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भारत में फुटबॉल लोकप्रिय क्यों नहीं है?

June 13, 2018


भारत में फुटबॉल लोकप्रिय क्यों नहीं है?

“कृपया आओ और हमें समर्थन दो, हमें प्रोत्साहित करो, हमारी निंदा करो, हमारी आलोचना करो लेकिन स्टेडियम में हमें खेलते समय देखने अवश्य आओ। भारत में फुटबॉल की आवश्यकता है।” भारतीय फुटबॉल कप्तान सुनील द्वारा कही गई यह भावनात्मक अपील विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर गूँज रही है। भारतीय फुटबॉल टीम के कप्तान सुनील छेत्री की इस भावनात्मक अपील ने न केवल खिलाड़ी की चिंता को दिखाया बल्कि भारत में फुटबॉल की दुर्दशा के बारे में भी अवगत कराया है। भारतीय फुटबॉल टीम पूरे विश्व में न सही लेकिन एशिया की सबसे अच्छी टीमों में से एक थी, दशकों से देश के खराब प्रदर्शन और समर्थकों की गिरावटों ने उन्हें भारतीय फुटबॉल प्रशंसकों को भावनात्मक संदेश देने के लिए मजबूर किया। वर्तमान में दुनिया में सक्रिय तीसरा सबसे बड़ा गोल स्कोरर एक फुटबॉलिंग पावरहाउस बनने में देश के रास्ते में चुनौतियों और बाधाओं को इंगित करने से संकोच नहीं किया।

फुटबॉल जैसा शानदार खेल, अपने जोश और खेल की महानता के साथ दुनिया भर में लाखों दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर लेता है। दूसरी ओर भारत में, जमीनी स्तर पर इतनी अप्रयुक्त क्षमता और निवेश की कमी ने देश की उस प्रगति में बाधा डाली है जिसको 20 वीं शताब्दी में प्रारंभ किया गया था। भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम चरमोत्कर्ष समय 1951 से 1962 के बीच आया, उस समय टीम कई रजत मेडल की प्राप्ति करने का दावा कर रही थी। हालांकि 1950 में, जब ब्राजील ने 12 साल के ब्रेक के बाद फीफा विश्व कप की मेजबानी की, तो सरकारी संस्था ने द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के बाद प्रमुख रूप से टूर्नामेंट को बहाल करने का फैसला किया। कई यूरोपीय देशों के समर्थन के बाद भारत को प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन भारत के फुटबॉल संचालक मंडल एआईएफएफ ने दल को भेजने के लिए धन की कमी का हवाला देते हुए टीम को ब्राजील न भेजने का फैसला लिया। तब से, खेल ने अपनी लोकप्रियता खो दी और जल्द ही टीम एशियाई फुटबॉल के खेल विभाग से बाहर हो गई। हाल ही में 2014 में, देश अपने सबसे निम्न समय पर था क्योंकि यह सहयोगी राष्ट्र फीफा 206 में 171 वें स्थान पर रहा था। पिछले 6-7 दशकों में राष्ट्रीय टीम के हार के कारण कई कारक हैं हालांकि, देश ने पिछले 3-4 वर्षों में प्रगति की है।

 

भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम की घटती लोकप्रियता के प्रमुख कारण : 

 

1983 क्रिकेट विश्व कप और क्रिकेट का उदय

देश के संक्षिप्त इतिहास में बेहतरीन खेल चमत्कारों में से एक, 1983 क्रिकेट विश्व कप में भारतीय क्रिकेट टीम की सफलता हमेशा के लिए हर भारतीय की यादों से जुड़ रहेगी। कपिल देव ने विश्वकप फाइनल में दो बार विश्वकप विजेता वेस्टइंडीज के खिलाफ विश्वकप फाइनल में भारतीय क्रिकेट टीम का नेतृत्व किया, भारत ने पर्याप्त बाधाओं के बावजूद तेज गति की गेंदबाजी और शानदार बल्लेबाजी द्वारा विश्व-विजेता वेस्टइंडीज की टीम के छक्के छुड़ाकर पूरी क्रिकेट बिरादरी को चौंका दिया था जब कपिल देव सर विवियन रिचर्ड्स का अविश्वसनीय कैच लेकर लक्ष्य को हासिल करने के लिए सीमा की ओर बढ़ रहे थे तो शानदार कैच ने न केवल फाइनल में भारतीय क्रिकेट टीम का भाग्य बदल दिया बल्कि भारत में क्रिकेट का चेहरा ही बदल दिया। क्रिकेट निवेश और व्यावसायीकरण के प्रवाह के साथ यह जनता के बीच एक लोकप्रिय खेल बन गया, और जल्द ही देश में खेल का “धर्म” बन गया, जबकि फुटबॉल सहित अन्य खेल भुला दिए गए।

 

