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क्या अच्छे दिन आ गए?

August 7, 2018
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क्या अच्छे दिन आ गए?

आपकी राजनीति की प्रखरता को इस प्रकार से देखा जा सकता है जिस प्रकार से आप लोगों और श्रोताओं को अपने भाषणों से मंत्रमुग्ध करते हैं। इन सभी के बाद राजनीति एक बुद्धि का एक खेल है। इस परिभाषा के अनुसार, कोई तर्क देगा कि प्रधानमंत्री मोदी एक अच्छे राजनेता हैं। उनका शब्दों पर नियंत्रण किसी एक रहस्य से कम नहीं है। मोदी, 2014 में एनडीए सरकार के सत्ता में आने से पहले भी एक लोकप्रिय व्यक्ति थे। उनके भाषण और रैलियां हमेशा उत्सुक प्रशंसकों से भरी हुई होती थीं, जिनकी दूर-दूर तक बार-बार प्रशंसा की जाती थी।

जैसा कि 2019 के लोकसभा चुनाव हमारे दरवाजे पर दस्तक देने वाले हैं, प्रभावपूर्ण शब्दों वाले इस व्यक्ति के बारे में एक प्रश्न जो प्रकाश में आने वाला है। क्या यही हैं हमारे अच्छे दिन?

2014 में नमो

2014 के लोकसभा चुनावों के परिणाम 16 मई 2014 को घोषित किए गए थे। चुनाव में मतदाताओं की संख्या 66.38 प्रतिशत थी, जो भारतीय आम चुनावों के इतिहास में अब तक की सबसे अधिक संख्या थी। नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (एनडीए) ने 336 सीटों पर जीत दर्ज की थी। बीजेपी ने अकेले ही 31. 0 प्रतिशत सीटों पर जीत दर्ज की थी। 1984 के आम चुनावों के बाद ऐसा पहली बार हुआ कि एक पार्टी के पास बिना गठबंधन के सरकार बनाने के लिए पर्याप्त वोट थे। इस तरह भारत को अपने 14वें प्रधानमंत्री के रुप में नरेंद्र मोदी मिले।

भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में वादे के रूप में 50-बिंदु प्रस्तुत किए थे। जिनमें से आकर्षण वाले मुख्य वादे, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, अनुच्छेद 370 (जो अनुच्छेद जम्मू-कश्मीर को स्वायत्त की स्थिति प्रदान करता है) को रद्द करना आदि कार्य थे। एक तरफ विपक्ष के कई लोगों का मानना है कि अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण से हिंदू धर्म के एजेंडे को फैलाने का प्रयास किया गया है जबकि भाजपा इस बात पर कायम है कि यह हमारी “सांस्कृतिक परम्परा” को बढ़ावा देने वाला कार्य था।

मौजूदा कार्यकाल में, सरकार ने अपने द्वारा किए गए वादों को पूरा करने के प्रयास में कई कदम उठाए हैं।

योजनाओं का एक संक्षिप्त रिपोर्ट कार्ड

वर्तमान सरकार ने शुरुआत से ही स्वयं को आम भारतीय लोगों के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत किया है। 2015 में सबसे ज्यादा उल्लेखनीय योजनाएं लागू की गईं थीं। प्रधानमंत्री जन धन योजना का उद्देश्य समाज के सभी वर्गों में वित्तीय सेवाओं का विस्तार करना और पहुंच प्रदान करना है। इस योजना के तहत, जीरो बैलेन्स अकाउन्ट की सुविधा भी प्रदान की गई है। इस योजना के तहत नवंबर 2017 तक, 307 मिलियन खाते खोले गए थे।

एनडीए सरकार के लिए महिला सशक्तिकरण एक और उल्लेखनीय एजेंडा रहा है। सुकन्या समृद्धि खाता योजना (2015) और प्रधान मंत्री उज्ज्वल योजना (2016) दोनों इसकी पहल के रूप में हैं। जबकि बालिकाओं के लिए जो पहले जमा योजना चलाई गयी थी, उसके तहत भी अब गरीबी रेखा (बीपीएल) से नीचे जीवन यापन करने वाली महिलाओं को निःशुल्क एलपीजी कनेक्शन प्रदान किए जा रहे हैं।

सितंबर 2014 में, सरकार ने “मेक इन इंडिया” योजना के बारे में बहुत प्रचार किया था। इस संचलन में हमारी अर्थव्यवस्था के 25 क्षेत्र शामिल हैं, जिनमें 100% निवेश, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) का ही है। इसके लागू होने के बाद, जापान और भारत ने मिलकर 12 अरब अमेरिकी डॉलर की एक “जापान-भारत मेक-इन-इंडिया स्पेशल फाइनेंस सुविधा” की घोषणा की है। जिससे भारत को 2016-17 के वित्तीय वर्ष में, 60 अरब अमेरिकी डॉलर का एफडीआई प्राप्त हुआ है। मेक इन इंडिया का अनुसरण करते हुए कई राज्यों ने “हैप्पनिंग हरियाणा” और “मैग्नेटिक महाराष्ट्र” जैसी योजनाओं की शुरूआत की है।

मोदी सरकार का, भ्रष्टाचार विरोधी पहल में, मुख्य उद्देश्य देश को एक नकदी रहित अर्थव्यवस्था की ओर ले जाने का रहा है। इस योजना के तहत ‘डिजिटल इंडिया’ नाम का एक अभियान चलाया गया है, जिसका लक्ष्य भारतीयों के मध्य डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना है।

