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छात्रों और शिक्षकों के लिए दीवाली पर निबंध

October 14, 2017
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छात्रों और शिक्षकों के लिए दीवाली पर निबंध

दीवाली पर निबंध लिखना मुश्किल हो सकता है, लेकिन यह किसी भी तरह से असंभव नहीं है। दीवाली पर स्कूल या महाविद्यालय के छात्रों द्वारा संदर्भ बिंदु का इस्तेमाल करके संक्षिप्त रूप में निबंध लिखा जा सकता है। शानदार दीवाली या दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं!

संस्कृत में दीपावली या दीवाली के नाम से जाना जाने वाला यह त्यौहार, भारत के हिंदूओं का सबसे प्रसिद्ध त्यौहार है। शानदार दीपकों की रोशनी, मजे और आनंद से परिपूर्ण यह त्यौहार, रचनात्मक रंगोली के साथ-साथ सजे हुए घर और बेहतरीन व्यंजनों और पूजा प्रसादों के साथ मनाया जाता है। यह एक ऐसा दिन होता है, जब हर कोई नए और रंगीन वस्त्रों को धारण करके त्यौहार के आकर्षण और उत्सव में बढ़-चढ़ कर अपना योगदान देता है।

इस दिन सभी परिवारों के लोग नवीनता के साथ प्रेम भाव से मिल-जुलकर रहने और आने वाले वर्ष में अच्छाई के मार्ग को अपनाने की प्रतिबद्धता और संकल्प लेते हैं। भारत के कई हिस्सों में, दीपावली का उत्सव पटाखों के साथ मनाया जाता है, जबकि कुछ अन्य हिस्सों में यह अभी भी शांति के साथ बेहतरीन तरीकों को अपनाकर मनाया जाता है।

दीपावली प्राचीन हिंदू त्यौहारों में से एक है और इस त्यौहार का पद्म पुराण, स्कंद पुराण और कथा उपनिषद में भी उल्लेख है।

दीवाली का त्यौहार शरद ऋतु के मौसम की अंधेरी रात में होता है, इसलिए दीवाली की रात को अमावस्या के रूप में भी जाना जाता है। दीवाली का उत्सव हिंदू चंद्र महीना अश्विन के अंत के साथ कार्तिक महीने की पहली तिथि को मनाया जाता है।

हिंदू धर्म एक प्राचीन धर्म है, जिसकी उत्पत्ति समय के साथ हुई है, क्योंकि इसकी विविध व्याख्याएं हैं। हिंदू धर्म में हजारों देवता हैं और प्रत्येक के पास उनके अपने अनुयायियों के लिए अपनी खुद की दंतकथा और प्रेरणादायक कहानियाँ हैं।

आज के समय में हम विभिन्न किंवदंती (दंतकथाओं) और धारणाओं तथा विभिन्न व्याख्यानों को देखते हैं, लेकिन भारत के अलग-अलग हिस्सों में इस त्यौहार को विभिन्न व्याख्यानों के साथ बड़ी धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है।

अधिकतर, दीवाली के उत्सव को पाँच दिवसीय महोत्सव के रूप में मनाया जाता है और भारत का प्रत्येक क्षेत्र इस उत्सव को अपने अनूठे तरीके से मनाता है। यहाँ पूरे भारत में विभिन्न तरीकों से मनाए जाने वाले पाँच दिवसीय महोत्सव का एक संक्षिप्त सारांश प्रस्तुत है:

पहला दिन: धनतेरस, धनवंतरी त्रयोदशी अस्वेयुजा बहुला त्रयोदशी, यमदीपदान, धनत्रयोदशी।

दूसरा दिन: नर्क चतुर्दशी, दिव्वेला पांडुगा।

तीसरा दिन: लक्ष्मी जी पूजा, काली माता की पूजा, 14 साल का वनवास पूरा करने के बाद भगवान राम, उनकी पत्नी सीता और छोटे भाई लक्ष्मण की घर वापसी, भगवान महावीर के निर्वाण प्राप्ति का दिन, बंदी चोर दिवस – छठे सिख गुरु हर गोविन्द सिंह का स्वर्ण मंदिर में वापस लौटना, अशोक विजयादशमी – सम्राट अशोक द्वारा हिंसा का त्याग और बौद्ध धर्म को अपनाना, कौमुदी महोत्सव – बलींद्र पूजा – कार्तिगई दीपम – दक्षिण भारत की थालई दीपावली।

