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द ग्रेट डिरेंजमेंट पुस्तक समीक्षा

July 27, 2016


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द ग्रेट डिरेंजमेंटः अमिताव घोष की एक नॉन-फिक्शन पुस्तक

द ग्रेट डिरेंजमेंटः अमिताव घोष की एक नॉन-फिक्शन पुस्तक

अपनी शांत पड़ी विद्वता को जगाइए क्योंकि दुनिया बदल रही हैऔर हालात खराब होते जा रहे हैं! ऐसा लगता है कि यह हमारे वक्त के सबसे अच्छे लेखकों में से एक का आह्वान है, जो दुनिया के एक महत्वपूर्ण विषय पर साहित्य, इतिहास और राजनीति की दुनिया के तमाम विचारकों की चेतना और चिंताओं को जागृत करना चाहते हैं। ताकि वह इसे महज एक मुद्दा समझकर न छोड़ दें, बल्कि उस पर सक्रियता भी दिखाएं। और अमिताव ने इस मामले की ओर ध्यान खींचने में महती भूमिका निभाई है।

द ग्रेट डिरेंजमेंट पिछले कुछ समय से अमिताव को परेशान कर रहा था। वह चुपचाप देख रहे थे। हमारे जैसे अधिकांश लोगों की तरह। जलवायु परिवर्तन की कठोरताओं का असर हमारे ग्रह पर दिखने लगा था। एक लेखक होने के नाते, उन्हें यह बात परेशान कर रही थी कि इस विषय की नॉनफिक्शन की दुनिया के बाहर मौजूदगी ही नहीं थी। जबकि इस विषय को सभी बुद्धिजीवी विचारों के केंद्र में होना चाहिए था।

यह नॉनफिक्शन की वापसी है, जहां लेखक ने विचारों को उत्तेजित करने वाली साहित्यिक अभिव्यक्ति के जरिए हमारा ध्यान खींचने की कोशिश की है। उन्होंने वैश्विक जलवायु परिवर्तन के पैटर्न और उसका सामना करने की हमारी कम तैयारी पर बात की है।

दिल्ली में आया वह बवंडर

लेखक ने जलवायु परिवर्तन के संबंध में प्रकृति के बुरे पक्ष का परिचय खुद अपने अनुभव के जरिए प्रस्तुत किया है। जब उन्हें मार्च 1978 की एक दोपहर को उत्तरी दिल्ली के किसी अपरिचित बालकनी में दुबककर बैठना पड़ा था।

दिल्ली यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी से वह अपने होस्टल रूम में लौट रहे थे। घोष का सामना अप्रत्याक्षित और अभूतपूर्व बवंडर से हुआ, जिसने कुछ ही मिनटों में अपनी भयावहता का परिचय भी दे दिया। कुछ ही पल बाद आसपास हुई तबाही से घोष हिल गए। भीषण बर्बादी हुई थी। यह घोष का ध्यान जलवायु परिवर्तन रूपी दैत्य की वास्तविकता और उसके परिणाम को समझने के लिए काफी था।

समुद्र से आ रहा खतरा

अमिताव घोष ने जलवायु परिवर्तन से हमारे ग्रह में आ रहे बदलावों को एक बड़े केस के तौर पर पेश किया है। यह भी बताया है कि यह धीरेधीरे कितना बड़ा खतरा बनता जा रहा है। उन्होंने भारत के आसपास के समुद्रों की तुलना भी अपनी किताब में की है।

2015 सबसे गरम वर्ष था, लेकिन इस दौरान एक और असामान्य बात हुई थी। 2015 में अरब सागर में बंगाल की खाड़ी के मुकाबले ज्यादा चक्रवाती तूफान आए। जबकि इतिहास में बंगाल की खाड़ी में ही हर साल भीषण चक्रवाती तूफानों की परंपरा थी। अरब सागर आम तौर पर शांत ही रहता था।

सच है। अरब सागर में आए तूफान ने यमन को नुकसान पहुंचाया। यह अपने आप में असामान्य और दुर्लभ है। डरावनी हकीकत यह भी है कि मुंबई को कभी भी चक्रवाती तूफान का सामना करना पड़ सकता है। अमिताव की किताब इसे लेकर चिंता जताती है।

अमिताव घोष के मुताबिक, यदि ऐसा हुआ तो मुंबई के 1.15 करोड़ रहवासियों के लिए कहीं जाने के लिए जगह नहीं बचेगी। वे फंस जाएंगे।

वह कहते हैं कि आंध्र प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे पूर्वी तटीय राज्यों ने पिछले कुछ बरसों में कई तूफान देखे हैं। वह पश्चिमी तटों के मुकाबले इनका सामना करने के लिए ज्यादा तैयार है। इस वजह से यदि इस तरह की आपदा पश्चिमी तटों की ओर हुई तो उसका सामना करने में उन्हें बहुत मुश्किल आने वाली है।

संकट आ गया है और वह बिल्कुल सामने है

बदलाव हो रहा है और वह अभी ही हो रहा है। थमा नहीं है। घोष के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन को समझने में हमारी नाकामी ही हमारी सबसे बड़ी भूल है। हम शहरों में रह रहे लोग इन अपरिहार्य घटनाओं के प्रति बेरुखी अपना रहे हैं। आने वाली पीढ़ी क लिए हमारी विरासत बहुत भीषण होने वाली है। यह लेखक को परेशान करता है और अन्य सभी को भी करना चाहिए।

