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कैदियों के अधिकार या मानवाधिकार?

August 4, 2018
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कैदियों के अधिकार या मानवाधिकार?

Prisoner’s rights or human rights?

कथित तौर पर मिली जानकारी के अनुसार, 1981 में, बिहार की जेल में पुलिस अधिकारियों द्वारा संदिग्ध अपराधियों को सुइयों से और एसिड डालकर अन्धा कर दिया गया था। यह मामला, खात्री बनाम बिहार राज्य का है और अब इसे भागलपुर ब्लाइंडिंग केस के रूप में भी जाना जाता है।

2015 में, निर्भया मामले में एक नाबालिक बलात्कारी स्वतंत्र व्यक्ति के रूप बाल सुधार गृह से बाहर आ गया। जबकि, जब यह अपराध किया गया था उस समय वह नाबालिक 18 साल से कुछ महीने ही कम था और फिर भी, उसे 3 साल तक बाल सुधार गृह में रखा गया था, जबकि अन्य को मौत की सजा दे दी गई थी।

यदि हम इन दो मामलों (केश) को देखते हैं, तो हमारी नैतिकता या हमारे सिद्धान्त एक दुविधा में उलझ जाते हैं। इन मामलों में पहला मांमला (केश) हमें कैदियों की सुरक्षा के बारे में और दूसरा उनके विशेषाधिकारों के बारे में विचार करने पर विवश करता है। चूंकि भारत में कैदियों के पुनर्वासन और उपचार के बारे में बहस चल रही है तो आइए इसकी वर्तमान स्थितियों को देखें।

भारतीय जेल

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार सुविदित रूप से कहा था कि “एक राष्ट्र की सभ्यता की गुणवत्ता को बड़े पैमाने पर आपराधिक कानून के प्रवर्तन में उपयोग की जाने वाली विधियों के द्वारा भी मापा जा सकता है”। इसलिए, हम अपने अपराधियों से कैसा व्यवहार करते हैं यह हमारे देश का प्रतिबिंब बन जाता है। इस संबंध में, जेलों को अक्सर कैदियों के स्वभाव को बदलने वाली या कैदियों में परिवर्तन कराने वाली एक जगह माना जाता है, ताकि एक दिन जब वे असली दुनिया में बाहर निकल कर आएं, तो वे अच्छे नागरिकों के रूप में परिवर्तित हो जाएं। हालांकि, यह वह सच है जो प्रतिदिन हमारी जेल की दीवारों के भीतर चल रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जेलों के भीतर कदियों की अधिक भीड़भाड़ को मानवाधिकारों का उल्लंघन घोषित कर दिया गया है। इसके बावजूद भारत में कई जेलें ऐसी हैं जो लगभग 100% की क्षमता से अधिक और कई अपनी 150% की क्षमता से अधिक भरी हुई हैं। गृह मंत्रालय के अनुसार, 2014 में कैदियों की अधिकता के कारण लगभग 1700 कैदियों की जेलों में ही मृत्यु हो गई थी। इनमें से 89% मौतें प्राकृतिक कारणों से हुईं थीं, जिसमें जेलों में स्वास्थ्य देखभाल के बारे में भी बहुत सवाल उठा गए थे। 2011 से 2014 तक, ओडिशा जेलों में अप्राकृतिक मौतों में 1,367% की वृद्धि दर्ज की गई है। महिला अपराधियों को अक्सर सैनिटरी नैपकिन जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं दी जाती हैं।

जेलों में देखभाल की कमी, हमारे न्यायिक तंत्र की वो दरारें हैं जो कि रिस रही हैं। भारतीय संदर्भ में हिरासत में उत्पीड़न (जेल में दिया जाने वाला उत्पीड़न) अनसुना नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था के आंकड़ों के मुताबिक, 2010 से 2015 के बीच पुलिस हिरासत में कम से कम 591 लोगों की मृत्यु हुई थी। इस लिए अब भारतीय कानून ने कानूनी प्रवर्तन प्रक्रिया के लिए उचित रुपरेखा निर्धारित कर दी है, जिसमें गिरफ्तार लोगों के इलाज और उनसे पूछताछ की प्रकिया अपनाई जा रही है। हालांकि, यह अपराध स्वीकरण या जानकारी प्राप्त करने की प्रक्रिया अक्सर अनैतिक होती है, यहां तक कि कई मामलों में ये मौतों का कारण भी बन जाती है। अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था द्वारा किए गए विश्लेषणों के अनुसार प्राप्त शवों पर मिले चोटों के निशान संभावित रूप से यातना के समय पहुंचाये गए आघातों की तरफ संकेत देते हैं।

