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भारत में प्लास्टिक प्रदूषण को कहें ना

July 3, 2018
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भारत की प्लास्टिक प्रदूषण को ना

 

प्रस्तावना 

2018 विश्व पर्यावरण दिवस, भारत के लिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इस बार वैश्विक मेजबान भारत था और साथ ही भारत उन राष्ट्रों के गुट में शामिल हो गया जो इस गौरवपूर्ण आयोजन की मेंजबानी कर चुके हैं|

विश्व पर्यावरण दिवस की थीम “बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन” थी, इस अवसर पर भारत 2022 तक सिंगल यूज प्लास्टिक के इस्तेमाल को समाप्त करने की घोषणा की। इस घोषणा से नीति निर्माताओं मशहूर हस्तियों, व्यापारिक पूँजीपति और छोटे उद्यमी, नवप्रवर्तनक, पर्यावरणविद और कार्यकर्ता जैसे लाखों भारतीयों लोगों ने देश भर में प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ द्वारा की गई गतिविधियों को बढ़ावा दिया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिंगल यूज प्लास्टिक के इस्तेमाल को समाप्त करने के लिए वैश्विक आंदोलन की शुरूआत के रूप में विश्व पर्यावरण दिवस की सराहना की है जो देश में तीव्र आर्थिक विकास में सहायता करेगा। डिस्पोजेबल प्लास्टिक के खिलाफ यह असाधारण और महत्वाकांक्षी कार्यवाही है| यह कार्यवाही दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में 130 करोड़ लोगों और व्यवसायों से प्लास्टिक के प्रवाह को काफी हद तक रोक देगी।

प्लास्टिक प्रदूषण पर पैन इण्डिया की पहल

सार्वजनिक स्थलो, राष्ट्रीय संपदाओ, जंगलों और समुद्री तटों पर प्लास्टिक प्रदूषण से लड़ने के लिए पैन इण्डिया द्वारा साफ-सफाई के अभियान आरम्भ किये गये। शुरू की गई इन पहलों में प्लास्टिक और कूड़े मुक्त क्षेत्रों में देश भर के 100 स्मारक भी शामिल हैं। यहां तक कि पर्यटन मंत्रालय ने सार्वजनिक स्थानों पर इकट्ठा होने वाले प्लास्टिक ढेर को समाप्त करने की प्रण लेकर बहुत बड़ा योगदान दिया है।

फिर भी,देश भर के विभिन्न राज्यों द्वारा प्लास्टिक की खपत को कम करने और अपने अधिकार क्षेत्र में मौजूदा अपशिष्ट को नियन्त्रण में रखने के लिये कई विकास के उपायों की शुरूआत की जा चुकी है| अगर ये क्रियाएं सही दिशा में कार्य करती हैं, तो अन्य राज्यों द्वारा भी अपनाई जा सकती हैं।

नगर पालिका, राज्य प्रशासन और आम जनता द्वारा देश भर में अपने स्तर से प्लास्टिक संकट से निपटने के लिए कुछ पहल की है, जिनका विवरण निम्न प्रकार है-

1.केरल में सरकारी कार्यालयों में पुनर्नवीनीकरण का उपयोग

केरल के कई सरकारी कार्यालय भारत को प्लास्टिक मुक्त बनाने के लिए सरकार की “बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन” पहल की दिशा में अपने तरीके से योगदान दे रहे हैं। इन कार्यालयों के कर्मचारियों ने प्लास्टिक के बने सामान जैसे प्लास्टिक की पानी की बोतलें और डिस्पोजेबल से बनी चाय की कप का उपयोग करना छोड़ दिया है और  स्टील कटलरी और स्टील के पेन का उपयोग करना शुरू कर दिया है।

सरकारी कार्यालयों के लिए यह अभियान सुचतवा मिशन और हरित केरल मिशन द्वारा बनाया गया था, जिसका उद्देश्य सरकारी विभागों को स्वच्छ वातावरण का प्रतिरूप बनाना था। पर्यावरण-अनुकूल कार्य के पालन के लिए रास्ता तय करते समय इस अभियान को कॉर्पोरेट और निजी संगठनों में भी आसानी से निहित किया जा सकता है।

2.केरल में जल निकायों से प्लास्टिक कचरे का निकालना

यह वास्तव में अफसोस करनी वाली बात है कि समुद्री जीव प्लास्टिक कचरे को नियंत्रण करने के लिए हमारी उदासीनता और कमजोरी की कीमत चुका रहे हैं। यह बहुत निराशाजनक हो जाता है जब समुद्र के अंदर रहने वाले समुद्री जीवो के मृत शरीर की जाँच करने पर यह बात पता चलती है कि समुद्री जीवो की मृत्यु उनके पेट के अंदर प्लास्टिक कचरा पहुँचने के कारण हुई है।