घोष ने एक रोचक तथ्य उठाया कि उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद ने दक्षिण एशिया समेत एशिया में कार्बन अर्थव्यवस्था को जमने से रोके रखा था। साम्राज्यवादी ताकतों की रुचि अपनी बढ़ रही कार्बन अर्थव्यवस्था को और तेजी से आगे ले जाने के लिए भारत से कच्चा माल लेने में थी। इस तरह एशिया बच तो नहीं सका, लेकिन कार्बन अर्थव्यवस्था को हावी होने में समय लगा। कार्बन अर्थव्यवस्था का असर हमारे ऊपर अब होने लगा है क्योंकि हम तेजी से बढ़ते शहरीकरण के खतरों का सामना कर रहे हैं।

सांस्कृतिक उपभोगएक बुनियादी कारण

लेखक इस बात से आहत है कि जलवायु परिवर्तन की मूल वजह, सांस्कृतिक उपभोग है। जिसका नेतृत्व पश्चिमी देशों ने किया। विकसित देशों की उपभोग पद्धति वास्तव में जलवायु परिवर्तन से वैश्विक स्तर पर निपटने के प्रयासों का विरोधाभास प्रस्तुत करती है।

जलवायु परिवर्तन को लेकर सांस्कृतिक उपभोग के असर के प्रति सिर्फ जागरुकता ही नहीं चाहिए बल्कि हमें सबको एकजुट होकर इससे लड़ना होगा। घोष के मुताबिक, यह लड़ाई व्यक्तिगत स्तर पर नहीं हो सकती। जब सरकारें साथ आकर एकजुटता दिखाते हुए इस समस्या का सामना करेगी, तब ही कुछ हो सकता है।

यह बात साफ जाहिर करती है कि सभी देशों को अब नवीन ऊर्जा स्रोतों की ओर रुख करना चाहिए, जैसे कि सौर और पवन ऊर्जा। लेकिन घोष के मुताबिक प्रौद्योगिकी और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत वैश्विक स्तर पर इस समस्या का समाधान बिना नकारात्मक असर डाले नहीं दे सकते।

पेरिस में सीओपी 21 के तौर पर हम विकसित और अन्य देशों के बीच हुए मोलभाव को देख सकते हैं। लेकिन लेखक को लगता है कि सभी देश सांस्कृतिक उपभोग को मुख्य समस्या मानने में अनदेखी कर रहे हैं जबकि मूल समस्या तो वही है। सभी देश कार्बन फूट प्रिंट को कम करने में लगे हैं, जो काफी नहीं है। घोष के मुताबिक, यह सिर्फ नवीन ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान केंद्रित करने से नहीं होगा, सांस्कृतिक उपभोग भी घटाना होगा।

काल्पनिक विचारों को उकसाने की कोशिश

जिन पाठकों को लगता है कि यह किताब जलवायु परिवर्तन से जुड़े शोधों के तथ्यों का संकलन है तो उन्हें निराशा ही होगी। अमिताव घोष के लेखन का उद्देश्य फिक्शनल लेखकों की सामूहिक चेतना के लिए एक अपील की तरह नजर आता है, जिन्होंने अपनी किताबों में इस मुद्दे पर काफी कम ध्यान दिया है। इस किताब के जरिए अमिताव ने विचारों को उत्तेजित करने वाली और ज्ञान बढ़ाने वाली जानकारियां परोसी हैं। यह अन्य लेखकों को इस विषय पर फिक्शन लिखने को भी प्रेरित कर सकती है।

यह सिर्फ लेखकों के लिए नहीं है, बल्कि हमारे ग्रह के लिए है। हमारी विरासत के लिए है जो हम छोड़कर जाने वाले हैं। इस पर विचार करने की जरूरत है।

और आखिर में, लेखक के बारे में

उच्चस्तरीय फिक्शन को पसंद करने वाले पाठकों के लिए अमिताव घोष का परिचय देने की जरूरत नहीं है। अमेरिका में रहने वाले बंगाली उपन्यासकार ने अपने उपन्यासों के जरिए अपनी एक खास जगह बनाई है।

सी ऑफ पोप्पीज2008 में मैन बुकर प्राइस के लिए शॉर्टलिस्टेड

द कोलकाता क्रोमोसोम – 1997 में आर्थर सी. क्लार्क अवार्ड

द सर्कल ऑफ रीजन – 1990 में प्रिक्स मेडिक्स एस्ट्रेंजर अवार्ड। यह उनका पहला उपन्यास था।

द शैडो लाइन्स साहित्य अकादमी अवार्ड और आनंद पुरस्कार

द ग्लास पैलेस

द इब्सिस ट्रायोलॉजीओपियम वार, रीवर ऑफ स्मोक, फ्लाड ऑफ फायर

नॉनफिक्शन में शामिल है

इन एन एंटीक लैंड

डांसिंग इन कोलम्बिया एंड एट लार्ज इन बर्माआलेखों का संग्रह

द इमाम एंड द इंडियन

अमिताव घोष ने उपमहाद्वीप के बेहतरीन लेखकों में अपनी जगह बनाई है। इसी महीने उन्हें राष्ट्रपति भवन में रहने के लिए राइटरइनरेसिडेंस के तहत आमंत्रित किया गया था।

— देबु सी