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पल्लव कौन थे?

June 30, 2017


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आज के दक्षिणी भारत पर दूसरी और नौवीं शताब्दी के मध्य पल्लव वंश का शासन था, जो कि उनकी महान वास्तुकला के लिए जाना जाता है। पल्लव वंश प्राचीन भारत के सबसे महत्वपूर्ण राजवंशों में से एक था, यह दक्षिण भारत में एक प्रमुख शक्ति थी। वर्तमान में कांची के नाम से जाना जाने वाला शहर पल्लवों के शासनकाल में कांचीपुरम नाम से उनकी राजधानी था। तेलगु, तमिल और संस्कृत उनकी मुख्य भाषा थी। विभिन्न वास्तुशिल्प नमूने खासकर महाबलिपुरम, जिसका निर्माण पत्थरों को काटकर किया गया है, जैसे धार्मिक स्थल उनके साथ जुड़े हुए हैं। उनके अधिकांश पूजा स्थल भगवान शिव के प्रति समर्पित थे। पल्लव राजनीतिक कौशल के बजाय सांस्कृतिक विकास के लिए जाने जाते हैं। उनके शासन में अक्सर देवताओं और ब्राह्मणों को भूमि दान में दी जाती थी। इसके अलावा, वैदिक बलिदान और अस्वमेध संस्कार उनके अनुष्ठानों का हिस्सा थे। लिखने के उद्देशय से, एक तरह से दक्षिणी ब्राह्मी लिपि उनके द्वारा विकसित की गई थी, जो बाद में पूर्व की ओर फैल गयी थी। ऐसा कहा जाता है कि इस लिखित लिपि ने लगभग सभी दक्षिणी एशियाई लिपियों को प्रभावित किया है।

पल्लवों की संदिग्ध उत्पत्ति

स्कंदवर्मन को पल्लवों का पहला महान शासक माना जाता है, हालांकि ऐसे संकेत प्राप्त हुए हैं कि संभवतः स्कंदवर्मन के पूर्ववर्ती शासक भी हो सकते हैं।

पल्लवों की उत्पत्ति अभी भी एक रहस्य है क्योंकि उनके बारे में कोई विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध नहीं है। ऐसा माना जा रहा है कि उन्होंने दक्षिण से भारत में प्रवेश किया था। कुछ विद्वानों का यह भी मानना ​​है कि पल्लव पार्थियों के पहलवेस से थे और दक्षिण में चले गये थे। लेकिन फिर से, यह साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं मिला है।

एक अन्य सिद्धांत के अनुसार, पल्लव खानदानी राजवंशी थे और आंध्र साम्राज्य के बाद सत्ता में आए।

श्रीनिवास अय्यंगार के अनुसार, पल्लव प्राचीन नागा लोगों का हिस्सा थे। वे पहली बार मद्रास के चारों ओर तौंडैमण्डलम जिले में रहते थे और बाद में उन्होने तंजौर और तिरुचुरापल्ली जिलों को जीत लिया था। पल्लव तमिल राजाओं के प्रमुख दुश्मन थे और आज तमिल भाषा में पल्लव का अर्थ “दुष्ट” है।

यह भी माना जाता है कि पल्लवों का जन्म चोल राजकुमार और मणिप्लालम की नागा राजकुमारी से था। राजकुमारी ने एक बेटे को जन्म दिया जो तौंडैमण्डलम का राजा बनाया गया था। इस राजवंश का नाम अपनी माँ की मातृभूमि के नाम पर रखा गया था। यहाँ तक ​​कि संगम युग के साहित्य में, पल्लवों को टोंडाययार के रूप में वर्णित किया गया है। लेकिन इस सिद्धांत पर भी बहस हुई है।

पल्लवों का प्रशासन

अधिकांश पल्लव राजा महान विद्वान थे जिन्हें महाराजधिराज, धर्म-महाराजधिराज और अग्निस्तोमावाजपेय जैसी उपाधियाँ दी गयीं थी। उनकी सहायता के लिए मंत्री परिषद का गठन किया गया था। गाँवों के सभी मामले परिषद या सभा द्वारा देखे जाते थे। गाँवों में अनौपचारिक सभाओं को उरर (विशेष सभा) के रूप में जाना जाता था और गाँव के लिए अदालत की सहायता से इस्तेमाल किया जाता था। इसके अलावा, मामूली आपराधिक मामलों को गाँव-स्तरीय अदालतों में हल किया जाता था। कस्बों और जिलों में न्यायिक अदालतें थी, जिनमें राजा न्याय का सर्वोच्च अधिकार था। सभी जमीनों का मालिक राजा था। विशाल अंतर्जातीय आबादी वाले गाँव राजा को कर (टैक्स) देते थे। ब्रह्मदेव गाँव में, संपूर्ण भूमि या तो एक ब्राह्मण या ब्राह्मणों के एक समूह को दी गई थी, जिन्हें शाही करों का भुगतान करने की छूट दी गई थी। इसके अलावा, एक विशिष्ट श्रेणी की भूमि थी जिसे श्रीपट्टी भूमि के रूप में जाना जाता था। ग्रामीणों द्वारा बनाए गए तालाबों के रखरखाव के लिये राशि दी जाती थी। दो प्रकार के कर थे – एक राज्य को भुगतान किया जाता था और एक गाँवों द्वारा गाँवों की जरूरत पूरा करने के लिये एकत्रित किया जाता था।

