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जीएसटी बिल से ‘कच्चा बिल’ सिस्टम खत्म हो जाएगा

August 19, 2016


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जीएसटी बिल से ‘कच्चा बिल’ सिस्टम खत्म हो जाएगा

जीएसटी बिल से ‘कच्चा बिल’ सिस्टम खत्म हो जाएगा

संसद में जीएसटी बिल को पास करने के मौके पर बोलते हुए प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में प्रचलित ‘कच्चा बिल’ सिस्टम पर चुटकी ली। उस समय संसद में मौजूद सांसदों ने भले ही इसे हल्के में लिया हो और हंसकर छोड़ दिया हो, यह इतना हल्का मामला नहीं है। इसकी वजह से हर साल सरकार को कर राजस्व में होने वाले नुकसान का आंकड़ा पता चलेगा तो हर कोई कहेगा कि इसे हंसकर नहीं छोड़ सकते।

भारत में बड़े पैमाने पर समानांतर अर्थव्यवस्था चलती है। ‘व्हाइट’ मनी के साथ-साथ ‘ब्लैक’ मनी का लेन-देन भी समानांतर तौर पर चलता है। इस लेन-देन का सबसे ज्यादा नुकसान किसी को होता है तो वह है सरकार। तो क्या जीएसटी बिल वाकई में कच्चा बिल सिस्टम को खत्म कर पाएगा? प्रधानमंत्री को भले ही ऐसा लगता हो, लेकिन ज्यादातर अर्थशास्त्री ऐसा नहीं सोचते।

कच्चा बिल क्या है?

एक आम ग्राहक के तौर पर हमें पता है कि कई बार कुछ सामान खरीदने पर स्थानीय दुकानदार हमें हस्तलिखित बिल/रिसीप्ट दे देते हैं। इस बिल को आम तौर पर कच्चा बिल कहा जाता है। दुकानदार इस लेन-देन को अपने औपचारिक खातों में शामिल नहीं करता, इस वजह से उसे इस लेन-देन पर सरकार को कोई टैक्स नहीं देना पड़ता।

व्यापारी के तौर पर कच्चा बिल जारी करना बेईमानी है। ऐसा कर वह सरकार को वाजिब टैक्स देने से बचते हैं। इससे ही ब्लैक इकोनॉमी का पोषण भी होता है। इसका नुकसान आम लोगों को भी होता है। व्यापारियों से जो पैसा सरकार को मिल सकता था, वह कच्चे बिल की वजह से उसे नहीं मिल पाता। इससे सरकार की आम लोगों को दी जाने वाली सुविधाएं और सेवाएं प्रभावित होती है।
तो इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए? व्यापारियों को, सरकार को या इसके लिए हम खुद ग्राहक जिम्मेदार हैं? कई तरह से देखा जाए तो तीनों ही है। व्यापारी जान-बूझकर कच्चा बिल देता है, ताकि उसको उस लेन-देन पर सरकार को आयकर न चुकाना पड़े।

करारोपण की प्रक्रिया में उचित चेक्स और बेलेंस के साथ ही निगरानी की कमी है। इसकी वजह से व्यापारियों और छोटे कारोबारी टैक्स से बच जाते हैं। और आखिर में हम उपभोक्ताओं को भी जिम्मेदारी उठानी होगी क्योंकि कई बार हम जानने-बूझने के बाद भी कच्चा बिल स्वीकार कर लेते हैं।

व्यापारियों की भी अपनी दलील है

व्यापारी, दुकानदार और ऐसे ही छोटे व्यापार करने वाले अक्सर शिकायत करते हैं कि ग्राहक ही कच्चा बिल मांगते हैं। वह मोल-भाव करते हैं, जिसकी वजह से टैक्स बचाते हुए कम कीमत पर सामान बेचना पड़ता है। ऐसे में कच्चा बिल मजबूरी हो जाती है। यदि दुकानदार ग्राहक की बात नहीं मानता तो वह उसे दूसरी दुकान से खरीदने की धमकी देते हैं। कई व्यापारी उचित बिल सिस्टम में काम करना चाहते हैं, लेकिन अन्य कारोबारियों के बेईमानी भरे तरीकों की वजह से उन्हें भी समानांतर अर्थव्यवस्था को पोषित करते रहना होता है।

विवेकहीन कारोबारी ग्राहकों के लालच का भरपूर फायदा उठाते हैं। जो थोड़े-बहुत ग्राहक पक्का बिल मांग लेते हैं, उनसे दुकानदार सीधे-सीधे कह देते हैं कि उन्हें 12.5 प्रतिशत या जो भी लागू होता हो, उतना टैक्स अलग से चुकाना होगा। यह सुनने पर ग्राहक खुशी-खुशी बिना पक्के बिल के ही सस्ते में सामान खरीदकर चलता बनता है।

लेकिन आखिर में इसका खामियाजा आम नागरिकों को ही तो भुगतना पड़ता है। करसंग्रह कम होने का नुकसान सामाजिक खर्च पर होता है। सरकार जन कल्याण योजनाओं में ज्यादा निवेश नहीं कर पाती। बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ नहीं पाता। ऐसे में ग्राहकों के तौर पर हमें ही अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। हमारे जैसे लोगों की वजह से ही समांतर अर्थव्यवस्था पनपती है और बनी रहती है। इससे सरकार को उसका वाजिब हिस्सा नहीं मिल पाता। व्यापारियों को तो कुछ फर्क नहीं पड़ता, लेकिन हमें सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है।

क्या जीएसटी से कच्चे बिल का सिस्टम खत्म हो सकेगा?

