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लिंग संवेदीकरण की शुरूआत घर से

June 30, 2017


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हाल ही में निर्भया बलात्कार पर प्रसारित बीबीसी की एक डॉक्यूमेंट्री में, बलात्कारी और उनके बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा किये गये असंवेदनशील और लिंग-पक्षपाती टिप्पणी की वजह से विवाद उत्पन्न हो गया था।

इस डॉक्यूमेंट्री में ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के समाज में प्रचलित एक ही मध्ययुगीन मानसिकता और लिंग पक्षपात पर प्रकाश डाला गया है।

भारत में समस्या यह है कि यहाँ नैतिक मूल्यों और नीतियों पर औपचारिक शिक्षा का पूर्ण अभाव रहा है, शिक्षा के पाठ्यक्रम केवल शैक्षणिक विषयों तक ही सीमित हैं। इसलिए बच्चों को नैतिक मूल्य सिखाने की जिम्मेदारी पूरी तरह से माता-पिता या परिवार की होती है।

इस तथ्य को देखते हुए कि हमारा समाज अपनी रचना और सामाजिक मूल्यों से बहुत विविध है, यह आश्चर्यजनक नहीं है कि हमारे समाज में एक सामान्य निर्देश स्थल या मानक का पूरा अभाव है, एक परिवार इसको बदल सकता है।

समाज में लड़कियों और बाद में महिलाओं की भूमिका पर विचार करें तो उनके परिवार और दूसरे परिवार में भिन्नता होती है इसलिए बच्चों में अपने विपरीत लिंग के बारे में अलग-अलग विचार होते हैं। वह मुख्य रूप से उन परिवारों के प्रचलनों से प्रभावित होते हैं जहाँ से स्त्री या पुरूष आते हैं।

इस जगह पर औपचारिकता की कमी ही समस्या है। औपचारिक शिक्षा प्रणाली इस महत्वपूर्ण समस्या को हल करने में विफल रही है, परिवार वालों की तरफ से भी इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता है। तो हम एक बलात्कारी के विचारों को सुनकर आश्चर्यचकित क्यों हों, कि एक बलात्कारी किसी महिला की नम्रता को रौंद देता है और फिर पूरे जीवन-काल केवल कार्यवाही चलती रहती है। या उनके वकीलों द्वारा महिलाओं पर ही आरोप लगाया जाता है जिसमें कहा जाता है कि एक महिला घर से निकल सकती है तो वह बलात्कार कर सकती है या नहीं!

बलात्कारी और उनके वकील दोनों ही पीड़ित परिवार की पृष्ठभूमि से प्रभावित होते हैं। यह आश्चर्यजनक बात नहीं है कि इस मामले में दोषी परिवार के सदस्यों, चाहे वह महिला हो या पुरुष सभी, के विचार एकसमान होते है। यदि कोई व्यक्ति दिल्ली से सिर्फ 5 किलोमीटर दूर यूपी या हरियाणा की यात्रा करे तो वह कई घरों में इस पर एकसमान विचार सुन सकता है। ऐसा क्यों यह है कि आजादी के 68 साल बाद भी भारतीय समाज अभी तक मध्ययुगीन मानसिकता में जीवन व्यतीत कर रहा है?

विद्यालय और महाविद्यालय की लड़कियों को मोबाइल फोन जैसी सुविधाओं से वंचित किया जा रहा है और जींस पहनने पर असहमति प्रकट की जा रही है, जबकि पुरुषों पर इस तरह का कोई प्रतिबंध नहीं है। हम अभी भी लड़कियों को एक अल्प मानव के रूप में क्यों देखते हैं?

यह समय है कि हम ईमानदारी से आत्मनिरीक्षण करें और एक पारिवारिक व समाज के रूप में हुई अपनी असफलता को महसूस करने का प्रयास करें, ताकि हम उन नागरिकों के जीवन के मुख्य भाग के रूप में उच्च नैतिक और नीति विषयक मानकों का निर्माण करने में सक्षम हों जो इसमें असफल रहे हों। अक्सर और बहुत आसानी से, हम यह समझते हैं कि आधारभूत मूल्य हमेशा घर से आते हैं, लेकिन फिर भी हम हमेशा इसकी जिम्मेदारी स्कूलों को देते हैं।

कौन कहता है, लड़के और लड़कियाँ समान हैं?

