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पीलिया- कारण, लक्षण और बचाव

July 2, 2018


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पीलिया- कारण, लक्षण और बचाव

पीलिया- कारण, लक्षण और बचाव

पीलिया एक ऐसी अवस्था को कहते हैं, जब मरीज के त्वचा और आंख का सफेद हिस्सा पीला पड़ने लगता है। खून में बिलिरुबिन की मात्रा बढ़ जाती है। यह अपने आप में कोई बीमारी नहीं है, लेकिन यह एक बीमारी या परिस्थिति का लक्षण है, जिसमें तत्काल चिकित्सकीय मदद लेने की जरूरत पड़ती है।
बिलिरुबिन एक पीले रंग का पदार्थ है, जो खून में मौजूद लाल रक्त कणिकाओं के 120 दिन के साइकिल के पूरे होने पर टूटने से बनता है। बिलिरुबिन में बिलि होता है, जो लिवर में बनने वाला पाचक तरल पदार्थ होता है और यह गॉल ब्लेडर में रहता है। यह भोजन के अवशोषण और मल के उत्सर्जन में मदद करता है। जब बिलिरुबिन किसी कारण से बिलि के साथ मिश्रण नहीं बना पाता या जब लाल रक्त कणिकाएं सामान्य से कम अवधि में टूटने लगती है तो खून में बिलिरुबिन का स्तर तेजी से बढ़ने लगता है। यह अन्य अंगों में पहुंचकर उनमें भी पीलापन पैदा कर सकता है।

पीलिया इस तरह कई बीमारियों की वजह बन जाता है। मलेरिया, सिकल सेल एनीमिया और थैलेसीमिया जैसे रोग बिलिरुबिन के निर्माण की गति को तेज कर देते हैं, जबकि हेपेटाइटिस, अल्कोहलिक लिवर की बीमारी, ग्रंथियों का बुखार, लिवर का कैंसर, और यहां तक कि अत्यधिक मात्रा में शराब पीने से बिलिरुबिन को प्रोसेस करने की लिवर की क्षमता प्रभावित होती है। इसके अलावा अन्य परिस्थितियां, जैसे कि – गॉल स्टोन्स और पैनक्रियाटिटिस, शरीर से बिलिरुबिन को बाहर निकालने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करती हैं।

पीलिया के लक्षण

पीलिया का इलाज अपने आप में काफी मुश्किल है। लेकिन इसके लक्षण पहचानना बेहद आसान है-
•बिलिरुबिन का स्तर खून में बढ़ने से, त्वचा, नाखून और आंख का सफेद हिस्सा तेजी से पीला होने लगता है।
•लिवर की किसी भी अन्य परेशानी की ही तरह, पीलिया में भी स्पष्ट तौर पर लिवर में तकलीफ होती है। एक तरह से असुविधाजनक खुजली होती है।
•अक्सर फ्लू-जैसे लक्षण विकसित होते हैं और मरीज को ठंड लगने के साथ ही या उसके बिना भी बुखार चढ़ने लगता है।
•मतली, खाने के प्रति विरक्ति, भूख कम लगना।
•पेट में दर्द उठना, कभी-कभी मरोड़ उठना।
•वजन घटना
•गहरा/पीला पेशाब होना
•लगातार थकान महसूस करना
रोग की पहचान
एक डॉक्टर को मरीज की शारीरिक जांच से अंदाजा हो जाता है कि उसे पीलिया हो सकता है। खासकर आंखों और त्वचा के रंग से इसकी पहचान हो जाती है। फिर भी डॉक्टर पुष्टि और उसकी गंभीरता के लिए, इस तरह के ब्लड टेस्ट करवा सकता है-
•बिलिरुबिन टेस्ट
•फुल ब्लड काउंट (एफबीसी) या कम्प्लीट ब्लड काउंट (सीबीसी)
•हेपेटाइटिस ए, बी और सी के टेस्ट

कभी, यदि डॉक्टर को लगता है कि पीलिया के साथ कुछ अन्य परेशानियां, जैसे कि लिवर में सिरोसिस य कैंसर जैसी स्थिति के लक्षण भी हैं तो वह मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) या पेट का अल्ट्रासाउंड या सीएटी स्कैन या लिवर बायोप्सी करवाने की सलाह भी दे सकता है।

इलाज के विकल्प

वयस्कों में, पीलया या हायबरबिलिरुबिनेमिया का इलाज नहीं होता। बिलिरुबिन का स्तर बढ़ने की वजह को खोजकर उसका इलाज किया जाता है।
यदि पीलिया मलेरिया जैसी किसी परिस्थिति की वजह से हुआ है तो मरीज की इस बीमारी का इलाज पहले होता है। खुजली जैसे लक्षणों का इलाज किया जाता है। जेनेटिक डिसऑर्डर जैसे सिकल सेल एनीमिया होने पर मरीज को खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। यदि बिले डक्ट ब्लॉक है तो डॉक्टर सर्जरी के विकल्प को भी चुन सकते हैं। यदि पीलिया लिवर को हुए नुकसान की वजह से हुआ है तो डॉक्टर ट्रांसप्लांट की सलाह भी दे सकते हैं।

