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लोकसभा चुनाव 2019 – कौन हैं दिग्गज?

January 22, 2019


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लोकसभा चुनाव 2019 – कौन हैं दिग्गज?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा 19 जनवरी को कोलकाता में यूनाइटेड इंडिया रैली का आयोजन किया गया था। इस रैली को लोकसभा चुनाव के पूर्व भाजपा के खिलाफ एकजुट विपक्ष की रणभेरी के रूप में देखा जा रहा है। हालाँकि, 2019 लोकसभा में आखिरी जीत हासिल करने के लिए कई दावेदार प्रयासरत हैं। पीएम की कुर्सी पर कई लोगों की नजरें टिकी हुई हैं लेकिन अब देखना यह है कि यह किसके हाथ लगती है? आइये सबसे पहले तो हम इस सीजन में इस राजनीतिक खेल में होने वाले बदलावों पर एक नजर डालते हैं।

राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए)

देश में सत्तारूढ़ गठबंधन, एनडीए लोकसभा 2019 में फिर से जीतने की उम्मीद लगाए बैठी है। हाल ही में तीन प्रमुख हिंदी भाषी राज्यों में कांग्रेस से करारी हार के बावजूद भाजपा को देश में अभी भी अच्छी लोकप्रियता हासिल है। लेकिन सवाल ये है कि क्या इतना ही काफ़ी होगा भाजपा  की अगुवाई वाली एऩडीए को दोबारा बहुमत हासिल करने के लिए।

इंडिया टीवी और सीएनएक्स के लेटेस्ट ओपिनियन पोल के अनुसार, एनडीए शीर्ष पर है लेकिन इसके बावजूद भी अगले लोकसभा चुनाव में इसको बहुमत से 15 सीटों पीछे रह जाना पड़ सकता है। इस सर्वेक्षण में एनडीए के लिए 257 सीटों की भविष्यवाणी करते हुए यूपीए (सपा और बसपा को छोड़कर) के लिए कुल 146 सीटों की बात कही गई। भारतीय जनता पार्टी अब गठबंधन को आखिरी रूप देने में लगी हुई है। उदाहरण के लिए, बिहार में जनता दल (यूनाइटेड) 40 सीटों में से 34 सीटों पर भाजपा के साथ साझा करेगी। इस समय जदयू बिहार की सत्ता में है।

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए)

2014 लोकसभा चुनावों के बाद से ऐसा लग रहा है था कि कांग्रेस और यूपीए दोनों के लिए ही आगे का रास्ता बंद हो गया था। कांग्रेस ने अपना वोट बैंक खो दिया था, यूपीए लोकसभा की 543 सीटों में केवल 60 पर ही अपना कब्जा जमा पाई थी। हालाँकि, कांग्रेस ने देश में धीरे-धीरे वापसी की है, तीन हिंदी भाषी राज्यों में इसकी जीत इस बात का जीता जागता उदाहरण है।

दिसंबर 2018 में हुए राज्य विधानसभा चुनावों में हालांकि मिजोरम कांग्रेस के हाथ से निकल गया था, लेकिन छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान को भाजपा के हाथ से छीनने में कांग्रेस कामयाब रही थी। हालांकि, अभी भी रास्ते में कुछ रोड़े हैं। सपा और बसपा ने राजस्थान और मध्यप्रदेश में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को समर्थन दिया था, लेकिन उत्तर प्रदेश में इस जोड़ी ने राष्ट्रीय पार्टी से अपना गठबंधन तोड़ दिया है। खबरों के अनुसार, लोकसभा चुनाव के लिए यादव और मायावती ने अमेठी और रायबरेली की सीटों को कांग्रेस के लिए छोड़ दिया है, लेकिन इसे मुख्य सीट-साझाकरण समीकरण में शामिल नहीं किया है। अब, यह यूपीए के लिए एक मुश्किल स्थिति होगी। यदि यह यूपी की शेष सीटों से चुनाव नहीं लड़ता है, तो संभवतः सबसे महत्वपूर्ण राज्य में संभावित पकड़ और अपने वोट बैंक को खो देगा। दूसरी तरफ, अगर यह इन क्षेत्रों से चुनाव लड़ता है, तो इससे चुनाव के बाद बसपा और सपा से किसी भी तरह के समर्थन की उम्मीदें खत्म हो जाएंगी।

अखिलेश यादव-मायावती (सपा-बसपा गठबंधन)

