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पुरुष यौन शोषण और भारत

August 11, 2018
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पुरुष यौन शोषण और भारत

अगस्त 2018 में, एक नाबालिग ने अपने 3 स्कूली साथियों पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया और बाद में उन्हें यौन अपराध अधिनियम (पीओसीएसओ), 2012 के तहत बच्चों के संरक्षण के लिए दोषी ठहराया गया। पीड़ित कक्षा 4 का एक छात्र था, जबकि अपराधी कक्षा 7, 8 और 10 के छात्र थे। हालांकि यह मामला अदालत तक पहुँचने में कामयाब रहा, लेकिन ऐसे कई अन्य मामले हैं जिन पर ध्यान नहीं दिया जाता है। इसका कारण यह है कि अक्सर सामाजिक कलंक के डर से कानूनी कार्यवाही में बाधा उत्पन्न करते हैं।

इससे पहले फरवरी 2018 में, सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार, यौन हमले, पीछा करना आदि लिंग निरपेक्ष सम्बन्धित कानून बनाने की याचिका को खारिज कर दिया था। न्याय की अदालत ने आगे कहा कि यह एक “काल्पनिक स्थिति” थी और संसद सामाजिक जरूरतों के मुताबिक इसका सामना कर सकती है। इस बर्खास्तगी ने महिला अपराधियों के लिए कानून के तहत दंडित करने वाले सभी दरवाजों को बंद कर दिया।

पुरुष यौन शोषण पर भारतीय कानून

यौन अपराध अधिनियम (पीओसीएसओ) बच्चों के खिलाफ यहाँ तक की उनके लिंग से सम्बन्धित अपराधों के अधिकतर समझौते करता है, लेकिन हमारे बलात्कार कानूनों के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है। भारतीय संविधान की धारा 375, बलात्कार को परिभाषित करती है कि –

“एक आदमी को तब ” बलात्कारी “कहा जाता है जब वह: – (ए) योनि, मुँह, मूत्रमार्ग या एक महिला के गुदा में प्रवेश कराता है या उसे ऐसा करने के लिए मजबूर करता है …”

चूंकि संविधान ने “बलात्कार” को परिभाषित किया है, ध्यान दें कि इस प्रक्रिया में, सूक्ष्म संदर्भ में इन दो बातों को स्पष्ट किया गया है कि:

  • एक बलात्कार अपराधी निश्चित रुप से एक पुरुष होता है।
  • बलात्कार पीड़िता निश्चित रुप से एक महिला होती है।

आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2013, ने भारतीय दंड संहिता, अर्थात् – एसिड हमलों, यौन उत्पीड़न, पीछा करना आदि में नए अपराधों को शामिल किया। जबकि एसिड हमले (और प्रयास) लिंग निरपेक्ष थे और यौन उत्पीड़न, ताक झांक और पीछा करना आदि के खिलाफ सुरक्षा विशेष रूप से महिलाओं के लिए आरक्षित थी। कानून के तहत वैवाहिक बलात्कार को शामिल करने में नाकाम रहे संशोधन की भी लिंग-पक्षपातपूर्ण होने के लिए गंभीर रूप से निन्दा की गई है।

पीड़ित पुरुषों के लिए अब किसी तरह के न्याय पाने का एकमात्र मार्ग विवादास्पद धारा 377 के माध्यम से है। हालांकि, इसके अनावश्यक परिभाषाओं के साथ धारा यौन शोषण के पीड़ित पुरुषों को राहत प्रदान करने के बजाय व्यक्तिगत स्वतंत्रता अधिकारों में बाधा डालती है।

