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क्या ३ तलाक अमानवीय हैं ?

April 21, 2017


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यह एक विडम्बना ही है कि जब पाकिस्तान और बांग्लादेश समेत दुनिया के २० अन्य मुस्लिम  देशों ने ३ तलाक को समाप्त कर दिया है वहीं भारत देश इस समस्या से जूझ रहा है, जहाँ पर एक मुस्लिम व्यक्ति अपनी पत्नी को ३ बार तलाक तलाक बोलकर उससे सम्बन्ध विच्छेद कर लेता है। ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जब एक नशे में धुत मुस्लिम व्यक्ति ने अपनी नशे की अवस्था में ‘तलाक, तलाक, तलाक’ का उच्चारण करके अपनी पत्नी को तलाक दे दिया था। हाल ही में  उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले की एक गर्भवती महिला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने यह बताया है कि उनके पति ने तीन बार तलाक कहकर उन्हें तलाक दे दिया था। उस महिला ने यह भी आरोप लगाया था कि उसके पति ने इस कारणवश उसको तलाक दिया था, क्योंकि उसको शक था कि वो एक लड़की को जन्म देने वाली है। यह एक मूर्खता है,  लेकिन पूरे देश में मुसलमान इसे सुधारने के लिए तैयार ही नहीं हैं।

अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमएलबी),  जो कि देश में मुसलमानों की राय का एक प्रमुख स्रोत है,  का मानना है कि मुसलमानों का यह संवैधानिक अधिकार है कि वे अपने व्यक्तिगत कानून से संचालित है एवं तीन तलाक शरियत कानूनों के अनुरूप है। मगर बहुसंख्यक मुस्लिम महिलाएं इस बात से कतई सहमत नहीं हैं कि यह क़ुरान के अनुसार है। बल्कि उनका खयाल यह है कि तीन तलाक इस्लाम में सबसे दु:खद बात है और इसका केवल तब ही उपयोग किया जाना चाहिए जब पति और पत्नी के बीच सुलह के सभी प्रयास विफल हो जाएं। उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी की पत्नी सलमा अंसारी का मानना है कि कुरान में तीन तलाक का कोई नियम नहीं है।

क्या एक बार में ३ बार तलाक कह देना गैर इस्लामिक है?

क़ुरान में तलाक के सम्बन्ध में कुछ निश्चित व्यवस्थाएं दी गई हैं। इस पवित्र पुस्तक के अनुसार , जो तलाक देना चाहते हैं उन्हें ४ महीने का इंतज़ार करना पड़ेगा, और यदि इस बीच उनको यह महसूस होता है कि यह गलत है तो खुदा उनको माफ कर देगा, और अगर वे तलाक ले लेते हैं तो खुदा उनका न्याय करेगा। कुरान यह भी कहता है कि तलाकशुदा महिलाओं को तीन माहवारी का  इंतजार करना चाहिए और उनके पति इस प्रतीक्षा अवधि के दौरान उन्हें वापस लेने के पूरी तरह हकदार हैं, अगर वे सुलह की इच्छा रखते हैं। तलाक पर प्रकाश डालते हुए इस धार्मिक पुस्तक का यह भी कहना है कि तलाक दो बार सुनाया जा सकता है;  तो पत्नी को या तो निष्पक्षता में साथ रखा जा सकता है या निष्पक्षता में अलग होने की अनुमति दी जा सकती है। अगर पति अपनी पत्नी को तीसरी बार तलाक देता है,  तो वह इस तलाक के बाद उसके लिए वैध नहीं रहेगी, जब तक कि वह दूसरे आदमी से शादी नहीं करे। क़ुरान में यह कही नहीं लिखा है की आप एक बार में ३ बार तलाक का उच्चारण करके तलाक प्राप्त कर सकते हैं।

तीन तलाक पर बहस कैसे शुरू हुई?

जब प्रधानमन्त्री श्री नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे को पिछले साल उठाया था,  तभी इलाहाबाद उच्च  न्यायालय ने दिसंबर 2016 में अपने एक फैसले में ३ तलाक को असंवैधानिक प्रथा ठहराया। लेकिन इस विषय पर बहस तब शुरू हुई जब कानून आयोग ने जनता से उनकी प्रतिक्रिया मांगी कि क्या तीन तलाक की प्रथा को समाप्त कर दिया जाना चाहिए और क्या एक समान नागरिक संहिता को वैकल्पिक बनाया जाना चाहिए या नहीं।  11 मई से, सुप्रीम कोर्ट के पाँच न्यायाधीश संवैधानिक पीठ, मुसलमानों के ३ तलाक की प्रथाओं को चुनौती देने वाली याचिकाओं को सुन रहे हैं। लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्यों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे अपने धार्मिक मामले में हस्तक्षेप नहीं बर्दाश्त करेंगे। बोर्ड का तर्क है कि कुरान में पाए गए मुस्लिम कानून की वैधता का परीक्षण, देश के संविधान के किसी विशेष प्राविधान में नहीं किया जा सकता है।

हालांकि,  इस समुदाय के कई आध्यात्मिक प्रमुखों ने इस प्रथा का विरोध किया है। उदाहरण के रूप में,  अजमेर शरीफ दरगाह के आध्यात्मिक प्रमुख,  जैनुल अब्दीन खान ने कहा है कि तीन तलाक शरिया के खिलाफ है और यह अमानवीय है,  इस्लाम विरोधी और लैंगिक समानता के खिलाफ है। मगर जो लोग मुस्लिम सुन्नी समुदाय से जुड़े हैं उनका मानना यह है कि जो लोग शरिया कानून का पालन न करके तीन तलाक का सहारा लेते हैं,  उनका सामाजिक बहिस्कार कर देना चाहिए। मगर क्या इनके बहिस्कार करने से मुस्लिम समुदाय को इस रिवाज़ से बचाया जा सकता है?  यह एक चर्चा का विषय है।