बुनियादी सुविधाओं की कमी

पिछले कुछ सालों में, भारतीय फुटबॉल टीम के खिलाड़ी देश में शानदार खेल की प्रगति को प्रभावित करने वाले बुनियादी ढांचे की कमी के बारे में निर्विवाद रहे हैं। 2015 तक, देश में एक भी ऐसा स्टेडियम नहीं था जो फीफा द्वारा निर्धारित रूप से चिन्हित किया सके। 2017 अंडर-17 फीफा विश्व कप से केवल एक साल पहले, फीफा ने दिल्ली, गुवाहाटी, मार्गो, नवी मुंबई, कोच्चि और कोलकाता में टूर्नामेंट के लिए मेजबान स्टेडियमों सहित कई स्टेडियमों को ग्रेडिंग दी थी। हालांकि, अधिकांश घरेलू स्टेडियम फीफा द्वारा मानक चीजों से अभी भी पीछे चल रहे हैं, जबकि देश में जमीनी स्तर पर स्थिति अधिक दयनीय है। देश में छोटे फुटबॉलरों के लिए कोई उचित संरचना या प्रशिक्षण सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ये असुविधाएं कभी-कभी खिलाड़ियों को वैकल्पिक रूप से अपना प्रोफेशन बदलने के लिए मजबूर कर देती हैं, क्योंकि प्रशिक्षण के लिए उचित बुनियादी सुविधाओं के बिना खिलाड़ी के रूप में जीवित रहना वास्तव में मुश्किल हो जाता है। केंद्रीय और राज्य सरकारों से धन की कमी के कारण विकृत मैदान और ड्रेसिंग रूम की सुविधाएं शोचनीय है, जिसमें प्रत्यक्ष मूल्य की दर्शक सुविधाएं भी शामिल हैं।

 

मीडिया कवरेज की कमी

मीडिया जनता के बीच जागरूकता फैलाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लोकप्रियता या किसी विशेष खेल की पहुँच मीडिया कवरेज पर निर्भर करती है। पिछले कुछ वर्षों में, भारतीय मीडिया ने घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैचों के कवरेज के लिए बहु अरब डॉलर के सौदों के साथ क्रिकेट और इसकी बढ़ती लोकप्रियता को बढ़ावा देने में सहायक भूमिका निभाई है। हालांकि, फुटबॉल सहित अन्य खेल मीडिया कवरेज के लाभों को प्राप्त करने में सक्षम नहीं हैं, क्योंकि आज भी देश के कई क्षेत्रों में भारतीय फुटबॉल टीम के लाइव मैचों को देखने का मौका नहीं मिल पाता। मीडिया के अभाव और कवरेज की कमी ने भारत में फुटबॉल के विकास में बाधा डाली है, क्योंकि कुछ खिलाड़ियों को छोड़कर बहुत से लोग, देश का प्रतिनिधित्व करने वाले खिलाड़ी के नामों को भी नहीं जानते हैं। पश्चिमी मीडिया की तुलना में जहाँ, हर खेल को समान कवरेज मिलता है, भारतीय मीडिया अभी भी क्रिकेट के आसपास केंद्रित है, हालांकि हाल के वर्षों में चीजों में सुधार होना शुरू हो गया है।

 

युवा विकास कार्यक्रम

भारत में अपरिपक्व युवा प्रतिभा वाले काफी लोग हैं, यदि उन्हें उचित कोचिंग (शिक्षण) और अधिक सुविधाएं प्रदान की जाएं तो वह विश्व विजेता (अन्य सभी की तुलना में बेहतर) बन सकते हैं। लेकिन, दुख की बात है कि आई-लीग क्लबों के साथ-साथ अन्य क्लबों में युवा विकास कार्यक्रमों की कमी ने लाखों युवाओं की आकांक्षाओं और उनके सपनों को चकनाचूर कर दिया है। पश्चिमी देश यह सुनिश्चित करते हैं कि क्लबों में युवा विकास कार्यक्रम हो क्योंकि ये युवा प्रतिभा को बढ़ावा देने में मदद करके स्थानीय युवाओं को पोषित करते हैं और उनकी प्रतिभा को बड़े पैमाने पर शुरू करने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं।

 

प्रगति की ओर

पिछले 3-4 सालों से, भारतीय फुटबॉल काफी आगे बढ़ रहा है, खासतौर पर इंडियन सुपर लीग की शुरुआत के साथ देश फीफा रैंकिंग में 97वें स्थान पर है। फुटबाल खेल की एकबार उपेक्षा के बाद से लोगों ने इस खेल पर अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया है। निवेश के प्रवाह ने भारतीय फुटबॉल के कारणों में मदद की है। क्रमिक सुधार राष्ट्रीय टीम के प्रदर्शन और आईएसएल क्लबों की बढ़ती लोकप्रियता पर दिखाई दे सकता है। फुटबॉल तेजी से उन क्षेत्रों में एक खेल के विकल्प के रूप में उभर रहा है जिनका मुख्य रूप से क्रिकेट की तरफ झुकाव है। फीफा (एफआईएफए) और कई अन्य हितधारकों के सहयोग से अखिल भारतीय फुटबाल महासंघ (एआईएफएफ) यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि “स्लीपिंग जेंट” वाले भारतीय खिलाड़ी क्या पूर्णतः अपने बुरे प्रदर्शन से बाहर आ रहे हैं और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। हालांकि, देश के खिलाड़ी फीफा विश्व कप के 2018 के संस्करण के लिए रूस जाने के अपने अवसर से चूक गए हैं, लेकिन खिलाड़ी अपने उत्साह के साथ इस खेल को उस मुकाम तक पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं और यह  समय की बात होगी, जब ब्लू ब्रिगेड सबसे बड़े मंच पर सब देशों में भारत भी देश का नेतृत्व करेगा।

 

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भारत में फुटबाल इतना लोकप्रिय क्यों नहीं है
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2015 से पहले भारतीय फुटबॉल टीम की स्थिति दयनीय थी, जिससे देश में इस खेल की लोकप्रियता में कमी आई। लेकिन, हाल ही के वर्षों में चीजों में सुधार करना शुरू हो गया है और देश फुटबॉलिंग पावरहाउस बनने की सही दिशा में आगे बढ़ रहा है।