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गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम : एक ड्रैकोनियन कानून?

September 6, 2018
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गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम: एक ड्रैकोनियन कानून?

गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम: एक ड्रैकोनियन कानून?

28 अगस्त, 2018 को, देश भर से पांच लोगों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था। गिरफ्तार हुए इन पांच लोगों में – वकील सुधा भारद्वाज, प्रसिद्ध तमिल कवि वरवरा राव, कार्यकर्ता अरुण फेरेरा, गौतम नवलाखा और वर्नन गोंजाल्वेस थे। 2010 में, सिविल लिबर्टीज फॉर पीपुल्स यूनियन के उपाध्यक्ष बिनायक सेन को गिरफ्तार किया गया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, हालांकि बाद में सर्वोच्च न्यायलय द्वारा जमानत दे दी गई।

ऐसा क्या एक मामला है जिसमें वे सभी समान हैं? हालांकि आज तक दोषी पाए गए कुल लोगों की सूची में कई अन्य नाम हैं, यहां उल्लिखित ग्यारह लोगों के मामलों को गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के तहत रखा गया था। तो, यह अधिनियम क्या है जो हमारे अखबार की सुर्खियों पर छाया है और अधिकतर लोग इसकी आलोचना क्यों कर रहे हैं?

गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए), 1967 क्या है?

यूएपीए, 1967 एक भारतीय कानून है, जिसका उद्देश्य देश के अंदर गैरकानूनी गतिविधियों और संगठनों को लक्षित करना है। यह कानून कुछ संवैधानिक अधिकारों पर ‘उचित’ प्रतिबंध लगाता है, जैसे कि:

1) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,

2) शांतिपूर्वक और हथियारों के बिना एकत्र होने का अधिकार; तथा

3) एसोसिएशन या यूनियन बनाने का अधिकार।

जब इसे पहली बार समर्थन के साथ पेश किया गया था, तो इसका उद्देश्य भारत से अलगाव मांगने वाले किसी भी संगठन की गतिविधियों को रोकने के लिए प्रावधान करना था और उसे गैरकानूनी मानना था। परिणामत:, यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भारत के सबसे महत्वपूर्ण कानूनों में से एक बन गया। तब से इस कानून में कई अवसरों पर संशोधन किया गया है।

2004 में किए गए एक संशोधन ने आतंकवाद अधिनियम (पोटा), 2002 से कई प्रावधानों को शामिल किया। संसद से उपरोक्त कानून को कई अपीलों के बाद उसी स्थान पर वापस ले लिया गया था। यह वही कानून है जिसके तहत देश में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।

यूएपीए की आलोचना क्यों की जाती है?

भारतीय संविधान की धारा 124 ए की तरह, राजद्रोह, यूएपीए, 1967 से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर अपनी अस्पष्ट परिभाषाओं के बावजूद न्याय के तहत रखा जाता है जो कि न्यायपालिका के लिए खतरा बन सकता है। प्रभावी शक्ति की एक अन्य आलोचना उन लोगों को इसे हस्तांतरित करना है जो सभी संभवत: इसका दुरुपयोग कर सकते हैं।

जब केरल के एक प्रसिद्ध ब्लॉगर जैसन सी कूपर को उनके कार्यस्थल से उठाया गया और पुलिस हिरासत में रखा गया, तो उनके खिलाफ आरोपों ने विरोध की कई आवाजें उठाईं। उनके लिए कहा जाता था कि वह “माओवादी विचारधारा का प्रसार” कर रहा था और उनके खिलाफ मिला सबूत “प्रो – माओवादी” साहित्य उनके घर से जब्त किया गया था। जिस अधिनियम के तहत उन पर आरोप लगाया गया था, वह प्रसिद्ध यूएपीए, 1967 था। इस घटना की निंदा करते हुए अरुण फेरेरा और वेरनॉन गोंसाल्वेस ने लिखा था कि “यूएपीए प्रावधान विचारों को अपराधी बनाते हैं”। दोनों गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के खिलाफ अपने मजबूत मूद्दे के लिए जाने जाते हैं। विडंबना यह है कि यह वही कानून था जिसके तहत अगस्त, 2018 में उन दोनों पर आरोप लगाया गया था।

