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भारत में परीक्षा प्रणाली

July 12, 2017


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the-examination-system-in-india-some-problems-and-their-solutionsएक सरसरी निगाह से देखें तो भारत की शिक्षा प्रणाली में बहुत सी चीजें हैं जो गलत हो सकती हैं। भारत में हर बच्चा शिक्षा ग्रहण करने में सक्षम नहीं है और फिर हमारे यहाँ सरकारी और निजी स्कूलों के बीच कई अंतर भी हैं जिनमें शिक्षण संबंधी गुणवत्ता और बुनियादी सुविधाओं जैसे कारक शामिल हैं। हालांकि,यह एक मुद्दा है जो हमेशा हितधारकों के ध्यान से बच जाता है – भारत में परीक्षा प्रणाली के बारे में सामान्य लोगों, अधिकारियों, शिक्षकों और छात्रों को भी शायद जानकारी नहीं है।

भारतीय परीक्षा प्रणाली के दोष

भारतीय शिक्षा प्रणाली बड़ी समस्याओं का सामना कर रही है जिनमें से एक समस्या पुरानी और कमजोर परीक्षा प्रणाली है। यह उस समय से है जब छात्र एक परीक्षा भवन में परीक्षा के लिए जाते थे और कम समय में परीक्षा देते थे तथा सभी छात्र परीक्षा में दिये गये प्रश्नों का अपनी तरफ से सर्वश्रेष्ठ उत्तर देते थे और फिर परिणामों का इंतजार करते थे। अक्सर यह देखा गया है कि जो छात्र पूरे वर्ष अपनी परीक्षा की तैयारी करते हैं वे परीक्षा के दिन डरावनी उदासी का सामना करते है और फिर एक बार खराब परीक्षा हुई, जबकि इस प्रणाली से परीक्षार्थी अच्छे से परिचित हो जाता है और फिर मूल रूप से एक अच्छा परिणाम उसे मिलता है।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहाँ पर इस परीक्षा प्रणाली के संबंध में कई सवाल उठते हैं, इसमें कुछ भी हो सकता है जिससे सबसे अच्छे छात्र भी बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं।

इस समस्या को बदलने के लिए हम आजकल नई प्रणाली तैयार कर रहे हैं जैसे कि मध्य अवधि या सेमेस्टर परीक्षाएं और यूनिट परीक्षण। ये सभी प्रणालियां बेहतर हैं क्योंकि यह छात्रों को हल्की अनुसूची प्रदान करती हैं, जो उन्हें जीवन के अन्य क्षेत्रों खेल और बाहरी गतिविधियों जैसे कि संगीत या कला क्षेत्र में जाने के अवसर प्रदान करता है, जहाँ उनकी मुख्य प्रतिभा निहित होती है। हालांकि इस परिदृश्य के साथ बड़ी समस्या यह है कि यह छात्रों को अच्छे अंक लाने के लिए अध्ययन और पाठ्यक्रम को कम समय में याद करने, और केवल अगली परीक्षा तक याद रखने के लिए दबाव डालता है।

शिक्षा का मुख्य उद्देश्य छात्रों को शिक्षित करना है और उन्हें उस ज्ञान के क्षेत्र में बेहतर और सराहना के पात्र बनाने में सहायता करना है और उनको इस लायक बनाया भी जा रहा है। हालांकि, ऐसा लगता है कि ग्रेड और अंकों पर अतिरिक्त जोर देने के लिए इस समय बहुत कम संभावनाएं हैं। एक ऐसी प्रणाली होनी चाहिए, जिससे यह पता चले कि छात्रों को वास्तव में क्या सिखाया जा रहा है और वह उसे समझ पा रहे हैं या नहीं और वह उन्हें केवल कुछ दिनों या महीनों के लिए रटने में सक्षम न बनाता हो। वर्तमान में जो स्थिति है, उसमें बड़े बदलाव की आवश्यकता है। उसी समय पर एक प्रायोगिक परीक्षा करवानी चाहिए ताकि छात्रों की योग्यता का परीक्षण अच्छी तरह किया जा सके।