चौथा दिन : पड़वा, बलिप्रतिपदा, बलि पाद्यम

पाँचवा दिन: भाई दूज, भातृ द्वतीया, यम द्वतीया, दिव्वेला पंडुगा

दीया का महत्व

इस त्यौहार में पारंपरिक ‘दीए’ की रोशनी का धार्मिक क्रिया के रूप में उपयोग किया है और इसका भारत के विभिन्न हिस्सों में बहुत ही महत्व है।

विशेष रूप से उत्तरीय भारत के लोगों का विश्वास यह है कि भगवान राम अपनी पत्नी सीता और अपने छोटे भाई लक्ष्मण सहित 14 साल का वनवास पूरा करने के बाद अपने राज्य अयोध्या में लौटे थे। वनवास के समय भगवान राम और उनके भाई लक्ष्मण ने सीता का अपहरण करने वाले राक्षसों के राजा रावण जो लंका में निवास करता था, उसके साथ भयंकर युद्ध करके विजय हासिल की थी।

उस युद्ध में भगवान राम के हाथों रावण की मृत्यु हुई और इसलिए इस युद्ध का आकलन बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में किया जाता है। शरद ऋतु की अंधेरी रात या ‘अमावस्या’ की रात में जब राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या आए, तो वहाँ के ग्रामीणों ने अपने राजा राम का अयोध्या में जलते हुए ‘दियों’ के साथ स्वागत किया था।

दीवाली के पाँच दिनों के उत्सव

पहला दिन – धनतेरस, धनवंतरी त्रयोदशी अस्वेयुजा बहुला त्रयोदशी, यमदीपदान, धनत्रयोदशी

दीवाली त्यौहार के पाँच दिवसीय उत्सवों में पहला उत्सव धनतेरस का होता है। धनतेरस का उत्सव, धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी व स्वास्थ्य और सेहत की देवी धनवंतरी के जन्मदिन के रूप में भी मनाया जाता है। इनके सम्मान में, लोग और व्यवसायिक लोग अपने घरों और कार्य वाले स्थानों की सफाई और सजावट करते हैं। यह एक ऐसा दिन होता है, जब लोग सोने या चाँदी से बने हुए विभिन्न प्रकार के आभूषण खरीदते हैं, क्योंकि यह हिंदू विक्रम संवत के अनुसार, आने वाले नए साल के लिए शुभ माने जाते हैं। धनतेरस के दिन स्टील के बर्तनों को भी खरीदना शुभ माना जाता है।

महिलाएं और युवा लड़कियाँ अपने घरों की फर्श पर सुंदर रंगोली भी बनाती हैं और शाम के समय सभी के घरों में लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है। इस दिन दियों को जलाकर देवी का स्वागत किया जाता है।

दक्षिण भारत में लोग सुबह के समय से ही धन के स्वामी भगवान कुबेर की अस्वेयुजा बहुला त्रयोदशी के रूप में उत्सव मनाते हुए पूजा करते हैं। इस उत्सव का शुभारंभ भगवान विघ्नेश्वर की पूजा से होता है और लोग गुड़, शहद, आटा और मेवों के व्यंजनों को अर्पित करके भगवान विघ्नेश्वर की पूजा-अर्चना करते हैं।

दक्षिण भारत के लोग इस समय अपने घरों की साफ-सफाई और उनका नवीनीकरण करते हैं। जबकि व्यापारी भी इस समय ऐसा ही करते हैं, क्योंकि वे नए वित्तीय वर्ष का निर्माण करने के लिए, पुराने बहीखातों का निपटान करते हैं।

दूसरा दिन – नर्क चतुर्दशी

दिवाली के दूसरे दिन का उत्सव राक्षस राजा नरकासुरा के वध के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। नरकासुर का वध भगवान कृष्ण और उसकी पत्नी सत्यभामा द्वारा किया गया था। नर्क चतुर्दशी की पौराणिक कथा यह है कि भगवान विष्णु ने नरकासुर की भक्ति से प्रसन्न होकर, उसे दीर्घायु का वरदान दे दिया था।

नरकासुर ने इस वरदान का फायदा उठाते हुए, अपनी अजेयता पर धमंड किया और सभी तीनों लोकों में काफी उत्पात मचाया। इससे परेशान होकर सभी देवताओं और प्रजा ने सहायता के लिए भगवान विष्णु से संपर्क किया था और भगवान विष्णु ने नरकासुरा का वध करने के लिए अपनी पत्नी सत्यभामा को भेजा था।

यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मरने से पहले नरकासुर ने भगवान कृष्ण से विनती की कि लोग उसकी मृत्यु को याद रखें और इसलिए, इस दिन को नर्क चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है।

