Home / / “बादशाहो” मूवी रिव्यू – बिना किसी कथानक या रहस्य के एक नीरस, साधारण फिल्म

“बादशाहो” मूवी रिव्यू – बिना किसी कथानक या रहस्य के एक नीरस, साधारण फिल्म

September 4, 2017


Please login to rate

 

"बादशाहो" मूवी रिव्यू

कलाकार- अजय देवगन, इमरान हाशमी, इलियाना डी क्रूज़, ईशा गुप्ता, संजय मिश्रा, विद्युत जाम्मवाल, सनी लियोन (अतिथि)

  • निर्देशित – मिलन लूथ्रिया
  • निर्माता – भूषण कुमार, कृष्ण कुमार, मिलन लूथ्रिया
  • लिखित – रजत अरोड़ा
  • बैकग्राउंड स्कोर – जॉन स्टीवर्ट इडुरी
  • छायांकन- सुनीता राडिया
  • संपादित – आरिफ शेख
  • प्रोडक्शन हाउस – टी-सीरीज़, वेरटेक्स मोशन पिक्चर्स
  • अवधि – 2 घंटे 42 मिनट
  • सेंसर रेटिंग – अ / व
  • शैली – पीरियड ड्रामा, हीस्ट, थ्रिलर

यह फिल्म स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का आपातकालीन युग – जब भारत सबसे अंधेरे और विवादास्पद समय को झेल रहा था,उस समय को देखकर बनायी गयी है। इस फिल्म में भारत के सबसे खूबसूरत राजघराना- जयपुर की रानी गायत्री देवी के किरदार को एक नायिका ने बहुत ही अव्यवस्थित तरीके से निभाया है – इस फिल्म में एक सुस्त राजनीतिज्ञ जिसका सादृश्य एक प्रसिद्ध राजनीतिक वंश के जाने-माने घराने का वंशज है, एक छिपे हुए खजाने की कहानी, एक आधुनिक रॉबिन हूड के रूप में देवगन, कजरारी आँखों वाले इमरान हाशमी, संजय मिश्रा का गुणवत्तापूर्ण हास्य किरदार और सनी लियोन का एक आइटम सांग सभी को लुभाता है। यह सच है कि इस फिल्म का संगीत ही फिल्म को सुपर हिट बनाता है, इस साल की निराशाजनक फिल्म “बादशाहो” देखने के लिए तैयार हो जाओ।

कथानक

जब हम इसके कथानक पर नजर डालते हैं, तो अहसास होता है कि फिल्म में ज्यादा कुछ नहीं है। यद्यपि रजत अरोड़ा ने इसके कथानक को जोड़ने का प्रयास बिल्कुल सही किया है। राजस्थान की एक युवा खूबसूरत रानी, गीतांजलि (इलियाना डी क्रूज) एक राजनेता के रूप में अगुवाई करती है। दो वर्ष बाद आपातकाल घोषित कर दिया जाता है और राजनीतिज्ञ फैसला किया जाता है कि रानी को कैद कर लिया जाए, साथ ही सेना को आदेश देते हैं कि महल के छिपे हुए खजाने को यहाँ लेकर आए। रानी अपने खजाने को पुनः प्राप्त करने के लिए अपने पूर्व अंगरक्षक (बाडीगार्ड) भवानी सिंह, अजय देवगन को खजाने की चोरी करने का दबाव डालती है और यह खजाना मेजर सेहर द्वारा दिल्ली तक ले जाया जा रहा होता है। इस खजाने को चोरी करने में साहसी प्लेबॉय देवगन का साथ दलिया (इमरान हाशमी), मास्टर लॉक पिकेट तिकला (संजय मिश्रा), सुंदर चेहरे वाली संजना (ईशा गुप्ता) देती हैं।

दुर्भाग्य से, यहीं पर कथानक समाप्त हो जाता है। बादशाहो में रोमांचक मोड़ का अभाव है और यहाँ तक ​​कि एक अच्छे क्रियान्वयन की झलक की कमी है, जो मुझे सीट से चिपके रहने को मजबूर कर सके। अरोड़ा जी ने बेहद फीकी और सुस्त पटकथा लिखी है, जो वर्ष की सबसे अच्छी लूटपाट से संबंधित नाटक हो सकती थी।

