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भारत का राष्ट्रपति चुनावः कौन जीतेगा रेस?

May 9, 2017


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भारत के 14 वें राष्ट्रपति का चुनाव करने के लिये आगामी राष्ट्रपति चुनाव में सत्तारूढ़ एनडीए और एक विखंडित विपक्ष के बीच कड़ा मुकाबला होने की उम्मीद है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के 25 जुलाई को सेवानिवृत्त होने के कारण बहुत कुछ दांव पर है इसलिये अगले राष्ट्रपति का चुनाव इस तारीख से पहले ही होना है।

पहले से ही कांग्रेस के राजनीतिक जंगल से बाहर आने की कोशिश में व्यस्त राजनीतिक दल भाजपा के जबरदस्त दम पर हमला करने के लिये एकजुट होकर लड़ाई लड़ने के लिये विवादित विपक्ष को प्रेरित करने की कोशिश कर रहे हैं।

पिछले सप्ताह एनसीपी के नेता शरद पवार ने सोनिया गाँधी से मुलाकात की, शरद पवार पहले से ही शरद यादव (जेडीयू), लालू प्रसाद यादव (आरजेडी) और सीताराम येंचुरी (सीपीआई-एम) जैसे नेताओं के साथ बैठक कर चुके हैं। ममता बनर्जी ने भी आम सहमति से एक मजबूत उम्मीदवार को चुनाव में उतारने पर विचार करने के लिये विपक्ष को आमंत्रित किया है।

इसी तरह, भाजपा भी मिशन राष्ट्रपति पर है क्योंकि यह उत्तर प्रदेश में अकेले ही चुनाव लड़ चुकी है। उत्तर प्रदेश में संतोषजनक परिणाम निश्चित रूप से भाजपा की इस बात में बहुत मदद करते हैं कि चुनाव के लिये एनडीए यहाँ क्यों है?

राष्ट्रपति चुनाव प्रक्रिया

भारत के राष्ट्रपति का चुनाव लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा मतदान प्रक्रिया के माध्यम से निर्वाचक मण्डली द्वारा किया जाता है।

लोकसभा और राज्यसभा में कुल 776 मतदाता सांसद हैं, जबकि सभी विधानसभाओं को मिलाकर कुल 4,114 विधायक मतदाता है। चूँकि सभी राज्य आबादी और आकार के हिसाब से अलग- अलग होते हैं, इसलिये प्रत्येक विधायक के वोट का मूल्य निर्धारण करने के लिये राज्य की कुल आबादी को राज्य के  विधायकों की संख्या से विभाजित करके 1000 से गुणा कर देते हैं।

प्रत्येक सांसद के वोट का मूल्य निर्धारण करने के लिये सभी विधायकों के वोटों को मिलाकर कुल सांसदों की संख्या से विभाजित कर देते हैं।

इन आँकड़ों के अनुसार, प्रत्येक राज्य को उस राज्य के आकार और जनसंख्या के आधार पर अनुपातिक भार दिया जाता है। 1974 में यह सहमति की गयी थी कि भारत के राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति का चुनाव करने के लिये सांसदों और विधायकों के वोटों के मूल्य की गणना की जायेगी।

यही कारण है कि भाजपा के लिये उत्तर प्रदेश चुनाव को पूर्ण बहुमत से जीतना बहुत महत्वपूर्ण था। इसी से यह संभावना है कि आगामी चुनाव में भाजपा और अधिक मजबूत हो जायेगी।

इसी तरह, 2012 से कांग्रेस की कई राज्यों में अपनी सत्ता खोने से स्थिति कमजोर हो चुकी है और इसलिए मजबूत क्षेत्रीय दलों के खिलाफ अपनी पसंद के उम्मीदवार को तैयार करने के लिये संघर्ष करना होगा, जो कि एक गैर-कांग्रेसी उम्मीदवार की बजाय आम सहमति का उम्मीदवार हो।

