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बिहार चुनावः मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार के सामने हैं नई चुनौतियां

November 9, 2015


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नीतीश के लिए यह बड़ी जीत है!

महागठबंधन ने बिहार जीत लिया और नीतीश कुमार अगली सरकार बनाने के लिए तैयार हैं। एनडीए को 58 सीटों पर रोकते हुए खुद 178 सीटें हासिल करना आसान नहीं था। खासकर उच्च स्तरीय ध्रुवीकरण वाले अभियान के बाद, जहां हर पक्ष से सियासी विमर्श निचले स्तर पर पहुंचा हुआ था।

आगे हैं राजनीतिक चुनौतियां

चुनाव जीतना नीतीश कुमार के लिए आसान था। लेकिन असली लड़ाई तो अब शुरू होगी। अगले पांच साल तक यह लड़ाई जारी रहेगी। उनका यह कार्यकाल अब तक का सबसे मुश्किल कार्यकाल रहने वाला है। नीतीश कुमार को दस बरस में विकसित प्रशासनिक क्षमता का बखूबी इस्तेमाल करना होगा। वह भी सियासी संतुलन साधते हुए। खासकर उन्हें पिछले कार्यकालों के अपने विकास एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए काफी काम करना होगा।

जब उन्होंने लालू प्रसाद के सहयोग के साथ महागठबंधन का ऐलान किया था, उन्हें पता था कि वे अपने लिए ही मुश्किलें खड़ी कर रही हैं। जेडी(यू) ने 71, जबकि आरजेडी ने 80 सीटें जीती हैं। उन्हें अब पांच साल तक लालू को साथ रखना होगा। लालू महागठबंधन के वरिष्ठ सहयोगी बनकर उभरे हैं। निश्चित तौर पर वे सत्ता में बड़ा हिस्सा मांगेंगे। दूसरे शब्दों में लालू की हैसियत नीतीश के लिए वही होगी जो मनमोहन सिंह के लिए सोनिया की थी। और यह स्थिति उसी हालात में बनती है, जब आप कमजोर आधार पर दफ्तर का काम संभालते हैं।

नई कैबिनेट की संरचना को लेकर वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो चुकी है। लालू चाहेंगे कि उनके एक बेटे को उपमुख्यमंत्री बनाया जाए। यदि ऐसा होता है तो दुखद होगा। जैसा राबड़ी देवी के सिर पर लालू ने ताज रख दिया था। यह लोकतंत्र का मजाक ही तो है। क्या यह सच है कि लालू के बेटों की जीत ने उन्हें महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो संभालने की स्थिति में खड़ा कर दिया है? नहीं और यदि नीतीश इस बात पर मजबूती से पक्ष रखते हैं तो वह ऐसा हरगिज नहीं होने देंगे। तब सरकार की शुरुआत ही कड़वाहट के साथ होगी। किसी भी तरह से बिहार का ही नुकसान होगा।

तो क्या नीतीश लालू पर हावी हो सकते हैं?

हां। आश्चर्यजनक है, लेकिन ऐसा हो सकता है। नीतीश एक हीरो के तौर पर उभरेंगे। कोई नहीं जानता कि क्या होगा। वैसे, यदि लालू ने नीतीश कुमार के रास्ते का कांटा बनने की कोशिश की और सरकार गिराने की धमकी दी तो नीतीश के पास हमेशा बीजेपी का हाथ थामकर सरकार बचाने का रास्ता रहेगा। बीजेपी बिहार हार चुकी है और यदि उसे मौका मिलता है तो उसके पास मौका हथियाने के सिवा कोई विकल्प नहीं रहेगा। खासकर राज्य सभा की चुनौतियों का सामना करने के लिए बीजेपी के लिए शायद सबसे ज्यादा उपयुक्त भी होगा। नीतीश कुमार और बीजेपी दोनों ही जानते हैं कि नीतीश कुमार बीजेपी के साथ तो काम कर सकते हैं, लेकिन लालू के साथ ऐसा कर पाना मुश्किल होगा।

वैसे, तो यह होना संभव नहीं लग रहा है, लेकिन यदि भविष्य में ऐसा होता है तो नीतीश कुमार ही लालू की जिद के सामने पीड़ित के तौर पर सामने आएंगे। इसमें जीत उनकी ही होगी। यदि नीतीश बीजेपी के साथ हाथ मिलाते हैं तो कांग्रेस साथ छोड़ देगी, लेकिन एनडीए के पास इतनी सीटें हैं कि उन्हें बहुमत हासिल करने में मुश्किल नहीं होगी।

लालू प्रसाद एक चतुर राजनेता हैं और वे इन परिस्थितियों में अपनी सीमाएं जानते हैं। वे मोलभाव करेंगे जरूर लेकिन मौके तलाश रही बीजेपी को सरकार में शामिल होने का मौका नहीं देंगे। अब यह बात आगे कैसे बढ़ती है, देखना दिलचस्प रहेगा।

नीतीश कुमार के लिए आगे का रास्ता

नीतीश कुमार ने बिहार के लिए जो वादे किए हैं, उसके लिए उन्हें बहुत मेहनत करनी होगीः

केंद्र से तालमेल बनाना होगा

नीतीश अच्छा काम कर जाएंगे और लगता नहीं कि वे अरविंद केजरीवाल की तरह केंद्र से टकराव का रास्ता अपनाएंगे। बिहार को 1.65 लाख करोड़ रुपए का पैकेज चाहिए, जिसका वादा खुद मोदी ने किया है। इस वजह से उन्हें सक्रियता के साथ और दरियादिली के साथ केंद्र से रिश्ते सुधारने होंगे। हर स्थिति में केंद्र सरकार का विरोध करने का कांग्रेस का अपना एजेंडा है, खासकर राज्यसभा में। लेकिन नीतीश कुमार को हर मुद्दे पर संतुलित नजरिया रखकर और आगे का सोचकर कदम बढ़ाना होगा।

शिक्षा और सामाजिक उत्थान पर ध्यान

बिहार की 80 प्रतिशत आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है और गरीब है। नीतीश कुमार को केंद्रीय और राज्य की योजनाओं के बूते शिक्षा और सामाजिक उत्थान पर ध्यान केंद्रित करना होगा। छोटी अवधि में वे सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को आगे बढ़ा सकते हैं, मसलनराज्य स्तर पर मनरेगा। लेकिन लंबी अवधि में शिक्षा के जरिए ही वे लोगों को गरीबी और सामाजिक शोषण के कुचक्र से निकाल सकते हैं।

बिहार के युवाओं को स्कूल से लेकर उच्च तकनीकी संस्थानों तक अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा चाहिए। और नीतीश कुमार को प्राइवेट सेक्टर को मनाना होगा कि वे राज्य में स्कूलकॉलेज और उच्च तकनीकी संस्थानों में निवेश करें। विदेशों में एक बहुत बड़ा बिहारी समुदाय है। जो राज्य में आकर निवेश करना चाहते हैं। नीतीश कुमार को इसका इस्तेमाल करना चाहिए। साथ ही उन्हें केंद्र से वादे के अनुरूप फंड हासिल करना होगा। ताकि इस सेक्टर को जरूरत के मुताबिक जोर दिया जा सके।

बिहार को उद्योगों और कृषि का आधुनिकीकरण चाहिए

नीतीश कुमार को पारंपरिक उद्योगों को फिर से ताकत देनी होगी क्योंकि बिहार की कामकाजी आबादी ज्यादातर गांवों में बसती है। वह हैंडलूम, पॉटरी, हंडीक्राफ्ट्स आदि के पारंपरिक उद्योगों में काम करती है। इन लोगों को कामकाजी पूंजी और फंड चाहिए, जिनसे वे अपने कामों में आधुनिकीकरण की मदद ले सके। नए मार्केट भी विकसित करने होंगे, ताकि इस सेक्टर को बढ़ावा मिल सके। विश्व में बसा बिहारी समुदाय इसमें मदद कर सकता है।

बिहार का कृषि क्षमता का इस्तेमाल अच्छेसे हो ही नहीं पाया है। उसकी भौगोलिक परिस्थिति के कारण बिहार में अच्छी बारिश होती है, जिससे जमीन भी उर्वर है। ग्रामीण सड़कों और बिजली के अभाव के साथ ही कोल्ड और नॉनकोल्ड स्टोरेज फेसिलिटी की कमी के साथ ही फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज की कमी की वजह से बिहार में तुलनात्मक रूप से प्रति व्यक्ति आय भी कम है। नीतीश कुमार ने ग्रामीण विद्युतीकरण नेटवर्क को सुधारा है और उन्हें राज्य में बाढ़ नियंत्रण प्रणाली भी दुरूस्त करनी होगी।

यदि वे किसानों की प्रति व्यक्ति आय बढ़ा पाते हैं तो बिहार भारत के अन्य विकसित राज्यों में शामिल हो सकता है। नीतीश कुमार को इस सेक्टर में क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे, जिससे उन्हें अगले कार्यकाल की गारंटी भी मिल जाएगी।

राज्य को बुनियादी ढांचे, चिकित्सा सुविधाओं, उद्योग, आवास, आईटी और पुलिस व्यवस्था के लिए तत्काल पैसा चाहिए। लेकिन यदि अगले तीन साल नीतीश कुमार का एजेंडा ऊपर उठाए मुद्दों पर रहता है तो राज्य के विकास की चर्चा पूरे देश में फिर सुनाई देने लगेगी।