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गौ-रक्षा : क्या हम धर्म के नाम पर हत्यारे बन रहे हैं?

November 29, 2018


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गौ-रक्षा: क्या हम धर्म के नाम पर हत्यारे बन रहे हैं?

ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार, वर्ष 2015 के बाद से गौ-रक्षा हिंसा में वृद्धि हुई है। गौरक्षा के नाम पर एक व्यक्ति द्वारा हर महीने कम से कम एक गाय को मारने की खबर मिलती ही रहती है जबकि हिंदू धर्म में गाय को पवित्र माना जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद भी नियमित रूप से इन गैर कानूनी ढंग से प्राणदंड के मामलों की निंदा करते हुए ऐसा लगता है कि इन भयावह घटनाओं का कोई अंत नहीं है। इस संवेदनशील मुद्दे को देखते हुए भी इस मुद्दे को लेकर लोगों की राय अलग है। हालांकि कोई भी रोजमर्रा के इस मुद्दे को न ही नजरअंदाज कर सकता है और न ही नकार सकता है। तो वास्तव में गौ रक्षा क्या है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या हम गौ रक्षा के नाम पर हत्यारे बन रहे हैं?

गौ-रक्षा क्या है?

जब हम अपने आप को “गौ-रक्षक” मान लेते है तो हमारे अंदर एक शूरवीर की छवि बस जाती है जो शायद एक अत्याचारी मसीहा की छवि होती है। जो यह सुनिश्चित करता है कि न्याय का पालन किया जाना चाहिंए। हालांकि, इस तरह से अपने आप को गौ-रक्षक बताकर खुद को मूर्ख न बनाओ।

‘गौ रक्षा’ स्पष्ट शब्दों में कहें तो उन लोगों के खिलाफ “न्याय” को संदर्भित करता है जो गायों को नुकसान पहुंचाते हैं और पवित्र पशु -गाय के संरक्षक होने का दावा करते हैं। दूसरी तरफ, गौ रक्षा के नाम पर गायों को क्रूरता से पीटने जैसी भयावह घटनाएं हम लगभग हर दिन समाचार पत्रों में पढ़ते हैं।

सितंबर 2015 में, एक 52 वर्षीय व्यक्ति पर भीड़ ने घर के अंदर घुसकर हमला किया था। भीड़ द्वारा उस व्यक्ति को घर के बाहर क्रूरता से घसीटकर लाया गया और बाद में उसकी हत्या कर दी गई। क्यों? क्योंकि भीड़ को शक था कि उस व्यक्ति, मोहम्मद अख्लाक, ने गाय के बछड़े की हत्या कर दी। भीड़ का कहना था कि उस व्यक्ति के घर में गोमांस मिला है। उस व्यक्ति की मृत्यु के बाद पुलिस को जांच के दौरान उसके घर में मांस मिला लेकिन वह मांस गाय का नहीं था।

कानून और नैतिकता

भारत के लगभग सभी राज्यों में पशु बध पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, लेकिन पूर्ण रूप से नहीं। हालांकि, गौ रक्षा प्रशंसा और यहां तक कि लोगों के एक बड़े वर्ग द्वारा न्यायसंगत होने के बावजूद भी पूरी तरह से गैरकानूनी है। सितंबर 2017 में, खतरनाक स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक जिले में एक पुलिस अधिकारी होना चाहिए ताकि गौ रक्षा की आड़ में हो रहे इन मुद्दों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।

यह स्पष्ट है, जबकि जागरूकता स्वयं को आश्रित और साहसी महसूस कराती है, गायों से जुड़ी भावनाओं के आधार पर, कानून इन कार्यों की निंदा करता है। जबकि पिछले दशक में गोमांस खाने और गौ रक्षा दोनों के मुद्दे बढ़ गए हैं, जिनकी जड़ें उतनी दूर हो सकती है जितना की औपनिवेशिक काल।

गौ रक्षा के बारे में बात करते समय एक बार महात्मा गांधी ने कहा था, “जैसे मैं गाय को पूजता हूं, वैसे मैं मनुष्य को भी पूजता हूं। जैसे गाय उपयोगी है वैसे ही मनुष्य भी फिर चाहे वह मुसलमान हो या हिंदू, उपयोगी है… क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लड़ूंगा? क्या मैं उसे मारूंगा? ऐसा करने से मैं मुसलमान और गाय दोनों का दुश्मन हो जाऊंगा।

पशुओं की रक्षा वास्तव में हमारा मकसद है?

