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भारतीय अर्थव्यवस्था : 2022 तक भारत निकल जाएगा जर्मनी से आगे

July 11, 2018
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भारतीय अर्थव्यवस्था

15 अगस्त 1947 को आजादी के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले 7 दशकों में एक लंबा सफर तय कर चुकी है। 200 साल की अधीनता और भारत के प्राकृतिक संसाधनों के निष्कर्षण के बाद जब औपनिवेशिक शासन खत्म हुआ, तब भारतीय अर्थव्यवस्था का हाल बहुत ही बुरा था। गरीबी में रहने वाली आबादी का लगभग आधा हिस्सा लगातार पड़ने वाले अकाल के कारण परेशान था और पुराने उद्योग जनसंख्या की जरूरतों को पूरा कर पाने में सक्षम नहीं थे। हालांकि, भारतीयों ने दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक अर्थव्यवस्था बनने के लिए  रास्ते में पड़ने वाली सभी बाधाओं को पार कर लिया है।अप्रैल 2018 में, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के विश्व आर्थिक दृष्टिकोण (डब्ल्यूईओ) के डाटा बेस के अनुसार, भारत ने वित्तीय वर्ष 2017-18 में 2.6 ट्रिलियन डॉलर (करीब 170 लाख करोड़ रुपये) के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के साथ फ्रांस को दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में विस्थापित कर दिया। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुमानों के अनुसार, भारत अपने औपनिवेशक शासक यूनाइटेड किंगडम के साथ-साथ जर्मन अर्थव्यवस्था से भी आगे निकल गया है। 2022 तक भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए तैयार है।

नयी आर्थिक नीति (एनईपी) और भारत की अर्थव्यवस्था में सुधार

1 9 80 के दशक के अंत में भारतीय अर्थव्यवस्था एक अस्थिर राजनीतिक समय के साथ संकट ग्रस्त रही थी जिसने देश की अर्थव्यवस्था की वृद्धि और समृद्धि को भी प्रभावित किया था। व्यापारिक लेन-देन में घाटे, चालू खाते में घाटे, विनिमय दर में मूल्य ह्रास, गोल्ड का भण्डार समाप्त होने के साथ, देश अपने वित्तीय दायित्वों एवं कई अन्य घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय कारकों पर डिफॉल्टिंग के कगार पर था। वैश्विक वित्तीय संगठन कुछ निश्चित शर्तो पर चंद्रशेखर सरकार को ऋण देने के लिए सहमत हो गया था, जिसमें भारत के  स्वर्ण भंडारों की आपूर्ति एवं कर और व्यापार सुधारों की प्रस्तावना को सम्मिलित किया गया था। यह पूरी स्थिति प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सरकार के पतन का कारण बनी थी।

जुलाई 1991 में, पी. वी. नरसिम्हा राव ने सरकार का प्रभार संभालते ही नई आर्थिक नीतियों के परिचय को प्रस्तुत किया। जिससे न केवल आवश्यक कर सुधार किए गए बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की शुरुआत भी की गई। इन सुधारों से आयात शुल्क में कमी, करों में कमी, बाजारों के विनियमन ने अधिक विदेशी निवेशों को बढ़ावा दिया। जिसने न केवल देश में आर्थिक संकट की स्थिति पैदा की बल्कि दुनिया में भारत को सबसे तेजी से विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने के मार्ग पर भी ला दिया था।

हाल ही में हुए सुधार

नई सदी के पहले दशक के अंत में यूपीए सरकार को भ्रष्टाचार के कई आरोपों का सामना करना पड़ा, जिससे सरकार ने अपनी लोकप्रियता को बहुत ही तेजी से खो दिया। यह लोकप्रियता ही थी जिसने उन्हें 2004 और 2009 के आम चुनावों में लगातार मिलने वाली चुनावी सफलताओं के लिए प्रोत्साहित किया। विदेशी, निवेशक सुधार और नीति पक्षाघात की कमी के चलते भयभीत और निराश हो रहे थे, क्योंकि महत्त्वपूर्ण सुधार, यूपीए सहयोगियों और विपक्षी दलों के बीच सर्वसम्मति की कमी के कारण संसद में पारित नहीं हो पा रहे थे।

2014 में, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के आम चुनावों में अपने दम पर बहुमत हासिल किया और लगभग 30 वर्षों के बाद ऐसा करके ऐतिहासिक जनादेश के साथ जीत हासिल की। तब से मोदी सरकार ने वित्तीय समावेशन के लिए जन धन योजना, बाजार और काले धन के रूप में नकली मुद्राओं पर रोंक, 1000 और 500 के नोटों के विमुद्रीकरण के साथ कई सुधार किए हैं। कई अन्य ऐसे सुधार हैं जिन्होंने न केवल घरेलू बल्कि विदेशी निवेशकों के व्यवसाय में आसानी से सुधार किया है। जुलाई 2017 में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करके भारत में सबसे बड़े कर सुधार की शुरुआत की।

शुरुआत में, जीएसटी और विमुद्रीकरण (नोटबन्दी) के कारण कुछ प्रमुख क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा भारत की अनुमानित वृद्धि में कमी के कारण भारत और दुनिया भर के अर्थशास्त्री भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर संदेहास्पद बातें कर रहे थे। हालांकि, समय के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था पर निवेशकों और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों का विश्वास वापस आ गया है जैसा कि आईएमएफ के विश्व आर्थिक परिदृश्य में वर्णित किया गया है, जिसमें भारत को 2018 के अंत तक पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में, यूनाइटेड किंगडम से आगे निकलने का अनुमान लागाया गया है। जबकि 2022 तक भारत क्रय शक्ति समता (पीपीपी) के आधार पर  सकल घरेलू उत्पाद के मामले में चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाएगा।