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“मन की बात” के चार साल का विश्लेषण

October 1, 2018
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"मन की बात" के चार साल का विश्लेषण

2014 के लोकसभा चुनावों में सत्ता में आने के कुछ ही समय बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए एक रेडियो कार्यक्रम – “मन की बात” 3 अक्टूबर 2018 को अपने 4 साल पूरे कर लेगा। आमतौर पर महीने में एक बार प्रसारित हो रहे इस रेडियो कार्यक्रम को जनता के साथ प्रधानमंत्री मोदी के “विशाल संयोजन” के रूप में चित्रित किया गया है।

जैसा कि ‘मन की बात‘ अपने चार साल पूरे कर रहा है, तो आइए देखते हैं कि यह भारतीय नागरिकों के जीवन और विचारों को कितना अधिक प्रभावित करने में कामयाब रहा है।

‘मन की बात‘ एक संक्षिप्त परिचय

स्वयं प्रधानमंत्री मोदी द्वारा आयोजित इस भारतीय कार्यक्रम में – अखिल भारतीय रेडियो (एआईआर), डीडी न्यूज और डीडी नेशनल के माध्यम से नागरिकों को संबोधित किया जाता है। इसके अलावा, कुछ अन्य एफएम चैनलों को भी कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग प्रसारित करने की अनुमति दी गई है। पहले संस्करण में, प्रधानमंत्री ने बहुचर्चित ‘स्वच्छ भारत अभियान‘ के बारे में बात की थी और श्रोताओं से खादी उत्पादों का उपयोग करने का आग्रह भी किया था, जिससे छोटे पैमाने पर व्यवसायों को प्रभावी रूप से मदद मिल सके।

यह अनुमान लगाया गया है कि देश की 90% आबादी के पास रेडियो प्रसारण की पहुंच है, यही कारण है कि रेडियो प्रसारण को पहले स्थान पर चुना गया था।

जनता की राय

मोदी सरकार के समर्थकों या “प्रशंसकों” ने पहली बार लॉन्च होने के बाद से ही इस रेडियो कार्यक्रम की प्रशंसा की है और इसे प्रधानमंत्री को जनता के संपर्क में आने वाला सबसे महत्वपूर्ण कदम बताकर संदर्भित किया है। बहुत से नागरिकों का मानना है कि जनता को सीधे संबोधित करने के लिए रेडियो का माध्यम सबसे आसान तरीका है। अधिकांश लोगों के अनुसार, मन की बात ने आम जनता को आश्वासन दिया है कि सरकार उनके लिए काम कर रही है। दूसरे लोगों का मानना है कि यह “जनता के बीच अपने आप को हाइलाइट करने का एक शानदार तरीका है”।

हालांकि, हर कोई इस रेडियो कार्यक्रम को, बड़ी सफलता के रूप में नहीं देखता है। जैसा कि अक्सर अन्य राजनीतिक दलों के सदस्यों, या यहां तक कि आम जनता में भी कई लोगों ने कहा है, कि यह कार्यक्रम राजनीतिक एजेंडे की श्रंखला का दूसरा प्रकार है।

एक अलग दृष्टिकोण

2016 में, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी “टॉक टू एके” नामक एक “टॉक शो” लॉन्च किया था। इसके खर्च की वजह से कार्यक्रम जल्द ही सीबीआई की जाँच के साथ विवादों में घिर गया था। हालांकि, ‘टॉक टू एके‘ के साथ ‘मन की बात‘ की तुलना करते समय, अन्य मानदंडों का उपयोग किया जाता है। उदाहरण के तौर पर, जहां मोदी का रेडियो कार्यक्रम काफी हद तक पहले से रिकार्ड किया होता है वहीं केजरीवाल को सीधा प्रसारण करने के लिए संवादात्मक अधिवेशन का सहारा लेना पड़ता है। इसलिए स्वाभाविक रूप से, रेडियो पर बाद वाले को बहुत से ‘असुविधाजनक’ सवालों का जवाब देना पड़ता है।

प्रधानमंत्री पर चुटकी लेते हुए, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पहले कहा था कि वह हरियाणा, डोकलाम आदि मुद्दों में बलात्कार के बारे में प्रधानमंत्री से पूछना चाहते हैं। इरादा सीधा सा था – नरेंद्र मोदी की इन ‘मुद्दों पर रणनीतिक चुप्पी’ को तोड़ना। मोदी पर किए गए इस वार में राहुल गांधी अकेले नहीं रहे हैं। ‘मन की बात‘ अपनी प्रामाणिकता पर सवालों के साथ आलोचकों की दृष्टि में आती-जाती रही है।

निष्कर्ष

इस बात को स्वीकार किया जाना चाहिए कि मोदी ‘मन की बात‘ के माध्यम से अपनी बात को प्रसारित करने में सफल रहे हैं। कुल मिलाकर, जनता ने इसे स्वीकार कर लिया है, बहुत से लोगों ने इसकी प्रशंसा की है। हालांकि, कोई भी सिक्के का एक पहलू ही देखकर संतुष्ट नहीं हो सकता है। पीएमओ ने जनता के सुझावों को आमंत्रित किया है और लोगों से उन मुद्दों के बारे में पूछा है जिन पर वे मोदी को सुनना चाहते हैं। फिर भी, कई ‘असहज’ प्रश्न रेडियो कार्यक्रम में अपना रास्ता बनाने में असफल रहे हैं। मन की बात – एक आम आवाज है जो प्रायः गूंजती है। जिसको प्रधानमंत्री से संचार का एक उत्कृष्ट तरीका माना जाता है। ठीक है, पर आपको यह भी मानना पड़ेगा कि संचार का मार्ग दो-तरफा होता है।

 

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2014 के लोकसभा चुनावों में सत्ता में आने के कुछ ही समय बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए एक रेडियो कार्यक्रम – “मन की बात” 3 अक्टूबर 2018 को अपने 4 साल पूरे कर लेगा। आमतौर पर महीने में एक बार प्रसारित हो रहे इस रेडियो कार्यक्रम को जनता के साथ प्रधानमंत्री मोदी के “विशाल संयोजन” के रूप में चित्रित किया गया है। क्या यह सच है?