जीएसटी के जरिए एक समान टैक्स व्यवस्था लागू होगी। इससे लेन-देन में पारदर्शिता आएगी और इस वजह से टैक्स कलेक्शन बढ़ेगा। इसकी एक वजह आसान टैक्स फाइलिंग व्यवस्था भी होगी। यह भी सच है कि जीएसटी बिल को टैक्स कलेक्शन बढ़ाने के लिए लंबा सफर तय करना होगा। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि आखिरकार टैक्स की दर क्या तय होती है।
जीएसटी को सही मायनों में प्रभावशाली बनाने के लिए टैक्स रेट को कम से कम रखना बेहद जरूरी है। इससे ग्राहकों के साथ-साथ दुकानदारों को भी टैक्स जुटाने और उसे चुकाने पर प्रोत्साहन मिलेगा। इससे ज्यादा से ज्यादा कारोबार टैक्स के दायरे में आएंगे।

कुछ राज्य इसका विरोध कर रहे हैं क्योंकि उनका मानना है कि टैक्स की दर कम रखने से राज्यों की आमदनी प्रभावित होगी। मौजूदा प्रशासन और जनसुविधाओं के लिए उनके पास पर्याप्त पैसा नहीं रहेगा। राज्यों को यह नहीं समझ रहा कि यदि टैक्स की दर कम रहेगी तो कलेक्शन का दायरा बढ़ेगा। इसका फायदा राज्यों को मिलेगा। उनकी ओवरऑल आमदनी बढ़ेगी। मौजूदा राशि से तो ज्यादा ही राशि उन्हें नई व्यवस्था के तहत मिलेगी।

कांग्रेस पार्टी का जोर जीएसटी की अधिकतम सीमा 18 प्रतिशत तय करने पर है। ज्यादातर राज्य 22 से 24 प्रतिशत टैक्स वसूलने की मांग कर रहे हैं। यह सही है कि यदि टैक्स की दर ज्यादा रखी तो मौजूदा कारोबारियों को इससे नुकसान होगा। खासकर आज जो कारोबारी खुद को टैक्स के दायरे से दूर रखना चाहते हैं, वह आगे भी ऐसा ही करना चाहेंगे।

रियल एस्टेट इंडस्ट्री का केस लीजिए। यह सबसे बड़े क्षेत्रों में से एक है। इसमें बड़े पैमाने पर बेहिसाब पैसा निवेश होता है। रियल एस्टेट से जुड़े तकरीबन सभी लेन-देन में निश्चित प्रतिशत में ब्लैक मनी होती ही है।

नगद भुगतान करने की इच्छा रखने वाले खरीददार कैश तक पहुंच के अवसर तलाशते हैं। वहीं बिल्डर्स को इस नगदी के निवेश और इस्तेमाल की चिंता रहती है। वह अवसर ही तलाशता रहता है। इस बीच, रियल एस्टेट में पूरी सप्लाई चेन ही कहीं न कहीं समानांतर अर्थव्यवस्था का पोषक बन जाती है।

यह व्यवस्था बंद होनी चाहिए। यदि टैक्स रेट्स को किफायती स्तरों पर नहीं रखा और टैक्स को फाइल करने की व्यवस्था को साफ-सुथरा, आसान और पारदर्शी नहीं बनाया तो जीएसटी बिल अकेले दम पर वह बदलाव नहीं ला सकेगा, जिसकी उम्मीद केंद्र सरकार लगाकर बैठी है। यह भी हो सकता है कि यह व्यवस्था एक सफेद हाथी साबित हो। यह भी हो सकता है कि इसके थोड़े-बहुत फायदे हो, लेकिन नुकसान भी ज्यादा हो।

जीएसटी बिल सभी पक्षों के लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है, लेकिन इसके लिए हम सभी को इसका हिस्सा बनना होगा। इसके दूरगामी लाभों को सोचकर उन पर ही नजर रखनी होगी।
इसके बाद भी कुछ राज्य सरकारें टैक्स की दर कम रखने का विरोध कर रही है। लंबी अवधि के लाभ को देखते हुए इस पर इतना ज्यादा बहस की जरूरत नहीं है। केंद्र सरकार भी अगले पांच साल तक राज्यों को होने वाले किसी भी तरह के नुकसान की भरपाई तो करेगी ही।

कच्चा बिल को ‘नहीं’ कहने का वक्त आ गया है

अब वक्त आ गया है कि सभी नागरिक खुद ही कच्चे बिल को लेने से इनकार कर दें। आखिर में ग्राहक ही बड़ा बदलाव ला सकते हैं। भारत तेजी से कैशलेस ट्रांजेक्शन वाली अर्थव्यवस्था बनती जा रही है। डिजिटल ट्रांजेक्शन लेन-देन के प्रमुख स्रोत बनते जा रहे हैं। ऐसे में समानांतर अर्थव्यवस्था के लिए बने रहना आसान न होगा।

जीएसटी इसको समर्थन देने के लिए एक अच्छा अवसर है। ग्राहक होने के नाते, हमें भी कच्चा बिल को ना कहना सीखना होगा। यदि ऐसा हुआ तो हम खुद ही नई मेट्रो लाइन, साफ-सुथरा ट्रेन स्टेशन या शहर में नया सरकारी अस्पताल देखने पर खुद की पीठ थपथपाएंगे। हम इसे साकार कर सकते हैं। क्या इतना कारण काफी नहीं है कच्चा बिल का इस्तेमाल छोड़ने के लिए?

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