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प्रशंसा ! जाति आधारित राजनीति को एक नई लहर देती है

December 6, 2018


जाति में क्या है? हमारे नेताओं से पूछिए! 

ब्रेड और मक्खन की तरह राजनीति और जाति भी साथ-साथ चलती है। हमारे “धर्मनिरपेक्ष” राष्ट्र की स्थापना के बाद से हमारी राजनीति धर्म के नाम पर ही चल रही है और आने वाले दशकों तक ऐसे ही चलती रहेगी। हालांकि, जैसा कि 2019 के लोकसभा चुनाव करीब हैं, जाति आधारित राजनीति की एक नई लहर भारत में दौड़ने लगी है।

आपको लगता होगा कि विधानसभा चुनावों के साथ हमारी राजनीतिक पार्टियां घोषणा पत्र की खामियों और झूठे वादों के साथ एक-दूसरे पर हमला करेंगी। लेकिन, ऐसा नहीं है। यदि आप राष्ट्रीय समाचार देखते हैं यहां तक कि थोड़ा-बहुत भी, तो आपने राहुल गांधी के गोत्र पर चल रहे नाटक के बारे जरूर सुना होगा।

एक के बाद एक राजनेता अपने “प्रतिभावान” तर्क को साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। कोई भी इन तर्कों के अंत तक नहीं पहुंच रहा बल्कि इन्हें विस्मय बनाता जा रहा है। जाति में क्या है? यह हमारे प्यारे राजनेताओं से पूछो!

धर्मनिरपेक्ष पार्टियों? एक बार फिर से विचार करो  

‘धर्मनिरपेक्ष’ को शब्दकोश में भले ही अस्पष्ट रुप से परिभाषित किया गया हो लेकिन यह ‘किसी भी धार्मिक या आध्यात्मिक मामलों से संबधित नहीं है’। हमारी वर्तमान राजनीतिक पार्टियां, फिर चाहे वह केंद्र-शासित भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) हो या भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस हो, कितने धर्मनिरपेक्ष हैं, इसका पता आसानी से नहीं लगाया जा सकता है।

किसी भी कद का राजनीतिक नेता होने के नाते, एक व्यक्ति को अभी भी ये स्वतंत्रता है कि वह किसी भी धर्म को अपना सकता है या उस धर्म से संबधित कार्य को कर सकता फिर चाहे उसका जन्म उस धर्म में हुआ हो या नहीं। हालांकि, व्यक्तिगत मान्यताओं और राजनीतिक प्रचार के बीच संतुलन को बनाना बहुत महत्वपूर्ण है। तब यह देख कर मन में निराशा होती है कि कितनी बार देश के नेताओं ने, “आपका गोत्र क्या है?” और मैं सबसे बड़ा भक्त हूं, यह कहकर देश की सुख-शांति को ठेस पहुंचाने की कोशिश की है।

हमें अपने वोट को पाने के लिए, या वास्तविक शासन एजेंडे को कास्टिंग करने के लिए क्या यह धार्मिक विशिष्टता है।

धर्म के खेल

विधानसभा चुनावों के चलते, देश का ध्यान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पार्टी के अध्यक्ष पर है। विभिन्न राज्यों में एक के बाद एक मंदिर जाने वाले राहुल गांधी को भुलाना मुश्किल है। गांधी स्वयं को “शिव भक्त” कहते हैं। इसमें कुछ भी गलत नहीं है, है ना? चुनावों के दिनों में उनकी यात्रा एक असामान्य गति से बढ़ी, जैसा कि भाजपा की यात्रा निर्धारित नहीं थी।

भाजपा द्वारा राहुल गांधी के मंदिर के दौरे को “फैंसी ड्रेस हिंदुत्व” का दौरा कहने का तात्पर्य, राहुल गांधी की नवनिर्मित धार्मिक छवि को बेनकाब करना था। भाजपा का कहना है कि “हिंदुओं को गुमराह करने के लिए, वे सीने पर” जनेऊ ” का समर्थन कर रहें है। “बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सांबित पात्रा ने भी ये कहा है कि हम जानना चाहते हैं कि ‘जनेऊधारी’ राहुल गांधी किस ‘गोत्र’ से संबंधित हैं।

अब आपको अपने विचार और सावधानीपूर्वक सही सोच के बारे में बताना चाहिए? उन्होंने यह भी कहा कि लोगों ने गांधी को “वेटिकन गोत्र के ब्राह्मण” के रूप में संदर्भित करना शुरू कर दिया है। वेटिकन ही क्यों, आप जानना चाहते हैं? अरे, क्योंकि उनकी मां सोनिया गांधी जन्म से इटैलियन हैं।

यह सिर्फ बीजेपी ही नहीं थी जिसने स्वयं को धर्म की एक तरफा लड़ाई में शामिल किया है। राहुल गांधी भी इसे दोहराने के लिए तत्पर थे। पुष्कर मंदिर के एक पुजारी के मुताबिक गांधी द्वारा किए गए नवंबर माह के दौरे में उन्होंने अपना गोत्र दत्तात्रेय बताया है। दत्तात्रेय कौल और कौल्स कश्मीरी ब्राह्मण हैं “।

यह समस्याग्रस्त क्यों है?

