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स्वामी विवेकानंद के प्रसिद्ध शिकागो भाषण से पाँच मुख्य बातें

July 5, 2018


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स्वामी विवेकानंद के प्रसिद्ध शिकागो भाषण से पाँच मुख्य बातें

11 सितंबर 2017 को विश्व धर्म महासभा शिकागो की, जिसमें स्वामी विवेकानंद ने भाषण दिया था, 125 वीं वर्षगांठ पूरी होने वाली है। संत और सामाज सुधारक विवेकानंद ने पश्चिम में हिंदुत्व को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1893 में, उनके द्वारा दिया गया तर्किक भाषण इतना सुस्पष्ट था कि उस समय वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि ने बहुत ध्यानपूर्वक सुना था। वास्तव में, उस भाषण के दौरान वहाँ मौजूद उच्चाधिकारी तल्लीनता से दो मिनट तक सुनते रह गए। असल में, इस प्रभावित करने वाले भाषण के कारण भारत के इस महान संत को एक उपनाम ‘मोनिकर’ से सम्मानित किया गया। इस भाषण की सबसे अच्छी बात यह है कि आज भी यह काफी प्रासंगिक है और इसमें कई चीजें ऐसी हैं जो हम इस भाषण से सीख सकते हैं।

देशभक्ति का महत्व

विवेकानंद ने अपने भाषण के दौरान चर्चा करते हुए यह बताया कि कैसे भारत विदेश से आने वाले विभिन्न धर्मों के लोगों के लिए एक शरण देने वाले के रूप में या आश्रयदाता के रूप में सामने आया है तथा उन लोगों को भारत में उनकी मातृभूमि की अपेक्षा अधिक अच्छा जीवन यापन करने का अवसर प्रदान किया है। अपने भाषण में उन्होंने इस बात का एहसास दिलाया कि भारत ने अपने स्वयं के जाति, धर्म या पंथ के बावजूद, सभी देशों के धर्मों का स्वागत किया है। वास्तव में, भारत की एक ऐसी बहुसंस्कृति विरासत है जो उसे दुनिया से अलग और विशेष बनाती है। इतिहास के इस पहलू पर विवेकानंद का गौरव इतना प्रभावशाली है, जिसे हम अपने जीवन में समाहित कर सकते हैं और इसका प्रयोग कर सकते हैं।

सभी धर्मों के प्रति प्यार

स्वामी विवेकानंद ने अपने भाषण के दौरान यह चर्चा की कि विभिन्न धार्मिक मान्यताओं और धर्मों के लोगो की अलग-अलग संस्थाओं के प्रति कैसे आस्था बनाए रखना आवश्यक है और कैसे लोगों को देश को एकजुट करने और शांतिपूर्ण इकाई बनाए रखना आवश्यक है, जो एक संघटनात्मक ढंग से बढ़ रहा था। यह सच्चाई से पहचाना जाता है कि इन दिनों किसी दूसरी बात के अलावा, जब आज के युग में लोगों को आवाज उठाने के लिए मार दिया जाता है। यह इस युग में प्रासंगिक है जब लोग एक – दूसरे के विचारों और मान्यताओं को ठुकरा रहे हैं।

धर्मों का विश्लेषण

उनके भाषण के महत्वपूर्ण बिंदुओं में से एक यह था कि उन्होंने बताया कैसे उनके समय में विभिन्न धर्मों के लोग परेशान रहते थे कैसे उनको लोगों ने सहारा और सब कुछ माना था। अपने भाषण में, उन्होंने अमेरिका को उन बाधाओं को तोड़ने और विश्व के विभिन्न धर्मों की अधिक समझ बनाने के प्रयासों का धन्यवाद किया। यह अब भी लागू होता है चूँकि अधिकांश समय हम किसी धर्म या इसके कुछ हिस्सों से नफरत करने में बिता देते हैं, सिर्फ इसलिए केवल हम यह समझते हैं कि हम इसके बारे में ज्यादा या कुछ भी नहीं जानते हैं। इसे निश्चित रूप से बदलने की जरूरत है इससे पहले कि हम इस तरह के फैसले करने लगें, उससे पहले हमें इन चीजों के बारे में जानना होगा।

विज्ञान से परिचित होने के नाते

अपने भाषण के दौरान विवेकानंद ने यह भी चर्चा की कि वेदों ने कैसे साबित किया है कि जब समय नहीं था तो कोई सृजन नहीं हुआ था (जिस समय कोई भी वैज्ञानिक तकनीक नहीं थी) और यह कैसे विज्ञान द्वारा सिद्ध किया गया है कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा का स्त्रोत हमेशा एक समान होता है। इससे यह पता चलता है कि यह ज्ञान को विस्तृत करने और सीखने को जारी रखता है ताकि आप अपने धार्मिक विश्वासों के लिए एक तर्कसंगत संबंध स्थापित कर सकें, जब उचित तर्क द्वारा इनको समर्थन नहीं दिया जाता है, तो निष्पक्ष प्रतीत होते है।

छवियों की आवश्यकता क्यों है?

किसी के धर्म पर लगाई गई सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक यह है कि कैसे वे हमेशा कुछ छवियों को ध्यान में रखते हैं। खैर, विवेकानंद इस तरह के व्यवहारों को यह कहते हुए सिद्ध करते हैं कि यह संघ की भावना है, जो उन लोगों को हाथ जोड़कर ध्यान केंद्रित करने की अनुमति देती है, जबकि वे अच्छी तरह से जानते है कि छवि किसी भी तरह से भगवान या सर्व-शक्ति का प्रतिनिधित्व नहीं करती है। हालाँकि, जो लोग स्वयं को कमजोर महसूस करते हैं, वह लोग धर्म और ईश्वर को निवारण का साधन मानते हैं और इस तरह के तर्क के साथ सहमत नहीं हो सकते हैं। उन लोगों को इस तथ्य को स्वीकार करने की जरूरत है कि उन्हें दूसरों के विचारों को भी समझना चाहिए। यथासंभव उच्चतम स्तर पर समझ और दया की जरूरत है।