधारणा में मतभेद

धर्मनिरपेक्षता की भारतीय अवधारणा, धर्मनिरपेक्षता की पश्चिमी व्याख्या से काफी विपरीत है। पश्चिम में, यह तीन प्रमुख आधारों (स्तंभो) धर्म की स्वतंत्रता, राज्य और धर्म को अलग करना, प्रत्येक नागरिक को उनके धर्म के बावजूद समान नागरिकता प्रदान करने पर आधारित है। यद्यपि भारतीय संविधान तीन स्तंभों में से केवल दो का पालन करता है, लेकिन यह सबसे महत्वपूर्ण एक का पालन करने में असफल रहता है, क्योंकि धर्म प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष साधनों के माध्यम से राज्य के काम-काज में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करता है। भले ही भारत के संविधान को भारत में सर्वोच्च कानून माना जाता हो, लेकिन भारतीय समाज की जटिलताएं शरीयत और हिंदू संहिता विधेयक जैसे व्यक्तिगत कानूनों को तब तक अस्तित्व में रहने की अनुमति देती है जब तक कि यह किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों और समाज में शांति और सद्भावना में बाधा न डाले।

पश्चिमी विविधता एक-दूसरे की कार्य पद्धति के साथ राज्य और धर्म में हस्तक्षेप न करने से संबंधित है। सत्ता राज्य के साथ संघर्ष करती है और अगर धर्म राज्य के कामकाज में बाधा उत्पन्न कर रहा है तो इसके अधिकारों को कम करने की अनुमति है। दूसरी तरफ, भारतीय धर्मनिरपेक्षता शांति और सद्भाव का माहौल बनाते समय व्यक्ति को अपने मौलिक अधिकारों का लाभ लेने की अनुमति देकर के एक समावेशी रूप पर ध्यान केंद्रित करता है। अवधारणा इस बात तक ही सीमित नहीं है कि धार्मिक समूहों को कैसे देखा जाए। जबकि, धर्मनिरपेक्षता का सार सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में राज्य और धर्म के बीच सकारात्मक संबंध बनाने में निहित है।

धर्मनिरपेक्षता के साथ भारत की दुविधा और आगे का मार्ग

भारत एक नव उदार राज्य के साथ एक धर्मनिरपेक्ष समाज का गठन करने के मामले में संघर्ष कर रहा है जिसने साझा नैतिकता की वैधता को व्यावहारिक रूप से नष्ट कर दिया है, देश ने आर्थिक उदारीकरण की यात्रा शुरू करने के बाद से आक्रामक भावनाओं को हटा दिया। उसी समय, कांग्रेस पार्टी की शक्ति में गिरावट आयी और राइट विंग राजनीति का उदय हुआ, राष्ट्रवादी जोश की भूमिका एक कल्याणकारी राज्य की लहर के साथ मिलकर एक स्वैच्छिक संघ में बदल दी गई जो व्यक्तिगत जिम्मेदारी की निजी नैतिकता के आधार पर संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता के आदर्शों को बिगाड़ रही है।

धर्मनिरपेक्षता का सार विभिन्न सामाजिक समूहों के साथ मेल-जोल बनाने और विद्वेष (घृणा) पर काबू पाने, जो भारतीय समाज के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर रहा है, में निहित है। भारत जैसे विविधता वाले देश में जहाँ विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के संदर्भ में मतभेद व्याप्त हैं, इस तरह के धार्मिक मतभेदों से निपटने के तरीके पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय विद्वेष की जड़ को खत्म करना जरूरी है। राज्य की भूमिका को कम करने के लिए न केवल विभिन्न धर्मों के बीच बल्कि विभिन्न सांस्कृतिक समूहों, संजातीय, क्षेत्रीय, भाषाई और जाति के बीच गहरे संबंधों को आगे बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।

 

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भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के लिए धर्मनिरपेक्षता एक आवश्यक घटक है और इसकी व्याख्या धर्मनिरपेक्षता के पश्चिमी आदर्शों से भिन्न है क्योंकि इसे भारतीय संविधान में निहित अधिकारों और प्रावधानों के आधार पर विचार-विमर्श करने के वर्षों बाद शामिल किया गया है।