रिव्यू

हम अभी भी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि बादशाहो का कौन सा हिस्सा एक रिव्यू करने के योग्य है। निश्चित रूप से यह बचकानी लाइनें नहीं है, जो समय-समय पर देवगन और उनके साथियों के मुँह से निकलती है, तथ्य यह नहीं है कि मिलन लूथ्रिया पुलिस और सेना के बीच के अंतर को (या शायद अभी भी अनजान) भूल गए हैं, अर्थहीन विस्फोट और “पीड़ादायी” यातानाएँ अनावश्यक रूप से फिल्मायी गई हैं, जबकि निश्चित रूप से तथ्य यह नहीं है कि चारों पर खजाने को चोरी करने का दबाव, कोई भी लालच या अन्य कोई कमजोरी प्रतीत नहीं हो रही है। लूथ्रिया दो प्रमुख मामलों में विफल रहे हैं –

  1. पहला यह कि लूथ्रिया को मालूम होना चाहिए कि अब दर्शक बुद्धिमान बन चुके हैं।
  2. दूसरा यह कि यह फिल्म देखते समय हमारे पास तकिया होना चाहिए जिससे कि फिल्म के बीच में एक झपकी ले सकें।

इस फिल्म में अभिनय के बारे में कहने के लिए बहुत कुछ नहीं है। शुरूआत देवगन से करते हैं, तो उनको ऐसी भूमिकाओं को चुनना शुरू करना चाहिए जहाँ वह अपने स्टंट और मांसपेशियों की शक्ति दिखाने के बजाय अपने अभिनय कौशल को दिखा सकें, हाशमी के पास कुछ करने या कहने को नहीं है, जो एक असफल बदमाश की तरह लग रहे हैं, मिश्रा का हास्य घिसा-पिटा है और गुप्ता एक सुंदर चेहरा मात्र हैं। फिल्म में हाशमी और गुप्ता का रोमांस एक बहुत ही आवश्यक चिंगारी दे सकता था लेकिन बाकी फिल्म की तरह यह कड़ी भी गायब है।

हालांकि एक व्यक्ति श्रेय पाने योग्य है जिसने अपने कार्य को बखूबी निभाया है। सुनीता राडिया के कैमरे ने राजस्थान की खूबसूरती को इतने बेहतरीन ढंग से कैद किया है कि कई सीन आपकी नसों में घुल जाते हैं और फिल्म में लाल-भूरे रंग के रेगिस्तान के दृश्य लगभग देखने योग्य हैं।

ऐसा लगता है कि आरिफ शेख ने एक नई तकनीक विकसित की है, जिसका लक्ष्य किसी भी तरह की कहानी में किसी भी साजिश को जोड़ने के बजाय दर्शकों को चकित करना है।

बादशाहो फिल्म में संगीत का संमिश्रण है। इसमें 9 गीतों की सूची है लेकिन यदि आप ज्यादातर फिल्मों में सो जाते हैं तो आप सारे गाने को छोड़कर सिर्फ एक को याद रख सकते हैं क्योंकि बाकी गाने उबाते हैं। “मेरे रश्के कमर”, जो महान स्वर्गीय नुसरत फतेह अली खान (तनिष्क बागची द्वारा मिश्रित, जो नुसरत फतेह अली खान और राहत फतेह अली खान द्वारा गाया गया है) द्वारा कम्पोज किया गया है, जो सबसे अच्छा और सबसे सुरीला गीत है। इस फिल्म में “पिया मोरे” एक और अच्छा गीत है, जो अंकित तिवारी द्वारा कम्पोज किया गया है और जिसे नीती मोहन एवं मिका सिंह ने गाया है। यद्यपि इस गीत में सनी लियोन आपका ध्यान आकर्षित कर सकती हैं। शेष गाने सिर्फ औसतन हैं।

हमारा फैसला

आप घर पर रहें, एक किताब पढ़ें, एक झपकी ले लें, पैसा दान कर दें, अपने लिए कुछ पॉपकॉर्न बना लें, केबल टीवी पर 1978 की बॉक्स ऑफिस फिल्म शालीमार देख लें- जो कुछ भी आप कर सकते हैं करें, लेकिन बादशाहो फिल्म को देखने का जोखिम न उठाएं। केवल एक रहस्य है जिसे आप जानना चाहेंगे, वह है, “फ़िल्म को बादाशाहो नाम क्यों दिया गया है?”