कांग्रेस को अपने गठबंधन के समीकरण से बाहर रखने के बाद इस जोड़ी ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस बार के राष्ट्रीय चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। उत्तर प्रदेश (यूपी) राज्य को लोकसभा के महासंग्राम का केंद्र माना जाता है। और, वास्तव में यह सौ टका सही है। 80 सीटों के साथ, यूपी निचले सदन का सबसे बड़ा हिस्सा है। समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) दोनों को इस उत्तरी राज्य में अच्छी खासी लोकप्रियता हासिल है। यही नहीं, मुख्यमंत्री के रूप में मायावती चार बार सत्ता मे रह चुकी हैं, जबकि अखिलेश यादव का कार्यकाल एक बार का रहा है।

यूपी में उनका आधार मजबूत है, जो सत्तारूढ़ पार्टी के लिए चिंता का विषय होगा। इन क्षेत्रीय पार्टियों ने अपने पुराने विवादों और मतभेदों को दरकिनार करते हुए, लोकसभा चुनाव के लिए हाथ मिलाने का फैसला किया है। कांग्रेस को दरकिनार करते हुए उनके पास सीट साझा करने में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) भी है।

कलवकुंतला चंद्रशेखर राव (केसीआर)

भावी गठबंधन के लिए पहले से ही भाजपा को खारिज करने के बाद, केसीआर के नेतृत्व वाले तेलंगाना राष्ट्र समिति ने लोकसभा के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त करना शुरू कर दिया है। इसका उद्देश्य “गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस” गठबंधन बनाना है। राज्य विधानसभा चुनावों में प्रभावशाली जीत के बाद, केसीआर ने देश के राजनीतिक दौरे की शुरुआत करते हुए, लक्ष्य पर अपनी नजरें गड़ा दी हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री पहले ही तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एवं ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से मिल चुके हैं। राव के बेटे केटी रामाराव ने हाल ही में वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश में विपक्ष के नेता वाईएस जगन मोहन रेड्डी से मुलाकात की। केसीआर को पहले ही एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का समर्थन प्राप्त है।

अखिलेश यादव और मायावती की कुछ आशंकाएं हैं इस वजह से इनके साथ  केसीआर की मुलाकात को लेकर अनिश्चितता रही है। हालांकि, तेलंगाना के मुख्यमंत्री को दक्षिण के साथ-साथ देश के बाकी हिस्सों में भी अच्छी-खासी लोकप्रियता हासिल है।

ममता बनर्जी (एआईटीसी)

तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी या जैसा कि वे दीदी के रूप में लोकप्रिय हैं, के पास पश्चिम बंगाल में उनके वफादार अनुयायियों की एक बड़ी संख्या है। राष्ट्रीय स्तर पर उनकी लोकप्रियता इस हद तक है कि कई लोग उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए “मोदी बनाम राहुल” लड़ाई में तीसरे विकल्प के रूप में देखते हैं।

ममता बनर्जी द्वारा आयोजित यूनाइटेड इंडिया रैली में 23 विपक्षी दलों के राष्ट्रीय नेता एक साथ इकट्ठा हुए थे और मोदी सरकार के खिलाफ साझा मोर्चे की घोषणा की गयी। यद्यपि कांग्रेस प्रमुख खुद मौजूद नहीं थे, राहुल गांधी ने अपना लिखित समर्थन, साथ ही कांग्रेस के दो प्रमुख नेताओं – मल्लिकार्जुन खड़गे और अभिषेक मनु सिंघवी – को रैली का हिस्सा बनने के लिए भेजा। रैली में शामिल अन्य नामी नेताओं में फारूक अब्दुल्ला (नेशनल कॉन्फ्रेंस), शरद पवार (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी), एम के स्टालिन (डीएमके पार्टी) आदि शामिल थे।

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव के दिन नजदीक आ रहे हैं, हमारे राजनीतिक खेल के मैदान में गरमागरमी और तनाव का स्तर दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। जहाँ  राष्ट्रीय दल चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाएंगे, वहीं क्षेत्रीय क्षत्रपों को कम आंकना एक भूल होगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बार एनडीए और यूपीए में से किसी के हाथ सत्ता आती है, या फिर एक नया गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस मोर्चा उभरकर सत्ता हासिल कर पाता है।

आपके अनुसार से इसका परिदृश्य कैसा होगा? नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी राय लिखकर हमसे साझा करिए !

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लोकसभा चुनाव 2019 – कौन हैं दिग्गज?
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लोकसभा चुनाव नजदीक है इसलिए व्यक्तिगत वर्चस्व स्थापित करने के प्रयास हर तरफ से शुरू हो गए हैं। जानना चाहते हैं कि गेम चेंजर कौन साबित होंगे? तो इस लेख को पढ़िए।