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भारत और धार्मिक पाखण्डता

August 1, 2018
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भारत और धार्मिक पाखण्डता

यद्यपि धर्म की कोई “एक यथार्थ” व्याख्या नहीं है, फिर इसे अक्सर विश्वास या एक अलौकिक शक्ति की पूजा’ के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसे व्यापक रुप में ‘ईश्वर का नाम दिया जाता है। अनुमानों के अनुसार, दुनिया में लगभग 4200 धर्म और निश्चित रूप से, अनगिनत भक्त हैं। भारत अकेला कम से कम नौ मान्यता प्राप्त धर्मों का घर है, यदि हम मानते हैं कि हिंदू धर्म अकेला है (यह चर्चा का विषय है  कि हिंदू धर्म अकेला है या नहीं)। चलिए कुछ समय के लिए, इसे एक अकेला धर्म मान लेते हैं।

प्राचीन काल से, भारत धर्मों का एक केंद्र है और देश के भीतर या बाहर उनका जन्मदाता रहा है। हिंदू, सिख, बौद्ध जैसे धर्मों का उद्भव भारत में हुआ है, जबकि ईसाई, इस्लाम धर्म जैसे अन्य धर्म बाहर से आकर यहां बस गये हैं। उदाहरण के लिए, हमारे इतिहास में लिखित विदेशी धर्मों में यहूदी धर्म पहला धर्म था। भारत उन देशों में से एक था जहां यहूदी धर्म को किसी भी यहूदी-विरोधी वाद का सामना नहीं करना पड़ा। वर्तमान में, भारत देश में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी निवास करती है। भारत को दुनिया के विविध धर्मों वाले देशों में से एक मानना और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रुप में उल्लेखित करना गलत नहीं होगा। फिर हमारे देश की धार्मिक असहिष्णुता में वृद्धि क्यों हो रही है?

धार्मिक हिंसा बढ़ रही है

भारत हर साल धार्मिक और सांप्रदायिक हिंसा की भयावह स्थिति को झेल रहा है। 2017 में, प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा 198 देशों के विश्लेषण ने धर्म से सम्बन्धित दंगों के लिए भारत को चौथा स्थान दिया। थोड़ा गहराई से सोचें, तो हम देखते हैं कि भारत से पहले केवल तीन देश – इराक, सीरिया और नाइजीरिया हैं। हमारी सहिष्णुता कहाँ गायब हो रही है? और, क्या हमारा देश खुद को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र कहलाने का अधिकार रखता है जहाँ हम लोगों को हर दिन धर्म के नाम पर एक दूसरे को मारते और काटते देख रहे हैं?

गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017 धार्मिक हिंसा की 822 घटनाओं का साक्षी है। 2014 से 2017 तक सांप्रदायिक हिंसा के आंकड़ों में 28% की वृद्धि दर्ज की गई। 2010 में, कोच्चि में एक अदालत ने 13 लोगों को एक ईसाई प्रोफेसर का हाथ काटने में दोषी पाया। कारण यह था कि उन पर एक प्रश्न पत्र में पैगंबर मोहम्मद का अपमान करने का आरोप था। उन पर सांप्रदायिक घृणा उत्पन्न करने का आरोप था और जब प्रोफेसर छिपे हुए थे तो उनके बेटे को पुलिस हिरासत में पीटा गया था। बाद में, दक्षिण भारत में स्थित एक चरमपंथी मुस्लिम संगठन, भारत के लोकप्रिय मोर्चा (पीएफआई) के सदस्यों ने उनका दाहिना हाथ काट दिया।

गाय के प्रति जागरुकता ने देश में चर्चा का विषय बनने के साथ ही, मुस्लिम आबादी के खिलाफ हिंसा में कथित तौर पर वृद्धि की है। 2018 की शुरुआत में, झारखंड में एक पेड़ से लटके दो मुस्लिम मवेशी व्यापारियों के मृत शरीर पाये गये थे। हरियाणा में, एक महिला ने बताया कि गो मांस खाने के आरोपों पर उसके और उसकी 14 वर्षीय चचेरी बहन के साथ पुरुषों द्वारा बलात्कार किया गया था। कोई भी धर्म नहीं है जो शत्रुता के स्पर्श से अछूत रहा हो। गुजरात के सांप्रदायिक दंगे (1969), सिख विरोधी दंगे (1984), कश्मीरी हिंदुओं के खिलाफ हिंसा, गोधरा काण्ड (ट्रेन का जलना 2002) एक अन्य लंबी सूची से सिर्फ कुछ ही नाम हैं।