हाल ही के एक सर्वेक्षण में इस तथ्य पर प्रकाश डाला गया, कि जब विद्यालय के युवा लड़कों से यह पूछा गया कि मेज पर भोजन कम पड़ जाने के बाद आप सबसे पहले किसके लिये अपने भोजन का त्याग करेंगे, तो अधिकांश लड़कों ने सर्वप्रथम अपनी माँ और इसके बाद बहन को चुना। तो किसी पुरुष के इस प्रकार के विचार के लिये कौन जिम्मेदार है, कि भोजन करने के लिये पहले उसकी माँ हो और उसके बाद बहन? घर के पुरूष सदस्यों को पहले भोजन क्यों दिया जाता है? और घर की महिला सदस्यों को बाद में खाना खाने पर बल दिया जाता है।

एक समाज के रूप में हम लिंग संवेदीकरण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर विचार और बहस को प्रोत्साहित करने में नाकाम रहे हैं। एक समाज केवल तभी प्रगतिशील हो सकता है जब हम यह मान लें कि महिला और पुरुष दोनों सदस्यों का समान महत्व है। मुद्दा यह नहीं है कि यह भूमिका कौन निभाता है। एक समाज से दूसरे समाज में यह भूमिकाएं भिन्न हो सकती हैं। लेकिन सार्वभौमिक तथ्य यह है कि महिलाओं और पुरूषों का महत्व समान हो। हमारे वह सभी विचार और कार्य जो हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं, लिंग समानता की पृष्ठभूमि में होने चाहिए।

यह वह समय है जब हमें आत्मनिरीक्षण शुरू करना होगा, हमें इस तथ्य को पहचानना होगा कि सभी स्तरों पर एक ऐसे समाज में रह रहे हैं जो लैंगिक पक्षपात से भरा हुआ है। हमें अपने घरों में लिंग समानता के मूल्यों पर ध्यान देना चाहिए। इसी जगह से एक प्रगतिशील नागरिक बनने का पहला कदम शुरू होता है। नैतिक और नीति-विषयक शिक्षा के लिए घर की तुलना में और कोई बेहतर स्थान नहीं हो सकता है, इसके लिए सबसे अच्छा छात्र एक बच्चा है, क्योंकि लड़के या लड़की को सिखाने और अभ्यास कराने के लिये सबसे उचित स्थान घर है।

यह सुनिश्चित करने के लिए सभी स्कूलों को समर्थित होना चाहिए कि स्कूल में लिये गए सभी निर्णय और कार्रवाई में लिंग की समानता एवं महिला और पुरूष छात्रों के बीच आपसी आदर भाव सुनिश्चित करें।

लिंग समानता पर प्रारंभिक शिक्षा का एक अच्छा उदाहरण इजराइल में ‘किबुत्ज’ है। यह सांप्रदायिक हैं, जहाँ सभी बच्चों को सामूहिक परवरिश (किसी बाहरी व्यक्ति के द्वारा माता-पिता के जैसी देखभाल) के लिए लाया जाता है। हालांकि ‘किबुत्ज’ की अवधारणा भारत के लिए प्रासंगिक नहीं हो सकती है, लेकिन बचपन से ही सही ‘लिंग समानता’ के दृष्टिकोण को भारत को सीखना और अपनाना चाहिए।

माता-पिता और विद्यालयों को एक साथ आना होगा

बच्चे के विकास में परिवार और विद्यालय दोनों ही एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए दोनों को एक साथ आकर उचित तरीके से चर्चा करने की आवश्यकता है, ताकि घर और स्कूलों के विचारों में लैंगिक समानता का अभ्यास किया जा सके। इसके बारे में स्कूल दिशा निर्देशों की स्थापना करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। स्कूल माता-पिता को लिंग संवेदीकरण के साथ-साथ पालन के विभिन्न पहलुओं और विशेष रूप से लिंग समानता के बारे में सलाह दे सकते हैं।

कार्यवाही का समय

यह अफसोस की बात है कि आजादी के 69 साल बाद भी हम मध्ययुगीन विचारों प्रथाओं और जीवन शैली के दास हैं। भारत विविध संस्कृतियों, धर्मों और प्रथाओं को आकर्षित करने में पारंपरिक रूप से एक शानदार समाज रहा है, इसलिये लिंग समानता को स्वीकार कर लेना चाहिए। दुर्भाग्य से, यह एक अपवाद बना हुआ है, निर्भया बलात्कार पर डॉक्यूमेंट्री ने हमारे समाज में इस महत्वपूर्ण मुद्दे को हल करने के लिए एक कार्यवाई करने को बुलावा दिया।

सही बदलाव करने में कभी भी देर नहीं होती है, यह बदलाव घर से शुरू हो गया है। हमें सामूहिक रूप से यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि हमारी विरासत संपूर्ण युवा पीढ़ी को एक समान अवसर प्रदान करे। अगली पीढ़ी तेजी से बढ़ रही है और हमें उनका ऋण चुकाना होगा।