इसका एक तरीका प्रोजेक्ट या असाइनमेंट हो सकता है। एक ऐसी प्रणाली तैयार की जानी चाहिए जिसके अन्तर्गत छात्रों को उन कार्यों को दिया जाता है जिन्हें वह घर पर पूरा कर सकते हैं और उन्हें कुछ दिनों में उस कार्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त समय दिया जा सकता है। यह प्रणाली यह सुनिश्चित करेगी कि छात्र अपने अध्ययन की गुणवत्ता को सुधारें और विफलता के लिए कोई भी बहाना या कारण बताना समाप्त करें।

दूसरा तरीका यह है कि शिक्षा का जो स्तर उच्च श्रेणी की कक्षाओं में है उस स्तर को निचली कक्षाओँ में भी लागू किया जाना चाहिए, उदाहरण के लिए 6 वीं जैसी कक्षाओं के पढ़ाई के स्तर को अपनाया जाये।

सर आर्थर कॉनन डोयले द्वारा “ए स्टडी इन स्कार्लेट” में, शेरलॉक होम्स बताते हैं जॉन वाटसन को बहुत सारी चीजें जानना व्यर्थ है अगर कोई उसे इस्तेमाल ना करे। क्या आइंस्टीन और गे-ल्यूसैक के सिद्धान्तों में दिलचस्पी रखने वाले छात्रों को फायदा नहीं मिलना चाहिये और उन्हें वास्तव में शेक्सपियर की जीवन व्याख्या का अध्ययन करने के लिये अधिक समय दिया जाना चाहिये।

भविष्य में छात्रों को बहुत सारी चीजों को सिखाने के बजाय भविष्य के लिए तैयार करना महत्वपूर्ण है, जिसका वह वर्तमान में उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। भारत में 6 वीं कक्षा वह समय है जब छात्र हाई स्कूल की परीक्षा की तरफ बढ़ता है। इस स्तर पर स्कूल में माता-पिता के साथ उन विषयों पर चर्चा हो सकती है जिनमें बच्चों ने अच्छा प्रदर्शन किया है, उनके साथ-साथ बच्चों का साक्षात्कार भी ले सकते हैं, उस विषय का सुझाव दे सकते हैं जिसमें वह भविष्य में अध्ययन करके अपना भविष्य बना सकता है। हालांकि, उन्हें कुछ समय दिया जाना चाहिए ताकि वह उचित निर्णय ले सकें।

इसके बारे में ग्रेड प्रणाली का सुझाव भी दिया जा सकता है जिसका अब तक छात्रों द्वारा उपयोग किया जाता रहा है। मुख्य विषयों के साथ वह अन्य विषयों का चयन भी कर सकते हैं जिन्हें लघु विषय माना जा सकता है, इसमें प्राप्त किये गये अंकों को अन्य विषय के अंको के साथ जोड़ा जाना चाहिए जो की परीक्षा में सफल होने के लिए आवश्यक होते हैं। इससे यह सुनिश्चित करने में आसानी होगी कि छात्र अपने पसंदीदा विषयों का अध्ययन आनंद पूर्वक कर रहे हैं और अच्छा प्रदर्शन करने के लिए उन पर कोई अनुचित दबाव नहीं डाला जा रहा है। इसमें साथ में पढ़ने वाले छात्रों और अभिभावकों के दबाव के रवैये के बारे में भी सवाल उठाया जा सकता है।

छात्र आत्महत्या के मामले में भारत, विश्व के अन्य देशों के मुकाबले में सबसे आगे है। वर्तमान की भयभीत स्थिति को देखते हुए आने वाले वर्षों में यह स्थिति और बदतर हो सकती है।

भारत में माता-पिता और शिक्षकों का यह कर्तव्य है कि वह इस प्रकार की घटनाओं में कमी सुनिश्चित करने में अपना प्रयास करें, हमारे पास एक ऐसी युवा पीढ़ी है जो वह काम करती है जो उन्हें पसंद नहीं न कि वह काम करती है जो स्पष्ट रूप से उनकी क्षमताओं के परे हो।