पूर्व में बंगाल, बिहार और असम के लोगों का मानना ​​था कि काली देवी ने भयंकर क्रोध के आवेश में आकर नरकासुर का वध कर दिया था और इसलिए इस दिन काली देवी की पूजा की जाती है। पूर्वी भारत के कुछ भागों में इस दिन का उत्सव श्यामा पूजा या निशा पूजा के रूप में भी मनाया जाता है।

तीसरा दिन – सबसे बड़ा उत्सव या बड़ी दीवाली – लक्ष्मी जी की पूजा, काली जी की पूजा, भगवान महावीर के निर्वाण प्राप्ति का दिन, बंदी चोर दिवस, अशोक विजयादशमी, कौमुदी महोत्सव – बलींद्र पूजा – कार्तिंगई दीपम – दक्षिण भारत की थालई दीपावली

यह वह दिन है जब भगवान राम, सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास पूरा करके लौटते हैं और इस दिन पूरा देश प्रार्थनाओं और दियों के प्रकाश के साथ-साथ आसमान में पटाखों को छोड़कर भगवान के आगमन का उत्सव मनाते हैं।

इस दिन लक्ष्मी देवी की पूजा की जाती है। उत्तर और मध्य भारत में इस दिन पटाखों का जलाना अब एक राष्ट्रीय प्रचलन हो गया है, लेकिन पूर्व या दक्षिण भारत में पटाखों का उपयोग नहीं किया जाता है। दीवाली की शाम को भगवान गणेश, देवी सरस्वती और भगवान कुबेर के साथ-साथ लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना की जाती है।

दक्षिण भारत में भी, इस दिन देवी लक्ष्मी की व्यापक रूप से पूजा की जाती है और लोग देवी की उपासना और आशीर्वाद के साथ अपने दिन की शुरुआत करते हैं।

भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा

कर्नाटक और दक्षिणी भारत के अन्य हिस्सों की कथा यह है कि जब राजा बलि ने देवताओं पर काफी कहर बरपाया, तो सभी देवतागण इसके समाधान के लिए भगवान विष्णु के पास गए। नतीजतन, भगवान विष्णु बौने का रूप (वामन अवतार) धारणकर पृथ्वी पर राजा बलि के पास गए। भगवान विष्णु राजा बलि के सामने अपने आप को एक विनम्र ब्राह्मण के रूप में प्रस्तुत किया। राजा बलि ने वामन अवतारी भगवान विष्णु से पूछा कि वह क्या चाहते हैं। वामन अवतारी ने राजा बलि से सिर्फ 3 पग (पैर) भूमि दान में माँगी।

राजा बलि ने छोटे अनुरोध को देखते हुए, तुरंत हामी भर दी। वामन अवतार को धारण किए हुए भगवान विष्णु उसी समय अपने वास्तविक रूप में आ गए और उन्होने दो पग में स्वर्ग और पृथ्वी को कवर कर लिया। चूँकि राजा बलि तीन पग पर सहमत हुए थे, इसलिए उन्होने तीसरे पग के लिए अपने सिर को आगे बढ़ा दिया और इस तरह बाली को नरक जाना पड़ा; कुछ लोग मानते हैं कि उसने जमीन के (अधोलोक पाताल) पर अपना वर्चश्व कायम कर लिया।

ऐसा कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने राजा बलि को सालभर में सिर्फ एक बार प्रकाशमय दीपावली के दिन पृथ्वी पर वापस आने और लोगों के साथ खुशी बाँटने की अनुमति दी थी। यह भी माना जाता है कि भगवान विष्णु अंततः दीपावली के तीसरे दिन – कार्तिक शुध्द पाद्यमी को राजा बलि को पृथ्वी पर वापस आने और भलाई पूर्वक शासन करने के लिए सहमत हो गए थे।

यह ध्यान देना दिलचस्प है कि यह दिन सिख समुदाय के लोगों के लिए बंदी छोड़ दिवस के रूप में काफी महत्व रखता है। यह वह दिन है, जब मुगल सम्राट जहाँगीर ने ग्वालियर किले की जेल से 52 हिंदू राजकुमारों के साथ-साथ छठे सिख गुरु हरगोबिन्द सिंहजी को भी आजाद कर दिया था। इस दिन को यादगार बनाने के लिए, वर्ष 1577 में अमृतसर में स्वर्ण मंदिर की नींव रखी गई थी। पूरे विश्व के और भारत के सिखों द्वारा बंदी छोड़ दिवस का उत्सव पूरे दिन स्वर्ण मंदिर में प्रार्थना के साथ मनाया जाता है।

बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए यह दिन इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दिन सम्राट अशोक ने कलिंग के खूनी युद्ध के बाद, हिंसा का त्याग किया था और बौद्ध धर्म को अपनाते हुए, शांति और ज्ञान को प्राप्त करने वाले मार्ग का अनुसरण किया था।

जैन धर्म के अनुयायी इस दिन को, अपने भगवान महावीर के निर्वाण के प्राप्ति का प्रतीक मानते हैं। दुनिया भर में जैन समुदाय के लोग इस दिन प्रार्थनाओं के साथ-साथ उत्सव का आयोजन करते हैं।

यह वह दिन है, जब गौतम स्वामी ने भगवान महावीर के मुख्य शिष्य बनकर पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया था और इसलिए आज भी यह उनके लिए समर्पित हैं।

चौथा दिन – पड़वा, बलिप्रतिपदा, बलि पाद्यम

हिंदू विक्रम संवत के अनुसार, यह दिन नए साल का पहला दिन है। व्यवसाई और व्यापारियों के लिए यह नए साल का पहला दिन है और वे कुशलपूर्वक साल के शुभारंभ के लिए प्रार्थना करते हैं।

भारत के कई हिस्सों में, दीवाली के चौथे दिन को बलिप्रतिपदा के रूप में मनाया जाता है क्योंकि इस दिन राजा बलि का पृथ्वी पर आगमन हुआ था। दूसरे भागों में, यह दिन पति-पत्नी के बीच प्रेम को चिन्हित करने वाले पड़वा के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि इस दिन दोनों ने एक बार फिर से एक दूसरे के प्रति प्रेम और प्रतिबद्धता की पुष्टि की थी।

उत्तर और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में आज भी यह दिन गोवर्धन पूजा या अन्नकूट उत्सव के रूप में मनाया जाता है। लोकप्रिय पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था, ताकि वृंदावन के लोग मूसलधार बारिश से बच सकें। वृंदावन में यह दिन भगवान कृष्ण द्वारा उठाए गए पर्वत के रूप में चिह्नित है। इस दिन वल्लभ संप्रदाय, स्वामीनारायण संप्रदाय और चैतन्य के गौड़िया संप्रदाय द्वारा विभिन्न रूपों में उत्सव मनाएं जाते हैं।

पाँचवा दिन – भाई दूज, भातृ द्वितीया, यम द्वितीया, दिव्वेला पंडुगा

दिवाली के त्यौहार के 5 वें दिन का उत्सव भाई और बहनों के बीच प्रेम और बंधन को चिह्नित करके मनाया जाता है, यह त्यौहार रक्षाबंधन के समान है, लेकिन भाई दूज का त्यौहार, रक्षाबंधन से काफी समय बाद आता है। यह दिन हमारी लड़कियों और महिलाओं के लिए काफी महत्व रखता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान यम और उनकी बहन यमुना भगवान सूर्य की ही संतान हैं। इस दिन, मृत्यु के देवता – भगवान यम, जिसे धर्मराज भी कहा जाता है, यमुना नदी में स्नान करने के बाद अपनी बहन यमुना से मुलाकात करते हैं। धर्मराज यमुना से इसलिए मिलने आते हैं, ताकि यमुना के मन से अपनी मृत्यु का भय दूर हो जाए।

खुशी और संबंधों का त्यौहार दीवाली

दिवाली या दीपावली का स्वरूप उत्सव की तरह होने के बावजूद भी यह आनंद, खुशी और भाईचारे का एक राष्ट्रीय त्यौहार है। यह वह समय होता है, जब परिवार के लोग एक दूसरे का हाल-चाल लेने के साथ-साथ जश्न मनाने के लिए एकत्र होते हैं।

दीवाली का त्यौहार और उत्सव, दोनों रूपों में विकास हुआ है।  युवाओं को इस त्यौहार का भलीभाँति उपयोग करने के लिए, सभी समुदायों को एकीकृत करना और उत्सव में भाग लेने के लिए सभी को शामिल करने का प्रयास करना उचित होगा। ठीक ऐसा ही तब करना चाहिए, जब किसी दूसरे समुदाय के लोग त्यौहारों का जश्न मनाते हों और अपनी सोच को सकारात्मक तरीके से बदलना चाहिए। ऐसा तब हो सकता है जब भारत वास्तव में सर्वता और धर्मनिरपेक्षता की भावना का दावा करने में सक्षम हो जाएगा। दिवाली की शुभकामनाएं।

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