विचाराधीन कैदी और पुनर्वास

कानूनी तौर पर, विचाराधीन कैदी होने का मतलब है कि आप अभी तकपूर्ण रूप से दोषी नहीं ठहराए गए हैं। हालांकि, हमारे मुकदमे की धीमी प्रक्रिया के कारण, संदिग्ध अपराधियों को दोषी घोषित करने से पहले भी वर्षों तक जेल में रहना पड़ता है। 31 मार्च, 2016 तक, हर तीन कैदियों में से दो विचाराधीन कैदी रहे हैं। कुछ मामलों में, वे जेल में उन अपराधों की सजा भी काटते हैं जिनका सिर्फ उन पर आरोप ही लगाया जाता है। इस प्रकार के दोषियों की एक बड़ी संख्या भी जमानती अपराधों की श्रेणी में आती है।

जबकि तिहाड़ जेल की तरह ये जेलें भी कैदियों की पुनर्वास और भर्ती पर ध्यान केंद्रित करने वाली पहल कर रही हैं, जो काफी हद तक कई लोगों के लिए सुविधाजनक है। उदाहरण के लिए, नशे की लत वाले कई दोषियों को बिना किसी लक्ष्य और पुनर्वास के बिना जेलों में रखा जाता है। इससे हताश होकर उनमें से कई लोग आत्महत्या करने का प्रयास करते हैं और कई लोग इसमें सफल भी हो जाते हैं। जेल के अंदर आत्महत्या की कोशिश के आंकड़े बाहर की तुलना में लगभग दोगुने हैं। इनमें से एक बड़ा वर्ग पहली बार का दोषी होता है, जो पहले से ही जेल से छूटने की आशा खो रहा होता है।

नैतिक दुविधा

वर्तमान में हुए निर्भया केश का एक व्यक्ति दक्षिण भारत में एक रसोइया के रूप में काम करता है। उसकी पहचान स्पष्ट सुरक्षा कारणों से सुरक्षित रहती है। अपराध के ब्योरे से पता चला है कि वह गैंगरेप में सबसे क्रूर हमलावरों में से एक था, जिसने आज तक पश्चाताप का कोई संकेत नहीं दिखाया। इस तरह की घटनाएँ हमें न्यायिक प्रतिष्ठान में हमारे विश्वास पर पुनर्विचार करने के लिए विवश करती हैं। ऐसे अपराधियों के पुनर्वास के लिए जमानत और काम करना कितना सही है? लेकिन फिर, दूसरी ओर, हमारे पास स्वीकार्य समय सीमा से बाहर छोटे अपराधो के लिए जेलों में सजा काट रहे अनगिनत कैदी हैं। उनमें से ज्यादातर को मुफ्त कानूनी सहायता प्राप्त करने के उनके अधिकार के बारे में भी पता नहीं है|

कहने की जरूरत नहीं है कि जुर्माने की सीमा के परे कुछ अपराध इतने गंभीर हैं जिसमें रिहाई अप्रयुक्त हो जाती है। लेकिन इस बीच, कोई भी हमारी जेल प्रणाली में सुधार की सख्त जरूरत की अवहेलना नहीं कर सकता है। विकलांगों, या मानसिक विकार वाले लोगों के लिए कोई प्रावधान नहीं है। मनोवैज्ञानिक सहायता कैदियों के लिए एक बहुत दूर की बात है, जिससे कई लोग अनिवार्य रूप से मानसिक विकार से ग्रस्त हो जाते हैं। इसलिए, जब हम किसी व्यक्ति के पुनर्वास के लिए बहस करते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जो लोग अपराध करते हैं, वे पुनर्वास प्राप्त करने के लायक हैं।

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कैदी के अधिकार और मानव अधिकार
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भारतीय जेलों की स्थिति पर एक संक्षिप्त नजर डालें, और कैदी के पुनर्वास की पुरानी विवाद की समीक्षा करें।