इंडियास्पेंड के मुताबिक, पुरस्कार विजेता डेटा-पत्रकारिता पोर्टल, 2010-2017 के बीच गौ रक्षा के नाम पर 84% लोगों की हत्या की गई थी जो कि मुस्लिम थे।

जुलाई 2017 में, मथुरा जाने वाली एक ट्रेन में हाफिज जुनैद को पीट कर चाकू से उसकी हत्या कर दी गई थी। जबकि अधिकारियों ने कहा कि झगड़ा ट्रेन सीट को लेकर नहीं था जुनैद के भाई ने भी इस मामले के लिए असहमति जताई। ट्रेन में घुसे लोगों ने जुनैद के सिर पर लगी टोपी की ओर इशारा किया। उन लोगों ने जुनैद से कहा कि वो मुस्लिम, विरोधी नागरिक, पाकिस्तानी हैं और गोमांस खाते हैं। “जुनैद के पिता ने कहा,” वह किशोर (जुनैद) जिसकी हत्या कर दी गई उसने “बुजुर्ग व्यक्ति के लिए सीट खाली कर दी थी”। उनका मानना है कि यह हमला पूरी तरह से सार्वजनिक था।

गौ रक्षा  के तहत कई मुस्लिम जो वास्तव में किसान थे और अपनी आजीविका के लिए गाय के दूध पर निर्भर रहते थे, उन पर भी हमला किया गया। गोमांस का सेवन न करने और सबूत न होने के कारण उन्हें इस लिचिंग (मार डाला गया) का शिकार होना पड़ा। इस तरह के मामलों के साथ कोई मदद नहीं कर सकता लेकिन एक सवाल आज भी जहन में है कि क्या इस हिंसा के पीछे बस गौ-रक्षा का मकसद था?

जनता का रवैया   

2015 के गैर कानूनी ढंग से प्राणदंड के मामलों में जब गिरफ्तारी की गई थी तो स्थानीय लोग विरोध में उठ खड़े हुए थे, वाहनों को आग लगा दी गई थी, नाराज भीड़ ने दुकानों को तोड़-फोड़ दिया था। और इसके बाद 2017 में जुनैद की हत्या हुई थी? एक क्षेत्रीय पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में एक आरोपी व्यक्ति को टिकट देने की भी घोषणा है।

जुलाई 2018 में, केंद्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने राजगढ़ में आठ लोगों का माल्यार्पण किया था, जिन्हें हत्या के मामले में दोषी पाया गया था। इन लिंचिंग मुद्दों पर द क्विंट द्वारा नागरिकों से मुलाकात करके एक लेख तैयार किया गया। परिणाम भयानक थे, लेकिन दुख की बात है, आश्चर्य की बात नहीं है। बहुत से लोगों का मानना ये भी है कि गायों नुकसान पहुंचाने के कारण उन लोगों के साथ जो भी हुआ वह सही है।

एक इसी तरह के ही लेख में एक व्यक्ति ने कहा कि “यदि कोई गाय को मारने के लिए खरीद रहा है, तो उसे तुरंत और वहीं मार डालो और कानून के बारे में हम बाद में सोंचेगे।”

लेकिन हमें यह नहीं कहना है कि देश का प्रत्येक व्यक्ति या हिंदू इन हत्यारे व्यक्तियों की गतिविधियों का समर्थन करता है। वास्तव में, बहुत से लोग इस बात पर बहुत ही कडाई से अमल करते हैं कि यह हत्या और आतंकवाद क्या है। समस्या यह है कि, जो लोग इसका समर्थन करते हैं, या यहां तक ​​कि जो लोग इसे खतरे की दृष्टि से नहीं देखते हैं, उनसे उपेक्षा करना व्यर्थ है।