इसमें कोई शक नहीं है कि, चुनाव के समय राहुल गांधी का मंदिरो का दौरा करना एक राजनीतिक एजेंडा है। शशि थरूर ने टाइम्स लिटफेस्ट 2018 में अपनी बातचीत के माध्यम से उल्लेख किया कि, राहुल गांधी की धर्म-संचालित यात्राएं “कुटिल अवसरवादी” का एक रूप नहीं है। थरूर के अनुसार, यह बीजेपी थी जिसने “सच्चे हिंदुओं और विश्वासहीन धर्मनिरपेक्षतावादियों” के झगड़े की शुरुआत की थी।

“एक ऐसे देश में जहां धार्मिकता की जड़े इतनी मजबूत हैं, अगर इसी तरह बहस का मुद्दा चलता रहा, तो धर्मनिरपेक्षतावादी लोगों को हमेशा के लिए खो देंगे। इसलिए हमने फैसला किया कि यही समय है हमें हमारे विश्वास को बचाए रखने का। लेकिन थरूर ने कहा इसे अन्य धर्मों की समावेश और स्वीकृति के ढांचे के भीतर ही किया जाना चाहिंए। तर्कसंगत बातों में यह समझाने की कोशिश की गई थी कि क्यों पार्टी अध्यक्ष ने अचानक अपने विश्वास को प्रचारित करने का फैसला किया था।

अब, धर्म को लेकर चल रही यह पूरी लड़ाई समस्याग्रस्त क्यों होती जा रही है। बेशक, इससे देश को कोई वास्तविक नुकसान नहीं है, लेकिन धर्म को लेकर लड़ रहे कुछ नेताओं द्वारा कैसे यह मुद्दे बन जाते हैं। अगर यह इतना ही आसान था।

वास्तव में, चुनाव के चलते हमारे नेताओं का व्यवहार काफी अलग सा हो जाता है। सभी वास्तविक समस्याओं और मुद्दों को एकतरफ रखते हुए हम, जो धर्म के बारे में अधिक जानता है या जो इसका दृढ़ता से दावा करता है, उससे अधिक बहस करने का फैसला कर लेते हैं। जो सबसे बुरी बात है। वे केवल इसलिए ऐसा करते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि इससे उनका काम बन जाएगा।

एक नज़र

राहुल गांधी द्वारा गोत्र के लिए किए जाने वाले खुलासे में केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री हर्षवर्धन ने व्यंग्यात्मक रूप से मुख्य प्रतिक्रिया दी थी। एक विस्तृत ट्वीट में, हर्षवर्धन ने लिखा, ‘जवाहरलाल नेहरू का गोत्र दत्तात्रेय था क्योंकि वो ब्राह्मण थे। अगर उनका बेटा होता, तो उनका गोत्र उसे मिलता। इंदिरा जी अपने पिता का गोत्र अपने बेटे को नहीं दे सकती। इसलिए ,चूंकि राजीव गांधी एक पारसी (फिरोज गांधी) के बेटे थे, तो वो दत्तात्रेय नहीं हो सकते। “पहली नजर में, यह कुछ पाठकों को भ्रमित कर सकता है। लेकिन, ट्वीट का क्रूज साबित कर रहा था कि गांधी दत्तात्रेय गोत्र से नहीं हैं, जैसा कि उनके द्वारा दावा किया गया।

हमारे देश की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हिंदुत्व को लेकर उठाए गए सवालों की, निंदा की। राहुल गांधी ने कहा था, “हमारे प्रधान मंत्री कहते हैं कि वह एक हिंदू है लेकिन वह हिंदुत्व की नींव नहीं जानते हैं, वह किस तरह के हिंदू है? “- इस पर तंज कसते हुए सुषमा स्वराज ने दोबारा जवाब दिया-

“भगवान न करे कि इस तरह का कोई दिन भी आए कि हमें राहुल गांधी से हिंदू होने का मतलब समझना पड़े।”

मेरी समस्या एक विशिष्ट पार्टी तक ही सीमित नहीं है। कैसे वास्तविक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, वे इस अर्थहीन कलह में फंस गए हैं। राष्ट्रीय नेता और इस पद पर होने के नाते, क्या व्यक्तिगत ज्ञान या धर्म की प्रतिस्पर्धा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए? हरगिज नहीं। एक देश जो शक्तिशाली देश होने के बारे में बात करता है, ऐसा नहीं कर सकता है जहां सदियों से हमारे राजनेताओं द्वारा ऐसे मुद्दे उठाए जाते रहे हैं।

क्या आप जनता से वोट हासिल करना चाहते हैं? धार्मिक महत्व वाले स्थानों पर जाना शुरू करें।

किसी अन्य पार्टी पर अपनी श्रेष्ठता साबित करना चाहते हैं? अपने धार्मिक प्रचार में खामियों को लक्षित करना शुरू करें। काफी आसान है। लेकिन, क्या यह 21 वीं शताब्दी के धर्मनिरपेक्ष पार्टी की कार्य योजना की तरह दिखता है? खैर, विचार किया जाना चाहिंए।

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प्रशंसा ! जाति आधारित राजनीति को एक नई लहर देती है
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21 वीं शताब्दी में, हमारे नेताओं का प्राथमिक एजेंडा धर्म तक ही सीमित है। सवाल यह है कि क्या विकासशील दुनिया में एक जगह हासिल करने का यही तरीका है?