लोगों की राय

फोर्ब्स 2018 की सबसे शक्तिशाली लोगों की सूची में मोदी 9 वें स्थान पर हैं। प्रधानमंत्री ने लोगों से ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीकों से प्रशंसा प्राप्त की है। टाइम्स ग्रुप द्वारा किए गए एक ऑनलाइन सर्वेक्षण में, 71.9% भारतीयों ने कहा कि वे आने वाले 2019 के लोकसभा चुनावों में फिर से नरेंद्र मोदी के लिए वोट करेंगे। इसी सर्वेक्षण में 11.93%  लोगों ने राहुल गांधी को वोट करने की बात कही।

हालांकि, लोग विमुद्रीकरण के मुद्दे पर तेजी से विभाजित हुए। 22.2% लोगों ने इसे एनडीए सरकार की सबसे बड़ी विफलता माना। 28.30% लोगों ने यह महसूस किया कि सरकार रोजगार उत्पादन के अपने वादे को पूरा करने में विफल रही है, जबकि 14.28% कश्मीर नीति से संतुष्ट नहीं थे। यह आंकड़े मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता के सवाल का जवाब हैं। जब पूछा गया कि मोदी शासन के तहत व्यक्तिगत जीवन में सुधार हुआ है, तो 55% लोगों ने हाँ कहा।

मोदी की अपने प्रशसंकों के बीच इतनी अधिक लोकप्रियता होने के बावजूद भी उनके पूरे कार्यकाल में उनपर कुछ सवाल लगातार उठाए गए हैं।

प्रेस की स्वतंत्रता

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा 2018 के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत को कुल 180 देशों में से 138 वें स्थान पर रखा गया था। यह इंडेक्स रेटिंग प्रेस स्वायत्तता, स्वयं नियंत्रण आदि कारकों को ध्यान में रखकर निर्धारित की गई है। रैंकिंग में भारत, पाकिस्तान से सिर्फ एक कदम आगे था और युद्ध से प्रभावित अफगानिस्तान से पीछे था।

राणा अय्यूब, जो कि एक भारतीय पत्रकार हैं उन्होंने 2016 में गुजरात फाइल्स  नाम से अपनी एक पुस्तक जारी की। पुस्तक में 2002 के गुजरात दंगों के बारे में बताया गया है और इस घटना के साथ इसमें नौकरशाहों और राजनेताओं के संबंध का दावा करने वाले कथित साक्षात्कार भी शामिल हैं। पुस्तक प्रकाशित होने के बाद से, महिला पत्रकार का दावा है कि उन पर लगातार हमले हुए हैं यहाँ तक की उन्हें बलात्कार और मौत की धमकियां भी मिली है। इसके फलस्वरूप, संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार निकाय ने भारतीय अधिकारियों से अय्यूब को सुरक्षा प्रदान करने के लिए एक बयान जारी किया।

हाल ही के एक विवाद में, एबीपी न्यूज चैनल के दो प्रमुख पत्रकार, प्रबंध संपादक मिलिंद खांडेकर और पुण्य प्रसून बाजपेई ने संगठन छोड़ दिया। बाजपेयी ने अपने शो मास्टरस्ट्रोक में छत्तीसगढ़ की एक महिला की कहानी को कवर किया था, जिसने दावा किया था कि पीएम की ग्रामीण योजनाओं के तहत उनकी कमाई दोगुनी हो गई थी। शो में, बाजपेयी ने महिला के दावों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाया था, जिसमें सत्ताधारी पार्टी से कई आलोचनाएं शामिल थीं। कुछ हफ्ते बाद, बाजपेयी ने संगठन छोड़ दिया। इस्तीफे से पहले, कई लोगों ने शो के प्रसारण के समय नेटवर्क में ब्लैकआउट होने की सूचना दी थी। प्रेस अधिकारों में बाधा डालने पर विचार करते हुए आप और कांग्रेस सहित विपक्ष ने घटनाओं के खिलाफ बात की है।

धारा 377

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर धारा 377 की कानूनी स्थिति पर विचार किया और साथ ही सरकार को इस मुद्दे पर अपनी चुप्पी के लिए कठोर आलोचना का सामना करना पड़ा। भारतीय संविधान का खंड अनिवार्य रूप से समलैंगिकता को अवैध मानता है, इस वजह से यह कानून बहुत से लोगों की नजरों में अनावश्यक है। दक्षिणपंथी पार्टी से कई राजनेताओं ने विशेषकर एलजीबीजीटीक्यू+समुदाय, सुब्रमण्यम स्वामी के खिलाफ खुले तौर पर बात की है। इससे पहले जुलाई में, बीजेपी के सांसद ने कई से प्रतिक्रियाएं प्राप्त करते हुए समलैंगिकता को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया।

2016 में, ऑरलैंडो समलैंगिक नाइट क्लब शूटिंग के समय के दौरान, प्रधान मंत्री मोदी ने बीमारियों के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए ट्वीट किया था। हालांकि, वहाँ समुदाय का कोई जिक्र नहीं था। पिछले कुछ वर्षों में, प्रधान मंत्री समलैंगिक अधिकारों के पूर्ण समर्थन में नहीं आए हैं, जिसने कई लोगों के प्रति काफी हद तक असंतोष व्यक्त किया है।

जैसे-जैसे देश आने वाले चुनावों के लिए खुद को तैयार करता है, वैसे-वैसे वहां लोगों के बीच विचारों का विभाजन होता है। जबकि कुछ लोग मानते हैं कि मोदी हमारे देश की सबसे बड़ी उम्मीद हैं, विपक्ष सहित अन्य लोग एनडीए शासन को लोकतंत्र के अंत के रूप में देखते हैं। हालांकि, चाहे हमारे अच्छे दिन आए हों या नहीं, जब देश 2019 में अपना अंतिम फैसला देगा तब यह स्पष्ट हो जाएगा।

 

 

 

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2019 लोकसभा चुनाव नजदीक आने के साथ हम नमो के कार्यकाल को देखते हैं।