राय

समस्या यह नहीं है कि हिंदू धर्म गायों को पवित्र मानता है और उन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए। समस्या यह है कि गौ-रक्षा को धर्म का सहारा लेकर कुछ स्व-घोषित सतर्कताएं क्रूरता भरी और डरावनी होती है। धर्म, हिंसा के मार्ग, दुःख फैलाने, अल्पसंख्यकों के अधिकारों को छीनने की शिक्षा नहीं देता है।

जून 2018 में, उत्तर प्रदेश के एक गांव में एक मुस्लिम किसान कासिम को पीट-पीट कर मार डाला गया था क्योंकि ग्रामीणों को उस गाय को मारने को लेकरक संदेह था। लेकिन पुलिस को वहाँ गाय या यहां तक कि गाय को मारने वाले किसी उपकरण का भी कोई निशान नहीं मिला था। उसके बाद के दिनों में जो वीडियो पाया गया था, वह भीड़ से कासिम को बचाने के लिए आए एक बुजुर्ग पर हमला करने करने के साथ-साथ कसीम की हत्या का काक्रूर वीडियो था एक अन्य सामने आए वीडियो में पुलिस द्वारा कासिम को मैदान में घसीटते हुए दिखाया गया था।

जुलाई 2018 के अलवर लिंचिंग मामले में भी, एक पीड़ित (अकबर) की मृत्यु भीड़ द्वारा मारपीट के कारण ही हुई थी। वहाँ का निकटतम स्वास्थ्य केंद्र घटना स्थल से मुश्किल से 4 किमी दूर था और फिर भी, पुलिस ने अकबर को स्वास्थ्य केंद्र तक ले जाने में ढाई घंटे तक का समय लगा दिया था और वहां पहँचते ही उसे मृत घोषित कर दिया गया था। इसका साक्षी एक चाय विक्रेता भी है, कि पुलिस ने अकबर को अस्पताल ले जाने से पहले चाय पी और उसके बाद उसे अस्पताल ले गए।

यह देखने में बहुत डरावना लगता है कि लोग कैसे अपनी मानवता को भूल रहे हैं। और, जब मैं लोगों को कहता हूं, तो मेरा मतलब सिर्फ चरमपंथी धार्मिक लोगों से नहीं है। यहां तक ​​कि जो नागरिक हमारे बीच रहते हैं, वे भी पूरी तरह से अहिंसक प्रतीत होते हैं, जिन्होंने अक्सर इस सतर्कता को अपना समर्थन दिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह बढ़ती हिंसा हमारे समाज में कभी-कभी सांप्रदायिक मनमुटाव की ओर इशारा करती है। उदाहरण के लिए, जुनैद की हत्या भी, एक समुदाय के खिलाफ एक बदले की भावना के सिवा कुछ भी नहीं थी।

कथित तौर पर गायों को नुकसान पहुंचाने के लिए मुसलमानों और अन्य अल्पसंख्यकों पर किया गया हमला समाज के निचले वर्ग से संबंधित है। कई लोगों के लिए, उनकी आजीविका गायों पर ही निर्भर करती है क्योंकि भैंसों की लागत बहुत अधिक है। यहां तक ​​कि यदि आर्थिक दृष्टि से देखा जाए, तो कुछ लोगों की दैनिक आय गायों से प्राप्त होने वाले  दूध पर ही निर्भर करती है। इन स्पष्ट तथ्यों के बावजूद यदि कोई पूर्व घृणा और पक्षपात कारण नहीं है? तो अल्पसंख्यकों पर हमला क्यों किया जाता है।

भले ही, हमारी मानवता हमारी रक्षा करने के लिए है और सभी उम्मीदों को छोड़ने से पहले हमें अपनी रक्षा करनी होगी। ये क्रूर हत्याएं गलत हैं इनको रोका जाना चाहिए। आप कोई भी तर्क दें कोई फर्क नहीं पड़ता।

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गौ-रक्षा : क्या हम धर्म के नाम पर हत्यारे बन रहे हैं?
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लिंचिंग से संबधित समाचारों को देखने के बाद, कोई भी रोजमर्रा के इस मुद्दे को न ही नजरअंदाज कर सकता है और न ही नकार सकता है। तो वास्तव में गौ रक्षा क्या है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या हम गौ रक्षा के नाम पर हत्यारे बन रहे हैं?