2002, 2007, 2012 से रोना दूर

2002 के चुनावों के दौरान, एनडीए सत्ता में थी और एपीजे अब्दुल कलाम को अपनी पसंद के रूप में उम्मीदवार चुना। वाम मोर्चा ने अंतिम क्षण में लक्ष्मी सहगल को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया था। बीएसपी, एआईएडीएमके और टीडीडी जैसी पार्टियों का भाजपा को समर्थन मिलने के कारण, कांग्रेस अकेले कोई भी लड़ाई नहीं लड़ सकती थी इसलिये चुनाव से सिर्फ दो दिन पहले एपीजे अब्दुल कलाम को अपना समर्थन दिया था।

2007 में, जब यूपीए की सत्ता में मजबूत पकड़ थी और बीजेपी विवादों में घिरी थी, तब यूपीए ने प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति के रूप में अपना विकल्प चुना। हालांकि संप्रग के बहुमत से वोट मिलने पर आश्चर्यजनक रूप से शिवसेना के रूप में एक साथी महाराष्ट्रीयन के समर्थन में आ गया और विपक्ष में रहकर एनडीए के साथ एक गठबंधन होने के बावजूद प्रतिभा पाटिल को वोट दिया।

2012 में, बहुमत से सत्ता वाली यूपीए द्वितीय सरकार ने प्रणब मुखर्जी को अपने  उम्मीदवार की पसंद के रूप में रखा, जबकि एक कमजोर भाजपा और एनडीए ने पीए संगमा को अपने उम्मीदवार के रूप में रखा था। दिलचस्प बात यह है कि पहली बार एक बांग्ला उम्मीदवार के खड़े होने के बावजूद तृणमूल ने प्रणब मुखर्जी की उम्मीदवारी का विरोध किया। प्रणब मुखर्जी ने अपने प्रतिद्वंद्वी को 40% मतों से हराया था।

वो कौन उम्मीदवार है जो भारत का अगला राष्ट्रपति बनेगा?

इस बार भारत में सबसे बड़ा और सबसे अधिक आबादी वाला राज्य, उत्तर प्रदेश जीतने के बाद, भाजपा और एनडीए की स्थिति काफी अच्छी है।

हालांकि भाजपा अभी भी अपने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का आधिकारिक तौर पर खुलासा नहीं कर रही है, फिर भी उम्मीद जताई जा रही है कि भाजपा इन तीन संभावित लोगों को राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी सौंप सकती है जिनमें सुषमा स्वराज (65- केंद्रीय विदेश मंत्री), सुमित्रा महाजन (74- लोकसभा अध्यक्ष) और द्रौपदी मुर्मू (58- झारखंड के राज्यपाल) शामिल हैं।

सुषमा स्वराज और सुमित्रा महाजन दोनों ही सत्ता में बहुत अधिक पकड़ रखने वाली और अनुभवी हैं, लेकिन द्रौपदी मुर्मू की वजह से भाजपा को उत्तरी आदिवासियों की बढ़त मिल सकती है। भाजपा आदिवासियों को अपनाने की कूटनीति से एक बड़ा बहुमत प्राप्त कर सकती है। अगर वह चुनाव में जीती तो।  लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मलोहर जोशी की कुछ चर्चा हुई थी, लेकिन बाबरी मस्जिद मामले को पुनर्जीवित करने के कारण, इनका नाम आना असंभव लगता है।

कांग्रेस की तरफ से, मनमोहन सिंह एकमात्र संभव उम्मीदवार हैं जिनका कांग्रेस को विपक्षी दलों से मुकाबले में समर्थन मिल सकता है।

भाजपा को अपने गठबंधन के साझेदारों को एक साथ मिलाने की आवश्यकता होगी। 2007 में शिवसेना गठबंधन के खिलाफ चली गयी थी और इस बार भी महाराष्ट्र में भाजपा के साथ अपने खराब संबंधों को देखते हुए यह दोबारा वही कार्य कर सकती है।

एक बात तो निश्चित है, यह चुनाव दोनों पक्षों के लिये बहुत महत्वपूर्ण होगा;  भाजपा 2019 में फिर से चलने के लिये तैयार है, कांग्रेस के लिये यह तेजी से आगे बढ़ती भाजपा के सामने खड़े होने का आखिरी मौका होगा।