हेपेटाइटिस इंफेक्शन के ज्यादातर मामलों में पीलिया एक निश्चित अंतराल के बाद खुद-ब-खुद ठीक हो जाता है। आहार से जुड़ी बाध्यताएं और पर्याप्त आराम करना इस स्थिति से उबरने में मददगार साबित होता है।

पीलिया और हेपेटाइटिस

यह अक्सर कहा जाता है कि पीलिया की वजह से हेपेटाइटिस होने की आशंका बढ़ जाती है। हो सकता है कि यह बयान शत-प्रतिशत सही न हो। हालांकि, यह जानना बेहद जरूरी है कि (वयस्कों में) पीलिया एक लक्षण है, जबकि हेपेटाइटिस बी लिवर की एक बीमारी जो वायरस की वजह से होता है। पीलिया या हायपरबिलिरुबिनेमिया जरूरी नहीं कि हर बार हेपेटाइटिस की वजह से ही हो। लिवर की अन्य बीमारियों और जेनेटिक कारण भी खून में बिलिरुबिन के स्तर में अस्थिरता पैदा कर सकते हैं। हेपेटाइटिस या लिवर में जलन-सूजन पांच अलग-अलग तरह के वायरस की वजह से हो सकती है (इन्हें हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी या ई कहा जाता है)। वायरल हेपेटाइटिस सबसे ज्यादा संक्रमित भी होता है।
नवजात शिशुओं में पीलिय

नवजात शिशुओं में पीलिया या नियोनटल जॉन्डिस बहुत ही आम है। गर्भ में रहने के दौरान बिलिरुबिन का उत्सर्जन प्लेसेंटा के जरिए होता है। बच्चे के जन्म के द उसके लिवर ने यह काम करना शुरू कर देना चाहिए। लेकिन कई बार बच्चों के लिवर जन्म के तत्काल बाद इस काम को अच्छे से नहीं कर पाते। लिवर के ताकतवर होने के साथ ही इस स्थिति में सुधार आता जाता है। स्तनपान करने वाले कई शिशुओं में पहले हफ्ते के बाद पीलिया विकसित हो जाता है। वैसे, इस परिस्थिति से निपटने के लिए चिकित्सकीय देखभाल जरूरी है। ज्यादातर केस में यह स्थिति बिना किसी चिकित्सकीय हस्तक्षेप के ठीक हो जाता है।

भारत में पीलिया

हमारे देश के ज्यादातर राज्यों में रिकॉर्ड की देखरेख अच्छी नहीं है। इसके बाद भी यह प्रत्यक्ष है कि पीलिया के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी दर्ज हुई है। हाल ही में आई एक न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले दो दशक में पीलिया की वजह से होने वाली मौतों में दोगुनी वृद्धि हुई है। 2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में इस समय 4 करोड़ से ज्यादा हेपेटाइटिस बी के रोगी हैं। चीन के बाद यह दूसरा नंबर है। ज्यादातर हेपेटाइटिस बी या सी के मरीजों को इस इंफेक्शन की जानकारी तक नहीं है। इस तरह से उन्हें लिवर सिरोसिस या कैंसर होने का खतरा भी बहुत ज्यादा है। वे हेपेटाइटिस इंफेक्शन के वाहक बने हुए हैं।

भारत में टीकाकरण

विश्व स्वास्थ्य संगठन के निर्देशों का पालन करते हुए भारत सरकार ने देश के हर हिस्से में हेपेटाइटिस ए और हेपेटाइटिस बी टीकाकरण कार्यक्रम शुरू किए हैं। हेपेटाइटिस बी का टीका सिर्फ नवजात शिशुओं को लगाया जाता है। हेपेटाइटिस ए का टीका बच्चों के साथ ही वयस्कों को भी लगाया जा रहा है।

टीकाकरण शैड्यूलः

•हेपेटाइटिस ए टीका
•डोज 1- 12 से 23 माह उम्र के बीच
•डोज 2- पहले डोज से 6 से 18 माह बाद
•अतिरिक्त डोज- ऐसे बच्चों और वयस्कों को, जिन्हें यह होने का खतरा हो
हेपेटाइटिस बी टीका
•डोज 1- जन्म के 24 घंटे के भीतर
•डोज 2- जन्म के 6 हफ्ते बाद
•डोज 3- जन्म के 10 हफ्ते बाद
•डोज 4 – जन्म के 14 हफ्ते बाद
•किशोरों को 18 साल की उम्र होने तक टीका लगाया जा सकता है। खासकर यदि उन्हें शुरुआती उम्र में न लगा हो तो।

हेपेटाइटिस इंफेक्शन से बचाव के लिए स्वस्थ आहार लेना, साफ पानी पीना और साफ-सुथरे माहौल में रहना, नियमित कसरत कतना और शराब पीने से दूर रहना जरूरी है।