जब अधिनियम पेश किया गया था, तो यह “भारत की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा” के लिए था। हालांकि, हाल के वर्षों में इस कानून के खिलाफ उठे प्रश्नों में तेजी देखी गई है, कई लोग इसे खुले तौर पर ड्रैकोनियन और देश के आंतरिक मूल्यों के लिए खतरा कहते हैं। “गैरकानूनी संगठन”, “गैरकानूनी गतिविधि” जैसे शब्द इतने अस्पष्ट हैं कि लगभग किसी भी संगठन को अवैध घोषित करना संभव है।

कानून का दुरुपयोग

2011 में, जब विनायक सेन के मामले की सुनवाई अभी चल ही रही थी, कि तभी 12 देशों के 40 नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने एक याचिका पर हस्ताक्षर करते हुए, मांग की कि सेन को तुरंत जमानत पर रिहा कर दिया जाए। जब उन पर आरोप लगाया गया और उनके “माओवादी लिंक” के लिए दोषी ठहराया गया था, तो उनके खिलाफ एकमात्र साक्ष्य हस्ताक्षर किए गए पत्र थे जो प्रदर्शित करता है कि उनका प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) के साथ सीधा पत्राचार था।

कई अवसरों पर, गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, के तहत लोगों पर आरोप लगाए गए और बाद में उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया। इंस्टीट्यूट फॉर कॉनफ्लिक्ट मैनेजमेंट के कार्यकारी निदेशक अजय साहनी ने इसे “परीक्षण द्वारा सजा” कहा है। दूसरे शब्दों में, भले ही सभी आरोप झूठे हों और खारिज कर दिए गए हों और न्याय तक पहुंचने की प्रक्रिया धीमी और परेशानी भरी हो, जो भी हो यह हमारी न्यायिक प्रणाली में स्पष्टता की कमी है।

इस कानून के खिलाफ प्रायः एक प्रमुख तर्क यह है कि, यदि यह सबसे विशिष्ट मामलों में लागू होता है जहां इसकी वास्तव में आवश्यकता होती है, तो इसका एक समापक खंड होना चाहिए जैसा कि पोटा जैसे अन्य कानूनों के मामले में था। एक समापक खंड का मूल अर्थ है कि जब कानून में उल्लिखित खतरे की आवश्यक गिरावट देखी जाए, तो उस कानून की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके अलावा, अगर कानून वास्तव में बना रहता है और हटाया नहीं जाता है, तो निश्चित रूप से इसमें शामिल अस्पष्टता को दूर करने के लिए प्रगतिशील संशोधन लाना चाहिए।

गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 में बिना किसी आरोपपत्र के 180 दिनों तक नजरबंद और 30 दिनों तक पुलिस हिरासत में रखने के प्रावधान हैं। इसके अलावा, इसमें सवाल से बचने के लिए एक अग्रिम जमानत का प्रावधान है। इस प्रकार, जब एक कानून इतना शक्तिशाली होता है जितना कि यह है जिसे देश के संविधान में बरकरार रखा जाता है, जिसके पास भाषण की आजादी जैसी बुनियादी स्वतंत्रताओं को प्रतिबंध करने की शक्तियां हैं, तो यह ध्यान रखना चाहिए कि इसका दुरुपयोग न किया जाए।

सर्वोच्च न्यायलय की तरह हाल ही में कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के जवाब में कहा गया, कि “असहमति लोकतंत्र में सेफ्टी वाल्व है”।

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यूएपीए, 1967 ने एक बार फिर देश भर से पांच कार्यकर्ताओं की हालिया गिरफ्तारी के साथ ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। आइए इस कानून पर नजर डालें, और अधिकतर उठाए गए प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास करें। क्या अधिनियम वास्तव में ड्रैकोनियन है या नहीं?