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राजा राम मोहन राय – एक समाज सुधारक

July 2, 2018


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राजा राम मोहन राय

राजा राम मोहन राय एक भारतीय सामाजिक-शिक्षा सुधारक थे, जिन्हें “आधुनिक भारत के निर्माता” और “आधुनिक भारत के पिता” और “बंगाल पुनर्जागरण के पिता” के नाम से भी जाना जाता था। जिन्होंने 18 वीं शताब्दी के दौरान समाज में प्रचलित सामाजिक बुराइयों को खत्म करने में बहुत योगदान दिया। उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी मातृभूमि को बेहतर जगह बनाने का हर संभव प्रयास किया।

राजा राम मोहन राय के बारे में

राजा राम मोहन राय एक महान ऐतिहासिक व्यक्ति थे। जिन्होंने भारत को बदलने के लिए सहरानीय प्रयास किए और पुरानी हिंदू परंपराओं को चुनौती देने की हिम्मत दिखाई। उन्होंने समाज को बदलने के लिए बहुत सारे सामाजिक सुधार किए और भारत में महिलाओं की स्थिति को सुधारने के भी कई सारे प्रयास किये। राय ने सती प्रथा के खिलाफ लड़ाई लड़ी। वह एक महान विद्वान भी थे। जिन्होंने कई किताबें, धार्मिक और दार्शनिक कार्यों और शास्त्रों को बंगाली में अनुवाद किया और वैदिक ग्रंथों का अनुवाद अंग्रेजी में किया।

राजा राम मोहन राय का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

राजा राम मोहन राय का जन्म 22 मई, 1772 ई. को राधा नगर नामक बंगाल के एक गाँव में, पुराने विचारों से संपन्न एक बंगाली ब्राम्हण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम रमाकान्त राय एवं माता का नाम तारिणी देवी था। इनकी माँ भारतीय इतिहास के सबसे अंधाकारमय युग में रह रहीं थीं। उस समय, देश कई सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं से पीड़ित था, जिसने धर्म के नाम पर विवाद पैदा कर रखे थे।

इनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के ही एक स्कूल में संस्कृत और बंगाली भाषाओं के साथ शुरू हुई थी। जिसके बाद आगे की पढ़ाई पूरी करने के उद्देश्य से इन्हें पटना के मद्रास में भेजा गया, जहाँ पर इन्होंनें अरबी और फारसी सीखी। बाद में, वे वेदों और उपनिषद जैसे संस्कृत और हिंदू ग्रंथों की जटिलता को जानने के लिए काशी चले गए। उन्होंने 22 वर्ष की उम्र में अंग्रेजी भाषा सीखी।

राजा राम मोहन राय का बाद का जीवन

उन्होंने ईसाई धर्म और अन्य धर्मों का अध्ययन बड़े पैमाने पर किया। इस अध्यन से, ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम करते समय, उन्हें एहसास हुआ कुछ हिंदू परंपराओं और अंधविश्वासों को सुधारने की आवश्यकता है। इसके अलावा, वह धार्मिक विविधता वाले परिवार में पैदा हुए थे, जिसकी वजह से शायद उन्हें अपनी सोच को नियंत्रित करना पड़ा। राय मूर्ति पूजा के खिलाफ थे और उन्होंने ब्रह्म समाज के माध्यम से भगवान की एकता के विचार को प्रचारित किया।

1828 में कोलकाता में वह ब्रह्म समाज के संस्थापक थे। उनके प्रयासों ने वास्तव में वेदांत स्कूल ऑफ फिलास्पी के नैतिक सिद्धांतों की बहाली का नेतृत्व किया। उन्होंने कलकत्ता यूनिटेरियन सोसाइटी की सह-स्थापना भी की।

मुगल सम्राट अकबर द्वितीय ने उन्हें ‘राजा’ की उपाधि दी। राजा राम मोहन राय इंग्लैंड की यात्रा करने वाले पहले शिक्षित भारतीय थे और वह मुगल सम्राट अकबर द्वितीय के राजदूत के रूप में इंग्लैंड गए थे।

