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भारत में ग्रामीण गरीबी के कारण और गरीबी विरोधी योजनाएं

July 7, 2018


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भारत की ग्यारहवीं राष्ट्रीय विकास योजना के अनुसार भारत में 300 मिलियन से अधिक लोग गरीब हैं। भारत ने महान प्रयासों के कारण वर्ष 1973 में 55% से वर्ष 2004 में लगभग 27% (326 मिलियन गरीब) गरीबों की संख्या कम करने में कामयाबी हासिल की है। हाल के अनुमानों (2011-12) के अनुसार, ग्रामीण इलाकों में 216.5 मिलियन गरीब लोग हैं। अभी भी भारत की कुल आबादी का लगभग एक तिहाई हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करता है और ग्रामीण भारत का अधिकांश जीवन गरीबी में व्यतीत होता है। भारत का सबसे गरीब राज्य छत्तीसगढ़ है, यहाँ की 40% आबादी गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करती है। भारत के सात राज्यों – छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में लगभग 61% गरीब जनसंख्या वास करती है।

हालांकि ग्रामीण आबादी का लगभग 30% गरीब पहले जैसी स्थिति में जीवन-यापन करता है, लेकिन पिछले तीन दशकों में गरीबों की संख्या में गरीबी की योजनाओं और ग्रामीणों के शहरी इलाकों में प्रवास के कारण कुछ सुधार देखा गया है। ग्रामीण गरीबी में अनुसूचित जाति और जनजाति सबसे ज्यादा पीड़ित है। हाल ही में योजना आयोग ने ग्रामीण और शहरी इलाकों के लिए गरीबी रेखा को भी संशोधित किया है। नई गरीबी रेखा के हिसाब से ग्रामीण इलाकों के लिए 27 रुपए प्रतिदिन और शहरी क्षेत्रों के लिए 30 रुपए प्रतिदिन से कम आय वाले लोग गरीबी रेखा के अंर्तगत आते हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर करती है, लेकिन भारत में कृषि अप्रत्याशित मानसून पर निर्भर करती है, जो पैदावार में अहम भूमिका निभाता है। इसलिए ग्रामीण इलाकों में पानी की कमी, खराब मौसम की स्थिति और सूखा जैसे कारण गरीबी को बढ़ाते हैं। अत्यधिक गरीबी कई किसानों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर करती है। कई अत्यधिक गरीब ग्रामीण इलाकों में स्वच्छता, बुनियादी ढांचे, संचार, और शिक्षा की मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था स्थिर हो रही है और इसके साथ ही भारत की समग्र अर्थव्यवस्था की जो गति होनी चाहिये यह उस गति से आगे नही बढ़ रही है। गरीबी का सिर्फ एक कारण नहीं है, बल्कि कई कारण है जिनका गरीबी को बढ़ाने में काफी योगदान है। हमें और अधिक पता करना चाहिए।

ग्रामीण गरीबी के कारण

भौगोलिक कारक

कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में भौगोलिक कारक ऐसी स्थिति पैदा करते हैं, जिससे गरीबी का जन्म होता है। भारत में सबसे प्रमुख भौगोलिक कारकों में से एक अप्रत्याशित मानसून और मौसम है, जो फसल उत्पादन और उपज को प्रभावित करता है। बाढ़, सूखा, चक्रवात जैसी आदि प्राकृतिक आपदाओं ने भी उनकी फसल, मवेशियों और भूमि को क्षतिग्रस्त किया है। इन कारकों के कारण गरीबों का भारी नुकसान होता है, उदाहरण के लिए हाल ही के चक्रवात फैलिन ने ओडिशा और आंध्र प्रदेश में अत्यधिक क्षति पहुँचाई थी। जिससे प्याज की कीमतों में वृद्धि के बारे में काफी चर्चा भी हुई थी।

व्यक्तिगत कारक

मानो या न मानो, लेकिन आपकी आर्थिक स्थिति का आप क्या करते हैं और क्या करना चाहते हैं इस आधार पर परिभाषित किया जाता है। कई व्यक्तिगत कारक गरीबी को जन्म देते हैं। इन कारकों में से एक बीमारी है। गरीबी के कारण कई परिवारों के पास खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं है और जिसके कारण प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर हो जाता है। जिससे वे कई बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं। इसलिए वे जो भी वे कमा पाते हैं, बीमारी का उपचार कराने में अपनी कमाई को लगा देते है। इसलिए बीमारी के कारण वे और गरीब हो जाते हैं। यह सच ही कहा जाता है कि “गरीबी और बीमारी के मध्य एक भ्रामक साझेदारी है, जो मानवता के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण दुःखों को एक दूसरे से जोड़ने में मदद करती है।”