हमारे धर्मों में पाखंडता

हिंदू धर्म सम्मान की देवी सरस्वती को बुद्धि और ज्ञान की देवी के रूप में संदर्भित करता है। 2018 के जाट दंगों में, दंगाइयों ने स्कूल में आग लगाने से ठीक पहले, देवी सरस्वती की मूर्ति को सुरक्षा के लिए वहां से हटा दिया था। इस तरह की किसी विडंबना पर हंसना मुश्किल है। गाय सतर्कता पर पुन: विचार करते हैं, वर्तमान समय में हिंदू कार्यकर्ता गो मांस खाने और गौ हत्या की निंदा करते हैं। लेकिन अगर कोई प्राचीन हिंदू ग्रंथों का अध्ययन करे, जिसमें अनगिनत उल्लेख हैं जो कुछ और ही कहते हैं। प्राचीन अनुष्ठान ग्रंथ ब्राह्मण (शताब्दी 900 ईसा पूर्व) के अनुसार एक बैल या एक गाय को मारा जाना चाहिए और बाद में अतिथि के आगमन के सम्मान में खाया जाना चाहिए। पवित्र कुरान कहता है कि “धर्म में कोई बाध्यता नहीं होगी” और फिर भी चरमपंथी कुरान के शब्दों को अपने स्वयं के उद्देश्य की पूर्ति के लिए बदल देते हैं। “जिहाद” एक अरबी शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है प्रशंसनीय उद्देश्य के लिए संघर्ष करना, लेकिन वर्तमान समय में, इस शब्द का अर्थ इतना गलत लगाया जाता है कि इसे अक्सर इस्लाम के नाम पर हिंसा के रूप में लिया जाता है।

निष्कर्षः

राष्ट्रीय इतिहास के पाठ्यक्रम के माध्यम से ‘अनेकता में एकता’ के लिए हमारे भारत ने बहुत गर्व प्राप्त किया है। अर्मेनियाई ईसाइयों से लेकर यहूदियों की सहिष्णुता तक, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राष्ट्र हमेशा शरण देने वाला राष्ट्र रहा है। तो फिर ऐसा क्यों है कि हमारे देश को, सीरिया जैसे तनाव पूर्ण माहौल वाले देशों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने के कारण, दुनिया के धार्मिक विरोधी देशों में एक गिना जाता है। निश्चित रूप से, एक अंतर्दर्शन करने की आवश्कता है।

सबसे बड़ी समस्या शायद यह है कि हमारे अंदर अपनी असहिष्णुता है और आलोचना सुनने की क्षमता कम है। उपनिषदों में पाया गया है कि प्राचीन भारत में धर्म पर बहस करने की प्रचलित संस्कृति थी। महिलाए भी सक्रिय रूप से इस बहस का हिस्सा होती थीं। आज, हालांकि, छोटी आलोचनाएं बड़े दंगों, हिंसा और क्रूर हत्याओं में बदल जाती हैं- हर कोई अपने धर्म की रक्षा करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन किस कीमत पर और किस हद तक? क्या शांतिपूर्ण राष्ट्र की सारी आशाएं समाप्त हो गई हैं?

2015 में, सिखों और हिंदुओं ने पंजाब के लुधियाना जिले के पास एक मस्जिद के पुनर्निर्माण में योगदान दिया था। 2017 में, मुम्बई पुलिस ने ईद और गणेश चतुर्थी को एक ही पंडाल में एक साथ मनाते हुए लोगों की तस्वीरें साझा की जो इंटरनेट पर खूब वायरल हुई। देश ने समय समय पर कुछ ऐसे साक्ष्यों को प्रदर्शित किया जो हमारी एकता के प्रतीक हैं। और हालांकि इन चीजों को हम नकारात्मकता से नहीं ले सकते हैं और न ही इसे अनदेखा कर सकते हैं, बल्कि हम कह सकते हैं कि उम्मीदें अभी भी बरकरार हैं। लोग धर्म को ‘एक शांतिपूर्ण जीवन जीने का एक तरीका’ समझते हैं। यदि वही धर्म जब अहंकार के बादलों में घिरा न हो, तो स्थिति ज्यादा गंभीर दिखाई नहीं देती है। अन्यथा, हमारा देश जो कभी “अनेकता में एकता” का प्रतीक था, इसी अनेकता की वजह से विभाजित भी हो जाएगा।

 

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भारत और धार्मिक पाखण्डता
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भारत के पास दुनिया भर के विविध धर्मों के लिए शरण स्थान का एक समृद्ध इतिहास है। तो फिर क्यों यहां धार्मिक पाखंडता फैल रही है?