इस गंभीर परिस्थिति को नियंत्रित करने के लिए, केरल के सुचतवा मिशन ने एक उत्कृष्ट परियोजना शुरू की है| इस योजना में  28 मछुआरों को नंदकारा बंदरगाह से  मछलियों को पकड़ने के आलावा  प्लास्टिक निकायों से प्लास्टिक कचरे को भी निकालने के लिए नियुक्त किया गया है, इन मछुआरों का काम मछली पकड़ने के जाल में फंसे हुए कचरे को या समुद्र पर तैरते हुए कचरा को बाहर निकलना है। सरकार इस मिशन के लागू होने के बाद पिछले 10 महीनों में 25 टन प्लास्टिक कचरे को पुनः प्राप्त करने में कामयाब रही है।

3.सिक्किम में प्लास्टिक के उपयोग पर नियंत्रण

जब प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने की बात आती है तो सिक्किम हमेशा से सबसे आगे रहा है। प्लास्टिक बैग के उपयोग और बिक्री को सीमित करने में इसकी सफलता अन्य राज्यों के लिए एक प्रेरणा है। सिक्किम को प्लास्टिक के उपयोग पर मिली सफलता अनियमित जुर्माना लगाकर  हासिल नहीं हुई है, बल्कि लोगों को प्लास्टिक के कारण होने वाले खतरों से अवगत कराने पर मिली है। 1998 में, यह डिस्पोजेबल प्लास्टिक बैग और सिंगल यूज प्लास्टिककी बोतलों पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला भारतीय राज्य बन गया।

सिक्किम सरकार ने 2016 में दो बड़े फैसले किए थे। पहला फैसला,उन्होंने सरकारी कार्यालयों को अपने परिसर में पैकिंग पेयजल के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के लिए लक्षित किया ताकि डंप गज (कचरे का मैदान) पर अनावश्यक बोझ कम हो सके। दूसरा फैसला,प्लास्टिक प्रदूषण के हानिकारक प्रभाव को कम करने और इसकी बढ़ती कचरा समस्या से निपटने के लिए,पूरे राज्य में स्टायरोफोम और थर्मोकॉल डिस्पोजेबल प्लेट्स और कटलरी (प्लास्टिक के बने चम्मच) की खपत पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया।

2005 से, राज्य पर्यावरण पर प्लास्टिक द्वारा उत्पन्न होने वाले प्रदूषण के बारे में लोगों के बीच जागरूकता फैलाने के लिए महत्वपूर्ण अभियान आयोजित करने में लगा हुआ है। इसी तरह की सफलता की कहानियां नैनीताल और जयपुर से सुनने में आई हैं, जहाँ दुकानदारों ने प्लास्टिक के बजाय चार्ज करने योग्य कपड़े के बैग का उपयोग करना शुरू कर दिया है।

4.सड़क निर्माण के लिए प्लास्टिक का उपयोग

मदुरै में थियागजर कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के प्रोफेसर राजगोपालन वासुदेवन के प्रशंसनीय प्रयासों के कारण, प्लास्टिक का उपयोग सड़क निर्माण में किया जाता है। प्लास्टिक जो प्रतिबंधित है और अपशिष्ट के रूप में मानी जाती है , अब देश भर में विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में प्लास्टिक कचरे का उपयोग किया जा सकता है। भारत में कई राज्य प्लास्टिक कचरे को प्रयोग में लाने के लिये इस अग्रणी तकनीक को लागू करने की योजना बना रहे हैं। केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु राज्यों ने इस अनूठी तकनीक पर काम करन शुरू कर दिया है।

5.बेहतर प्रयोजन के लिए प्लास्टिक रीसाइक्लिंग

एक ही समय में भारत में उत्पन्न प्लास्टिक कचरे की इतनी बड़ी मात्रा का निपटारा करना असंभव काम है। इसका एकमात्र उपयोगी विकल्प यह है कि इस प्लास्टिक कचरे का उपयोग पारिस्थितिक अनुकूल तरीके से किया जाये ताकि देश के डंपिंग ग्राउंड (कचरे का मैदान) पर बोझ कम हो सके। भारत के कई संगठन प्लास्टिक के कारण होने वाले किसी भी हानिकारक प्रभाव से बचने के लिए इसे एक कुशल तरीके से रीसाइक्लिंग कर रहे हैं। प्लास्टिक का उपयोग कपड़ा उद्योग के लिए धागे और कपड़े बनाने, निर्माण सामग्री और कई अन्य बेहतर उद्देश्यों के निर्माण में किया जा रहा है। प्लास्टिक के कचरे का पुन: उपयोग करने में सरकार का हालिया प्रस्ताव “प्लास्टिक के नोट” को पेश करना एक बड़ा कदम है।

6.प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए गुजरात में “अपशिष्ट की सह-प्रसंस्करण” तकनीक को अपनाना

गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सहयोग से गुजरात राज्य सरकार ने प्लास्टिक कचरे की बड़ी मात्रा को उत्पादन करने वाले उद्योगों के साथ”अपशिष्ट की सह-प्रसंस्करण” कीअवधारणा पर उनके साथ मिलकर काम करने का विचार प्रस्तुत किया था। सह-प्रसंस्करण औद्योगिक प्रक्रियाओं में अपशिष्ट सामग्री का उपयोग करने या प्राथमिक ईंधन या कच्चे माल के लिए उन्हें प्रतिस्थापित करने की प्रक्रिया है। वापी में पेपर मिलों ने अपने प्लास्टिक उपज को एकत्र कियाऔर फिर उन्हें सीमेंट भठ्ठी को जलाने के लिए इस्तेमाल किया। सीमेंट उत्पादन में खतरनाक अपशिष्ट का यह सह-प्रसंस्करण इसके निपटारे के लिए पर्यावरण अनुकूल मजबूत विधि है।

जीपीसीबी ने गुजरात पेपर मिल एसोसिएशन और सीमेंट उद्योग के मालिकों के साथ कई बैठकें की हैं, ताकि वे “अपशिष्ट का सह-प्रसंस्करण” कर सकें। उसके बाद,सीमेंट मिलों  की भट्ठी में प्लास्टिक कचरे के इस्तेमाल के लिए एक परीक्षण चलाया गया था, जिसे सीमेंट मिलों में आयोजित किया गया था। परीक्षण की सफलता के बाद, सीमेंट क्षेत्र में कई कंपनियों ने अपनी खाद्य प्रणाली में  बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरे को शामिल किया है।

7.आंध्र प्रदेश राज्य

आंध्र प्रदेश ने पारंपरिक सिंथेटिक रासायनिक कृषि को शून्य-बजट प्राकृतिक खेती में 6 मिलियन खेतों को बदलने के लिए एक स्केल-आउट प्रोग्राम शुरू किया है।

8.पूर्वी दिल्ली स्कूलों में सतत पर्यावरण और पारिस्थितिकी विकास सोसाइटी (सीईईडीएस) द्वारा “बीट प्लास्टिक प्रदूषण”अभियान की शुरुआत

सीईईडीएस ने दिल्ली में छात्रों, बच्चों, शिक्षकों, माता-पिता और समुदायों के बीच सुरक्षित पर्यावरण को बढ़ावा देने के लिए और प्लास्टिक प्रदूषण पर काबू पाने के लिए पूर्व दिल्ली के छह स्कूलों में एक अभियान चालू किया है।

9.केरल के मछुआरों ने सागर से प्लास्टिक निकालकर सड़कों में बदल दिया

केरल के मछुआरे महासागरों में फेंकी गई प्लास्टिक को अपने जाल की मदद से बाहर निकालरहे हैं।उन्होंने कडलममा में कई सरकारी एजेंसियों की मदद से समुद्र-में फेके गएसभी प्लास्टिक के थैले, बोतलें, पुआल इत्यादि को बाहर निकालकर साफ, क्रमबद्ध और संसोधित करने के लिए पहली बार रीसाइक्लिंग सेंटर स्थापित किया है।प्लास्टिक जो टूट गई हो गई हो, घिस गई हो, और उसका पुनर्नवीनीकरण नहीं किया जा सकता है उसे एक कंफेटी (छोटे कटे हुए रंगीन टुकड़े ) में परिवर्तित कर दिया जाता  है और फिर सड़कों के ऊपर उपयोग करने के लिए स्थानीय निर्माताओं को बेच दिया जाता है।

निष्कर्ष

प्लास्टिक के कारण होने वाले खतरों से हमने अपनी आंखें कितनी भी बंद कर ली हों, लेकिन प्लास्टिक प्रदूषण वास्तव में एक वास्तविकता है।  धरती को प्रदूषण से बचाने में  देर हो जाने से पहले त्वरित सहकारी कार्रवाई की आवश्यकता है। पूरी दुनिया प्लास्टिक प्रदूषण से इतनी मुक्त नहीं हो सकती है इसलिए इसे पूरी तरह से छुटकारा पाने में थोड़ा और समय लगेगा।

पर्यावरण पर प्लास्टिक प्रदूषण के प्रभाव को कम करने में किए जाने वाले कार्यों को व्यापक होने की आवश्यकता नहीं है, हर दिन सिर्फ एक ईमानदारी भरा प्रयास  इस विषय में एक बड़ा योगदान देगा।

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भारत की प्लास्टिक प्रदूषण को ना
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प्लास्टिक प्रदूषण पर नियंत्रण करने की आवश्यकता है। आइए भारत को एक प्लास्टिक मुक्त देश बनाने में अपने आप को शामिल करें।