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भारत में प्रच्छन्न बेरोजगारी

July 13, 2017


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disguised-employment-hindiभारत में बेरोजगारी की स्थिति अत्यधिक निराशाजनक है। हर गुजरते दिन के साथ, हम एक और भयानक समस्या की ओर बढ़ रहे हैं। भारत जैसी एक विकासशील अर्थव्यवस्था को अपनी बड़ी आबादी और बड़े पैमाने पर बेरोजगारी से परिभाषित किया जाता है, इसमें सामाजिक और आर्थिक मुद्दे जैसे कि कुपोषण, गरीबी, दवा और द्रव्यों का सेवन तथा समाज विरोधी और आपराधिक गतिविधियां आदि शामिल हैं।

ऐसे सामाजिक और आर्थिक मुद्दों में कई प्रकार की बेरोजगारी पाई जाती है जिसमें संरचनात्मक, संघर्ष (कंपटीशन) संबंधी और मौसमी बेरोजगारी शामिल है। हालांकि, प्रच्छन्न बेरोजगारी एक ऐसी समस्या है जिस पर नजर रखना और निपटना बहुत ही मुश्किल काम है। इस तरह की बेरोजगारी आधिकारिक बेरोजगारी के रिकॉर्ड में भी नहीं देखी जा सकती है।

आइए देखते हैं कि ‘प्रच्छन्न बेरोजगारी’ वास्तव में है क्या। आम आदमी की भाषा में, यह ऐसी घटना है जिसमें अधिक लोगों को वास्तव में जरूरत से कहीं ज्यादा नियोजित किया जाता है। आमतौर पर, यह विकासशील अर्थव्यवस्थाओं और सघन मजदूर वाली अर्थव्यवस्थाओं में देखा जाता है।

प्रच्छन्न बेरोजगारी मुख्य रूप से कृषि और अर्थव्यवस्था के असंगठित क्षेत्रों में पाई जाती है। भारतीय अर्थव्यवस्था के प्राथमिक क्षेत्र के रूप में, कृषि कुल आबादी के लगभग 51% लोगों को रोजगार प्रदान करती है। हालांकि, देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान सिर्फ 12-13% ही है।

प्रच्छन्न बेरोजगारी के कारण

ऐसे बेरोजगारी के बहुत से कारण हैं इनमें से कुछ हैं:

  1. जनसंख्या वृद्धि: जनसंख्या में उच्च वृद्धि विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, अतिरिक्त श्रमिकों की संख्या को बढ़ाती है। भारत, दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश है। जनसंख्या की दृष्टि से भारत विश्व में दूसरे स्थान पर है, 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल आबादी का लगभग 70% हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करता है। ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक श्रमिक  पाये जाते हैं हालांकि ऐसे क्षेत्रों में ज्यादातर रोजगार किसी विशेष समय में पाया जाता है, यह प्रच्छन्न बेरोजगारी का कारण बनता है।
  2. गरीबी: गरीबी के कारण लोग भूमि खरीदने में असमर्थ रहते हैं और इस प्रकार लोगों के पास एक निश्चित पूंजी होती है।
  3. सीमित पूंजी: इसमें रोजगार के साधन सीमित रहते हैं और उनपर लोगों की निर्भरता बढ़ती जाती है।
  4. श्रमिकों की अधिकता वाली अर्थव्यवस्था: अधिक आबादी के कारण श्रमिकों की संख्या बढ़ती है, परिणामस्वरूप श्रम सस्ती दरों पर उपलब्ध हो जाता है। इस प्रकार, किसी एक ऐसे काम को करने के लिए जिसमें कम श्रमिकों की आवश्यकता होती है, उसके लिये अधिक श्रमिक मिल जाते हैं।
  5. बेहतर अवसरों के बारे में सीमित कौशल और ज्ञान: श्रमिकों में उचित कौशल के अभाव के कारण भी प्रच्छन्न बेरोजगारी की समस्या उत्पन्न हो जाती है। इस समय भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के साधन सीमित हैं तथा जनसंख्या असीमित है। इसमें उपलब्ध होने वाले रोजगार के अवसरों पर केवल अच्छे कौशल वाले लोगों की भर्ती कर ली जाती है और कम कौशल वाले लोग बेरोजगार रह जाते हैं।

संभव समाधान

भारत में एक अर्थव्यवस्था और एक विकासशील देश के रूप में उपरोक्त सभी विशेषताएं हैं। संपूर्ण दृष्टिकोण से, प्रच्छन्न बेरोजगारी से निपटने के कई उपाय हो सकते हैं:

  1. परिवार नियोजन कार्यक्रमों के माध्यम से जनसंख्या नियंत्रण उपायों के लिए जनता को शिक्षित किया जाये।
  2. स्व रोजगार के लिए लोगों को कर्ज उपलब्ध कराया जाये।
  3. कौशल विकास और उद्यमिता कार्यक्रम चालू किये जायें।
  4. ग्रामीण लोगों को शहरी क्षेत्रों में काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाये।

सरकार द्वारा उठाए गए उपाय

भारत सरकार ने संपूर्ण रूप में प्रच्छन्न बेरोजगारी को रोकने के लिए कई कदम उठाये हैं। कई स्व रोजगार योजनाएं शुरू की गई हैं और बड़े (सम्मानित, वृद्ध) लोगों को इस सामाजिक समस्या से निपटने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। यह सभी बेरोजगारी से निपटने के लिए सरकार द्वारा उठाये गये कुछ कदम हैं।