पल्लवों के अंतर्गत स्थापत्य शैली

पल्लव मंदिर चार अलग-अलग शैलियों में बनाए गए थे। ये शैलियाँ अग्रलिखित हैं:

  • महेंद्र शैली: यह एक गुफा शैली की वास्तुकला है और इसका उपयोग पल्लवों के एकम्बरानाथ (कांचीपुरम) मंदिर में देखा जा सकता है।
  • मामल्ला शैली: ये एकल पत्थर से बने अखंड मंदिर हैं महाबलीपुरम के पास सात पैगोड़ा स्थित हैं जो इस पल्लव कला का उत्कृष्ट गुण प्रदर्शित करता है।
  • राजसिम्हा शैली: कांची का कैलाश मंदिर इस शैली को दिखाता है। मंदिर में एक शंक्वाकार मीनार है और इसका मंडप एक सपाट-छत शैली में बनाया गया है।
  • अपराजिता शैली: यह शैली चोल वास्तुकला शैली में दिखती है और बहुत ही जटिल है। दलवानूर के कुछ मंदिर वास्तुकला की इस शैली को प्रदर्शित करते हैं। इसके अलावा, आप यहाँ पल्लव राजाओं और रानियों की सुंदर आकृतियाँ देख सकते हैं।

साहित्य में पल्लवों का योगदान महान था। भारवी और दांडिन पल्लवों के राजसभा में रहते थे। दांडिन ने कई कविताओं को लिखा था और उनमें से एक बहुत ही अनोखी है यदि उसे सामान्य रूप से पढ़ा जाता है तो वह रामायण की कहानी वर्णित करती है और यदि इसे पीछे से पढ़ा जाता है तो यह महाभारत की कहानी वर्णित करती है।

पल्लव समाज

पल्लवों का इतिहास बहुत जटिल है और लगभग चार शताब्दियों तक उन्होंने शासन किया। पल्लवों का काल महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दक्षिणी भारत के आर्य करण को पूरा करती है। पल्लव शासन के दौरान उत्तर भारतीय धर्म शास्त्रों ने पूर्ण अधिकार प्राप्त किया। कांची विश्वविद्यालय दक्षिण में शिक्षा का एक महत्वपूर्ण आधार था। इसका उल्लेख चीनी यात्री ह्वेन सांग के लेखन में किया गया है।

पल्लव वंश के अधिकांश राजा कट्टर हिंदू थे जो भगवान शिव की पूजा करते थे। कुछ जैन मठ महेन्द्रवर्मन द्वारा नष्ट किए गए थे क्योंकि वह जैन धर्म के विरोधी थे। जैन धर्म की तरह बौद्ध धर्म ने भी इस समय के दौरान अपना अकर्षण खो दिया। लेकिन कुल मिलाकर पल्लव अन्य धर्मों और मान्यताओं के प्रति लचीले थे।

स्थानीय परंपराओं को वैदिक परंपराओं द्वारा प्रतिस्थापित किया गया था जैसा कि ब्राह्मणों को वेदों का ज्ञान था, इसलिए उन्होंने बेहतर स्थिति हासिल की।

प्रारंभिक शिक्षा जैन और बौद्धों से प्रभावित थी। मदुरै और कांची जैन संस्थानों के मुख्य केंद्र थे लेकिन जल्द ही इन्हें ब्राह्मणिकी संस्थानों में बदल दिया गया था। गणित की लोकप्रियता 8 वीं सदी में बढ़ी। सभी स्कूलों में शिक्षण की मुख्य भाषा संस्कृत थी।

पल्लवों की अस्वीकृति

चालुक्य सेना द्वारा पल्लवों पर हमला किया गया और इससे पल्लवों की राजधानी कांचीपुरम खतरे में पड़ गयी। 9वीं शताब्दी के करीब चोल राजा द्वारा अंतिम पल्लव राजा अपराजीतवर्मन की हार के साथ पल्लव शक्ति समाप्त हुई।