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भारत की लुप्तप्राय पशु प्रजाति

July 23, 2018


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endangered-speciesभारत विभिन्न प्रकार के जानवरों, पक्षियों और मछलियों का आवास स्थल है जिसमें बकरी, मुर्गी, गाय, भैंस, सूअर आदि जैसे कुछ महत्वपूर्ण कृषि पशु भी शामिल हैं। भारत वन्य जीवों जैसे कि बंगाल टाइगर, हिरण, भेड़िया, अजगर, भारतीय शेर, भालू, सांप, बंदर, कई प्रकार के जंगली बैल, एशियाई हाथी और मृग प्रजातियों वाला देश है। भारत दुनिया के सत्रह विशाल विविधता वाले देशों में से एक है। भारत सहित, यह सत्रह बड़े विविध देश, दुनिया के जैव विविधता के लगभग 60-70% के निवास स्थल हैं। पश्चिमी घाट, पूर्वी हिमालय और भारत-बर्मा पूरे विश्व में कुल 34 में से तीन जैव विविधता वाले आकर्षण केंद्र हैं।
भारत के पास दुनिया की कुल 6 वन्य जीव प्रजातियों में से 5% हैं, एक रिपोर्ट के मुताबिक जिसे संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा ड्रग्स एंड क्राइम (यूएनओडीसी) द्वारा प्रकाशित किया गया था जिसमें सभी स्तन धारियों के 7.6% और सभी पक्षी प्रजातियों के 12.6% शामिल हैं।
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंज़र्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन)रेडलिस्ट द्वारा 2014में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार,पक्षियों की 15प्रजातियां,स्तन धारियों की 12प्रजातियां,और सरीसृप और उभयचर की 18प्रजातियां गंभीर रूप से लुप्त प्राय सूची में शामिल हो गई हैं।

लुप्तप्राय संकटग्रस्त क्यों ?

आईयूसीएन की लाल सूची के अनुसार गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों के विलुप्त होने का उच्चतम जोखिम है। विशिष्ट प्रजातियां लुप्तप्राय हैं या नहीं यह निर्धारित करने के मूलरूप से पाँच तरीके हैं।

  • जब प्रजातियों की एक सीमित भौगोलिक सीमा होती है।
  • 50 से कम वयस्क प्रजाति की बहुत सीमित या छोटी आबादी।
  • क्या पिछली तीन पीढ़ियों या 10 वर्षों के लिए आबादी में 80% से अधिक की कमीआई या कमी होगी।
  • यदि प्रजाति की आबादी 250 से कम है और पिछली एक पीढ़ी या तीन साल के लिए लगातार 25% कम हो रही है।
  • वन्य जीवों के विलुप्त होने की एक उच्च संभावना है।

भारतीय हाथी, बंगाल टाइगर, भारतीय शेर, भारतीय गेंडा, गौर, शेर जैसी पूंछ वाला अफ्रीकी लंगूर, तिब्बती हिरन, गंगा नदी डॉल्फिन, नील गिरि तहर, हिम तेंदुए, ढोल, काली बतख, महान भारतीय बस्टर, जंगली उल्लू, सफेद पंख वाली बतख और कई अन्य भारत में सबसे लुप्तप्राय प्रजातियां हैं।

खतरे के कारण

  1. प्रजातियों के खतरे के लिए प्राथमिक कारणों में से एक आवास की कमी है।आज, प्राकृतिक परिदृश्य के विनाश में मानव हस्तक्षेप एक प्रमुख भूमिका रहा है। असंख्य प्रजातियों के लिए भोजन और आश्रय प्रदान करने वाले पेड़ों का कटान, खनन और कृषि जैसी मानवीय गतिविधियां।
  2. शिकार और अवैध शिकार करने से दुनिया भर में जानवरों और मछलियों की संख्या पर एक बहुत ही विनाशकारी और विपत्ति पूर्ण प्रभाव पड़ता है।
  3. प्रदूषण जैसे वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और अपशिष्ट प्रदूषण, विशेष रूप से प्लास्टिक के रूप में पशु प्रजातियों के लिए खतरे में एक प्रमुख भूमिका निभाता है।प्रदूषण न केवल मनुष्यों के लिए स्वास्थ्य संबंधी खतरों का कारण है, बल्कि यह जानवरों को भी प्रभावित करता है।
  4. एक मजबूत और हार्दिक वातावरण में हमेशा शिकारियों और उनके शिकार जानवरों की संख्या के बीच एक सटीक संतुलन होता है।शिकारी, जो अपने शिकार के जानवरों के प्राकृतिक दुश्मन हैं, वे बूढ़े और बीमार शिकार चुनते हैं क्योंकि वे अपने समूह के साथ नहीं रह सकते। इस परिदृश्य में उनके बीच के रिश्ते पूरी तरह से स्वस्थ हैं क्योंकि शिकारियों ने इन शिकार जानवरों को ही खा लिया है जो कि पहले ही अपने जीवन के अंत के करीब आ रहे हैं। लेकिन समस्याएं अधिक स्पष्ट हो जाती हैं जब शिकारी उस क्षेत्र में घूमते रहते हैं जहाँ उन्हें केवल कुछ ही संख्या में अपने शिकार या जानवर मिलते हैं।
  5. जानवरों को शिकार और अवैध शिकार से बचाने के लिए उन्हें अक्सर अभयारण्य और आश्रय में रखा जाता है।कुछ जानवरों के लिए यह बहुत फायदेमंद साबित हुआ है, हालांकि अन्य जानवर भी हैं जो खतरे में पड़ने से पीड़ित हैं और मुसीबत में हैं। मुख्य दो कारण हैं भीड़ और अत्यधिक चराई। आमतौर पर बहुत सारे जानवर छोटे क्षेत्रों में सीमित होते हैं। ये जानवर अक्सर एक सीमित इलाके में एक ही घास और पेड़ खाते हैं, जबकि प्राकृतिक परिवेश में चराई वाले जानवर खासतौर पर खा रहे भोजन को बदलते रहते हैं और अधिक समय तक आगे बढ़ते रहते हैं। लेकिन एक सीमित और छोटे क्षेत्र में वे उन्हीं पौधों से बार-बार खाते हैं और अत्यधिक तनाव के कारण पौधों को नष्ट कर देते हैं।