समाज सुधारक

बंगाल, समाज के बुरे रीति-रिवाजों और कुप्रथाओं के नीचे दबा हुआ था। यहाँ पर जटिल अनुष्ठानों और विनम्र नैतिक संहिता का एक बड़ा प्रसार था, जिसमें बुरी प्राचीन परंपराओं को स्पष्ट रूप से समझा गया और बड़े पैमाने पर इसमें संशोधन भी किया गया था। राय परंपरागत हिंदू प्रथाओं के खिलाफ थे और उन्होंने सती प्रथा, बहुपत्नी, जाति कठोरता और बाल विवाह के खिलाफ आवाज उठाई। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि “सती प्रथा” को बंद करवाना था। यह एक ऐसी प्रथा थी जिसमें एक विधवा को अपने मृत पति के अंतिम संस्कार में खुद के शरीर को भी पति के साथ चिता पर बैठकर नष्ट करना पड़ता था। कानूनी रूप से इस प्रथा पर रोक लगाने के प्रसंग में उनको वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा।

उन्होंने अन्य प्रबुद्ध बंगालियों के साथ ब्रह्म समाज की स्थापना की। समाज एक बेहद प्रभावशाली सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन था जिसने जाति व्यवस्था, दहेज, महिलाओं के प्रति हो रहे अत्याचार आदि जैसी बुराइयों के खिलाफ अपनी आवाज उठाई।

शैक्षणिक योगदान

उन्होंने भारत की शिक्षा प्रणाली में उल्लेखनीय प्रयास किए। शिक्षा प्रणाली में आधुनिकीकरण लाने के लिए, राजा राम मोहन राय ने कई अंग्रेजी स्कूलों की स्थापना की। उन्होंने 1817 ई0 में कलकत्ता में एक हिंदू महाविद्यालय की स्थापना करके, भारत की शिक्षा प्रणाली में एक क्रांतिकारी बदलाव किया, जो देश के सर्वश्रेष्ठ शैक्षिक संस्थानों में से एक बन गया। राय ने आग्रह किया कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, पश्चिमी चिकित्सा और अंग्रेजी भारतीय स्कूलों में पढ़ाया जाना चाहिए। उन्होंने प्रौद्योगिकी, पश्चिमी चिकित्सा और अंग्रेजी को बढ़ावा देने के लिए भारतीय स्कूलों में इनका अध्यन शुरू करवाया।

प्रकाशित काम

लोगों को राजनीतिक रूप से शिक्षित करने के लिए, राजा राम मोहन राय ने अंग्रेजी, हिंदी, फारसी और बंगाली सहित विभिन्न भाषाओं में पत्रिकाएँ भी प्रकाशित कीं। उनके द्वारा प्रकाशित उल्लेखनीय पत्रिकाएँ ब्राह्मणिकी पत्रिका, सम्वाद कौमुद्दी और मिरात-उल-अकबर थीं। उनकी सबसे लोकप्रिय पत्रिकाओं में भारत में सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को शामिल किया गया, जिसने भारतीयों को अपने वर्तमान अवस्था से ऊपर उठने में मदद की।

उन दिनों समाचार और लेख को प्रकाशित किए जाने से पहले सरकार की अनुमति लेनी जरूरी थी। राजा राम मोहन इस विचार के खिलाफ थे और उन्होंने इसका विरोध इस तर्क के आधार पर किया कि समाचार पत्र को सत्य को प्रतिबिंबित किया जाता है और सच्चाई को इस आधार पर दबाया नहीं जाना चाहिए। सरकार इसे पसंद नहीं कर रही है।

राजा राम मोहन मोहन राय की मृत्यु

राजा राम मोहन राय की 27 सितंबर 1833 को ब्रिस्टल में दिमागी बुखार के कारण मृत्यु हो गई थी। ब्रिटिश सरकार ने राजा राम मोहन की याद में एक सड़क का नाम ब्रिस्टल रख दिया।

भारतीयों द्वारा कई क्षेत्रों में बहुत सारी प्रगति की जा रही है, लेकिन महिलाओं की स्थिति अभी भी इस प्रगति के पीछे है। समाज से सभी प्रकार की बुराइयों को दूर करने के लिए राजा राम मोहन राय जैसे समाज सुधारक को भारत में फिर से जन्म लेने की जरूरत है।

 

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राजा राम मोहन रायः एक समाज सुधारक
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राजा राम मोहन राय एक महान ऐतिहासिक व्यक्ति थे। जिन्होंने भारत को बदलने के लिए सहरानीय प्रयास किए और पुरानी हिंदू परंपराओं को चुनौती देने की हिम्मत दिखाई।