जमीनी वास्तविकता

2007 में हुए भारत सरकार के एक अध्ययन के अनुसार, 53.2% बच्चों ने अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार यौन शोषण का शिकार होने की जानकारी दी। इनमें से 52.9% लड़के थे। एक सामाजिक कार्यकर्ता इंसिया दरीवाला ने 160 पुरुषों के साथ एक ऑनलाइन सर्वेक्षण आयोजित किया। इनमें से 71% ने स्वीकार किया कि जब वे बच्चे थे, तब उनका यौन शोषण किया गया था। इसके अलावा, इन पुरुषों में से 84.9% ने कभी भी किसी को, यहां तक कि जो लोग उनके सबसे करीबी थे, उन्हें भी अपने साथ हुए शोषण के बारे में नहीं बताया था। इसके पीछे के कारण अलग-अलग हैं जैसे कि शर्म, घबराहट और यहाँ तक की ऐसा अपराध को लेकर डर भी।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, यौन शोषण से पीड़ित पुरुषों को भी महिलाओं के समान ही अपार पीड़ा और मानसिक आघात के साथ-साथ समाज द्वारा उनका मजाक बनाए जाने के भय का सामना करना पड़ता है। इससे बाद में उनके जीवन में, क्रोध और अलगाव में वृद्धि के लक्षण देखे जाने की संभावना बनी रहती है। ऐसे कई मामलों में, पीड़ितों को यह सोचते हुए मनोवैज्ञानिक सहायता के लिए नहीं ले जाया जाता कि वे उचित समय आने पर इसे प्राप्त कर लेंगे।

भारतीय समाज

हमारे समाज में, जो कि स्वाभाविक रूप से पितृसत्तात्मक है, पुरुषों को अक्सर उनके घरों का “संरक्षक और प्रदाता” माना जाता है। हालांकि यह अपने आप ही महिलाओं को दूसरे दर्जे पर पहुँचाते है, लेकिन यही चीज पुरुषों के लिए घातक भी साबित होती है। लड़कों को बचपन से ही यह बोला जाता है कि “मर्द बनो” और ” न कि लड़कियों की तरह रोओ”। अंतिम परिणाम यह होता है कि यदि कोई जवान लड़का या वयस्क व्यक्ति किसी भी तरह के यौन शोषण से पीड़ित होता है, तो उसकी मर्दानगी शायद ही कभी उसे इसके बारे में बात करने की अनुमति दे। जब ऐसे में कोई पीड़ित पुरुष आगे आता है, तो उसका अक्सर यौन के बारे में अभद्र प्रश्न पूछकर मजाक उड़ाया जाता है।

इंडियन जर्नल ऑफ साइकेक्ट्री (मनोचिकित्सा के भारतीय जर्नल) ने 2015 में एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें यौन शोषण के बाल पीड़ितों के बारे में उल्लेख किया गया था। लेख में 9 वर्षीय लड़के के पिता का जिक्र किया गया, जिस पर यह कहते हुए बलात्कार किया गया था कि “वह न तो अपना कौमार्य (हैमेन) खो देगा और न ही वह गर्भवती हो जाएगा। उसे एक मर्द की तरह व्यवहार करना चाहिए, न कि एक डरपोक की तरह”।  पिता ने इसी तरह के कारण बताते हुए अपने बेटे के लिए मनोवैज्ञानिक देखभाल का विरोध किया। मुंबई के एक अन्य पिता, जिनके बेटे ने यौन उत्पीड़न के बाद खुद को मार डाला, ने स्वीकार किया कि उनके बेटे ने कभी अपराध की सूचना उन्हें नहीं दी, नहीं तो उनका बेटा अपने जीवन को समाप्त करने का फैसला कभी नहीं करता।

निष्कर्ष

यह स्पष्ट है कि हमें समाज के रूप में हमारे विचारों को पुन: व्यवस्थित करने और उन सभी पितृसत्तात्मक अधिकारों को दूर करने की आवश्यकता है, जो हमें सिखाए गए हैं। यौन शोषण यौन शोषण है चाहे लड़के का हो या लड़की का। यौन शोषण का शिकार होने से कोई व्यक्ति “किसी भी आदमी से कम” नहीं हो जाता है। पुरुष बलात्कार पीड़ितों की चुप्पी धीरे-धीरे टूटने के साथ-साथ, सामाजिक प्रथा को छोड़ने में सभी को अपनी भूमिका निभानी चाहिए। सहानुभूति और समझ हमेशा लिंग निरपेक्ष होना चाहिए।

 

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पुरुष यौन शोषण और भारत
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सुप्रीम कोर्ट ने हमारे बलात्कार कानूनों को लिंग निरपेक्ष बनाने वाली याचिका को खारिज कर दिया है, यह समय है कि हम अपने आधारभूत मान्यताओं पर पुनर्विचार करें।