लुप्तप्राय पशुओं को बचाने के कुछ तरीके

  • अगर दुनिया भर में प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है तो दुनिया भर में जानवरों, मछलियों और पक्षियों पर इसका सकारात्मक प्रभाव हो सकता है।
  • लुप्तप्राय जानवरों को विलुप्त होने से बचाने के लिए, कई प्रजनन कार्यक्रम पेश किए गए हैं।सरकारी, गैर सरकारी संगठनों और अन्य कॉर्पोरेट निकायों को इस महान उद्देश्य के लिए आगे आना चाहिए क्योंकि इस कार्यक्रम में समर्पित और विशेष लोगों तथा निश्चित रूप से बहुत धन की आवश्यकता है।
  • लुप्तप्राय जानवरों को अपनी संख्या में एक बार वृद्धि के बाद जंगलों में पुनः अपना जीवन शुरू करना कुछ मामलों में सफल हो गया है, हालांकि सभी प्रजातियों ने अच्छा प्रदर्शन नहीं कियाहै।
  • यदि शिकार और अवैध शिकार को नियंत्रित किया जा सकता है तो लुप्तप्राय पशुओं की संख्या में एक महत्वपूर्ण बदलाव हो सकता है।

वन्य जीव संरक्षण के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम

  • जम्मू-कश्मीर (इसका अपना अधिनियम है) को छोड़कर सभी राज्यों ने, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम को 1972 में अपनाया गया, जो खतरे में आने वाली और दुर्लभ प्रजातियों के किसी भी प्रकार के व्यापार को रोकता है।
  • लुप्तप्राय प्रजातियों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए केंद्र सरकार राज्य सरकारों को हर प्रकार की वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
  • 1970 में बाघ के शिकार पर राष्ट्रीय प्रतिबंध लगाया गया था और वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 में प्रभावी हुआ था। नवीनतम बाघ गणना (2015) के अनुसार, बाघों की आबादी में कुल 30% की वृद्धि हुई है।2010 में, बाघों की गणना के अनुसार भारत में 1700 बाघ बचे थे, जो 2015 में 2226 हो गए।
  • सरकार द्वारा अनगिनत संख्या में नेशनल पार्क, वन्यजीव अभ्यारण्य, पार्क आदि की स्थापना की गई है।
  • 1992 में, देश में प्राणी उद्यान के प्रबंधन के पर्यवेक्षण के लिए केन्द्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजीए) शुरू किया गया था।
  • 1996 में, वन्य जीव सलाहकार समिति और वन्य जीव संस्थान वन्य जीव संरक्षण को उससे संबंधित मामलों की विभिन्न विशेषताओं पर सलाह मांगने के लिए स्थापित किया गया था।
    भारत की लुप्तप्राय प्रजातियों को बचाने के लिए सरकार ने कई अन्य पहल की हैं।

भारत पाँच मुख्य अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों का हिस्सा है जो वन्य जीव संरक्षण से जुड़े हैं। वे हैं- (i) लुप्तप्राय प्रजातियों (सीआईटीईएस) में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर सम्मेलन, (ii) वन्यजीव तस्करी (सीएडब्ल्यूटी) के खिलाफ गठबंधन, (iii) अंतर्राष्ट्रीय व्हेलिंग कमीशन (आईडब्ल्यूसी), (iv) संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन – विश्व धरोहर समिति (यूनेस्को – डब्ल्यूएचसी) और (v) प्रवासी प्रजातियों पर कन्वेंशन (सीएचएस)।
भारत की लुप्तप्राय प्रजातियों को बचाने के लिए कई सकारात्मक कदम उठाए जा रहे हैं पर यह पर्याप्त नहीं हैं। इस महान कार्य में आगे आने के लिए और अधिक गैर-सरकारी संगठनों और निजी कॉर्पोरेट क्षेत्रों की जरूरत है।