आलस्य और काम करने की इच्छा न होना भारत के गरीबी के प्रमुख कारणों में से एक है। ज्यादातर लोग काम करना नहीं चाहते हैं। यहाँ तक ​​कि आप शहरी क्षेत्रों के भिखारियों को देख सकते हैं, जिनका स्वास्थ्य अच्छा है, लेकिन उनको कुछ भी प्रलोभन दिया जाए फिर भी वे काम करने को तैयार नहीं होते हैं, क्योंकि उन्हें बिना मेहनत से पैसा कमाने का जरिया चाहिए।

शराब पीने की लत, नशीली दवाओं और अन्य सामाजिक बुराइयों की लत ग्रामीण गरीबी को बढ़ाती है। ये कारक पूरे परिवार को गरीब बनाने के लिए पर्याप्त हैं।

जैविक कारक

जनसंख्या में होने वाली तेजी से वृद्धि के कारण भी ग्रामीण भारत की गरीबी बढ़ती है। भारत में अत्यधिक विकसित चिकित्सा और स्वास्थ्य सुविधाओं ने समग्र मौत की दर को कम कर दिया है, लेकिन अभी तक जन्मदर के प्रभाव को नियंत्रित नहीं किया जा सका है। बड़े परिवारों और सीमित संसाधनों के परिणामस्वरूप गरीबी आती है।

आर्थिक कारक

ग्रामीण भारत के अधिकांश लोग कृषि पर निर्भर है, लेकिन ग्रामीण भारत के अधिकांश किसान अभी भी कृषि के प्राचीन तरीकों पर भरोसा करते हैं। जिसके कारण वार्षिक उत्पादन अक्सर बहुत कम होता है। इसके अलावा भारत के कृषि क्षेत्र अभी भी पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराने में अविकसित है।

खराब आपूर्ति श्रृंखला और कुप्रबंधन के कारण किसानों को सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ता है। किसानों की कड़ी मेहनत का अधिकतम लाभ आपूर्ति श्रृंखला के शीर्ष पर रहने वाले लोग उठाते हैं। लेकिन ग्रामीण भारत और उन्मूलन संबंधी गरीबी की उन्नति करने का यह एक और दौर है।

प्रमुख गरीबी विरोधी कार्यक्रम

एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम या स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना वर्ष 1980 में ग्रामीण गरीबों के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य से शुरू हुई थी। जिसमें स्व रोजगार आईआरडीपी के माध्यम से जोर दिया गया था।

संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना (एसजीआरवाई) वर्ष 2001 में ग्रामीण गरीबों के लिए रोजगार प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी।

प्रधानमंत्री ग्रामोदय योजना (पीएमजीवाई) वर्ष 2000 में शुरू हुई थी और इसका मुख्य लक्ष्य गाँव स्तर का विकास था, इसमें विशेषकर पाँच प्राथमिक क्षेत्र प्राथमिक स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा, आवास, ग्रामीण सड़कें और पेयजल और पोषण शामिल थे।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (एनआरईजीएस) वर्ष 2006 में मजदूरों के लिए 100 दिनों के कानूनी रोजगार गारंटी प्रदान करने के लिए शुरू की गई थी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य रोजगार प्रदान करना और रोजगार सृजन करने के लिए संपत्ति प्रदान करना था।

अंत्योदय अन्न योजना वर्ष 2000 में गरीब परिवारों को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी।

राष्ट्रीय आवास बैंक स्वैच्छिक जमा योजना गरीबों के लिए कम लागत वाले आवास के निर्माण के लिए काले धन का इस्तेमाल करने के लिए 1991 में शुरू की गई थी।

ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं और बच्चों का विकास (डीडब्ल्यूसीआरए) वर्ष 1982 में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली ग्रामीण महिलाओं को स्व रोजगार के अवसर प्रदान करने के लिए यह योजना शुरू की गई थी।

जन श्री बीमा योजना वर्ष 2000 में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों को बीमा सुरक्षा प्रदान करने के लिए शुरू की गई थी।

शिक्षा सहयोग योजना वर्ष 2001 में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए शुरू की गई थी।